नए वर्ष की बुनियाद रखती विगत वर्ष की ये घटनाएं

Author शरद सिंगी|
इस वर्ष का आज अंतिम दिन है। कल हम नई आशाओं, विचारों और कामनाओं के साथ नए वर्ष में प्रवेश करेंगे। किंतु प्रवेश करने से पहले जरा क्षणभर के लिए रुकें और सोचें कि नए वर्ष की जिस वैश्विक राजनीतिक आबोहवा में हम प्रवेश करने के लिए उत्सुक हैं उसको स्वच्छ अथवा दूषित करने के लिए पिछले वर्ष विश्व के दिग्गज राजनेताओं की क्या भूमिका रही? उनके उन्हीं सही और गलत निर्णयों पर रखी जाएगी। आइए, हम यहां उन्ही महत्वपूर्ण घटनाओं/ निर्णयों का उल्लेख करते हैं जिनका बोझ या फल लेकर हम अगले वर्ष में प्रवेश करेंगे।
जनवरी बीस को ट्रंप ने अमेरिका के राष्ट्रपति के रूप में शपथ ली थी। यहीं से अमेरिका के बदलने की शुरुआत हुई। वैश्विक हितों की सोच को त्यागकर उन्होंने 'अमेरिका प्रथम' की नीति को अपनाया और अपनी विदेश नीति को व्यावसायिक तराजू पर तौला। परिणाम यह है कि अमेरिका अब अपनी वैश्विक लीडर की भूमिका से बाहर होता दिखाई दे रहा है। साथ ही, विश्व में सर्वशक्तिमान होने के पद से भी जूझता दिखाई दे रहा है।
अमेरिका स्वयं अपने ही हितों की रक्षा करते करते इतना बेसुध हो गया कि उसके शीश पर दुनिया के सुपर पॉवर होने का ताज बस एक औपचारिकता बन चुका है। कोई छोटे से छोटा देश भी आज उससे नहीं डरता। उत्तरी कोरिया की बात तो छोड़ दें, फिलीपींस हो या पाकिस्तान- अब ये देश भी समझ गए हैं कि प्रेसीडेंट ट्रंप की धमकियों में गीदड़-भभकियां ही अधिक हैं। ऊपर से जरूरतमंद देशों को दी जाने वाली दान राशि में भी निरंतर कमी लाने का सिलसिला यूं ही चला तो कुछ समय में अमेरिका अपना रुतबा भी खो बैठेगा।
यूरोप की बात करें तो जर्मनी की महिला चांसलर एंजेला मर्केल 1 दशक से अधिक एक शक्तिशाली राजनेता के रूप में वैश्विक मंच पर उभरी थीं, परंतु अब उनके घरेलू समर्थन में गिरावट देखी गई और उनकी पार्टी अब विपक्ष की बैसाखी के साथ सत्ता में है। उधर ब्रिटेन, ब्रेक्सिट के फेर में उलझा हुआ है और उसकी सारी ऊर्जा और संसाधन इसी गुत्थी को सुलझाने में लगे हैं। फ्रांस की जनता ने बैंक के एक निवेश सलाहकार और प्रशासनिक अधिकारी को मात्र 39 वर्ष की उम्र में ही राष्ट्रपति चुन लिया। फलत: वे फ्रांस को एक राजनेता की तरह नहीं, अपितु एक प्रशासनिक अधिकारी की तरह चलाने का प्रयास कर रहे हैं। परिणाम स्पष्ट हैं।
अफ्रीका में एक महत्वपूर्ण परिवर्तन हुआ जब देश जिम्बाब्वे, क्रांतिकारी से तानाशाह बने राष्ट्रपति मुगाबे के 37 वर्षों के अधिनायकवादी शासन से आजाद हुआ। मध्य-पूर्व में विद्रोहग्रस्त सीरिया के ताप में कुछ ठंडक आती दिखी। इराक और सीरिया से क्रूर आतंकवादी संगठन ईसिस का लगभग सफाया हो जाने के दावे हैं। यमन में एक परोक्ष युद्ध चल रहा है, जहां सऊदी अरब और ईरान आमने-सामने हैं। उधर सऊदी अरब के नए युवराज मुहम्मद ने देश से भ्रष्टाचार मिटाने और व्यापक सामाजिक परिवर्तन लाने की शुरुआत इस वर्ष की।
वर्ष के अंत तक विश्व राजनीति में तब एक नया खाता खुला, जब अमेरिका ने येरुशलम को इसराइल की राजधानी के रूप में मान्यता दे दी, जो फिलिस्तीन और इसराइल के मध्य घोर विवाद का विषय है। संयुक्त राष्ट्र संघ में इस कदम का घोर विरोध हुआ और भारत भी इस विरोध के साथ रहा।

अब यदि एशिया और सुदूर पूर्व की बात करें तो इस वर्ष चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग सत्ता और पार्टी पर अपनी पकड़ मजबूत करते हुए वहां के सर्वेसर्वा हो गए और माओ के बाद चीन के सर्वाधिक शक्तिशाली चीनी नेता बने। जापान में शिंजो आबे ने समय से पहले ही आम चुनाव करवाकर सत्ता पर अपनी पकड़ मजबूत की। उत्तरी कोरिया के तानाशाह और बददिमाग राष्ट्रपति किम जोंग उन की शैतानियां और अधिक उग्र हुईं और उसने अमेरिका एवं जापान को भड़काने में कोई कसर नहीं छोड़ी। यह सिलसिला अभी जारी है।
अब अब हम अपने घर यानी दक्षिण एशियाई प्रायद्वीप में आते हैं, जहां इस वर्ष पाकिस्तान में प्रधानमंत्री नवाज शरीफ को भ्रष्टाचार के आरोप में वहां के सुप्रीम कोर्ट ने सत्ता से बाहर का रास्ता दिखाया। उधर नेपाल में भी सत्ता बदल चुकी है और वहां माओवादी शेर बहादुर देउबा प्रधानमंत्री बन चुके हैं। भारत में मोदी सरकार प्रादेशिक चुनाव-दर-चुनाव मजबूत हुई किंतु गुजरात के चुनाव परिणामों को लेकर विपक्ष में नई आशा की किरण के साथ उत्साह दिखा। रोहिंग्या मुसलमानों को लेकर म्यांमार सरकार की अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आलोचना हुई।

यों तो ये सब वे घटनाएं हैं, जो अब नेपथ्य में चली गई हैं और रंगमंच पर अब वर्ष 2018 उतरने को तैयार है। हां, नेपथ्य से भी ये घटनाएं 2018 को निश्चित रूप से प्रभावित करेंगी और हम इन प्रभावों की चर्चा अगले अंकों और समय-समय पर अपने आलेखों में करते रहेंगे।

उक्त सर्वेक्षण से स्पष्ट है कि विभिन्न देशों में उभर रहे घटनाक्रम अगले वर्ष कई अनुकूल या प्रतिकूल मोड़ ले सकते हैं। हमारी कामना है कि आज के जागरूक और चिंतनशील विश्व में ये घटनाक्रम अंतत: मानव समाज के व्यापक हितों की पूर्ति की दिशा में प्रवाहित होते रहें ताकि संसार अधिक सुखी व संपन्न जीवन की दिशा की ओर अग्रसर हो।

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