उन्मुक्त प्रेम संबंध कितने उचित?

समलैंगिकता का नया दौर

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'सेक्स' , जिसकी अनिवार्यता को तो हमारा स्वीकारता है परंतु उसके बारे में खुलकर कुछ कहने से डरता है। आज समलैंगिक संबंधों की चर्चा कानाफूसी का विषय बनकर विवादों में घिरी है। कुछ लोग इसके समर्थन में आवाज उठा रहे हैं तो कुछ लोग गुपचुप तरीके से मौन रहकर इसकी स्वीकारोक्ति कर रहे हैं।

समाज का एक वर्ग ऐसा भी है जो समलैंगिक संबंधों का विरोध केवल अपनी विचारधारा व सिद्धांतों को दुनिया को बताने के लिए कर रहा है। हो सकता है कहीं न कहीं वे भी इस प्रकार के सेक्स को अच्छा मानते हों परंतु विरोध करके सुर्खियों में आना भला किसे अच्छा नहीं लगता?

आज भी देश के कई प्रतिष्ठित व धनाढ्य परिवारों के स्त्री-पुरूष समलैंगिक संबंधों को जीते आ रहे हैं। आज इंसानों के बहस का मुद्दा है कल को हो सकता है इसी तर्ज पर पशुओं के साथ किए जाने वाले आप्राकृतिक कृत्य भी विवाद का विषय बनें।

अब इस किताब के पन्ने यदि खुल ही गए हैं तो इस किताब को बंद करने से क्या फयदा? अब हर राज को खुल जाने दो व इस मुद्दे पर खुलकर बहस करो।

के विरोधाभास में उठी यह आवाज भले ही लार्ड मैकाले द्वारा तैयार की गई 'भारतीय दण्ड संहिता' की धारा 377 को कटघरे में खड़ा कर दे परंतु अब इस विषय पर पुनर्विचार करने की महती आवश्यकता है।

* हम समलैंगिक हैं :-
'लेस्बियन' और 'गे' के रूप में पहचाने जाने वाले स्त्री-स्त्री और पुरुष-पुरुष के सेक्स संबंधों पर अब स्वीकारोक्ति की मुहर लग रही है और लोग खुलकर स्वयं का समलैंगिक होना स्वीकार कर रहे हैं।

एक सेक्स सर्वेक्षण के मुताबिक भारत जैसे देश में जहाँ विषमलैंगिकता की प्रधानता है, वहाँ 16 प्रतिशत पुरुष और 6 प्रतिशत महिलाओं ने स्वयं के समलैंगिक संबंधों को खुलकर स्वीकार किया। सर्वेक्षण में शामिल प्रति पाँच पुरुषों में से एक और दस महिलाओं में से एक ने समलैंगिकता का समर्थन किया।

यदि हम 'पोर्नोग्राफी' की बात करें तो स्त्री-पुरुषों पर इस मुद्दे को लेकर किए गए सर्वेक्षण में कुछ चौंका देने वाले मामले सामने आए जिनमें से पाँच में से तीन पुरुष व पाँच में से एक महिला ने पोर्नोग्राफी को सही ठहराते हुए उसे मान्य माना।

आज समलैंगिक संबंधों की हकीकत को उजागर करते हुए भारतीय फिल्में भी दर्शकों को इसी प्रकार के सेक्स का मीठा घूँट पिला रही है। हाल ही में प्रदर्शित फिल्म 'दोस्ताना' में जॉन अब्राहम और अभिषेक बच्चन को समलैंगिक होने का नाटक करते बताया गया है। वहीं अभिनेत्री कोंकणा सेन शर्मा भी अपनी आगामी फिल्म 'द प्रेसीडेंट इज कमिंग' में समलैंगिक का किरदार निभा रही है।

* समाज नहीं करता स्वीकार :-
समाज समलैंगिक संबंधों को एक सिरे से नकारते हुए अपने तर्कों के माध्यम से इसे अनुचित करार देता है। धर्म व मान्यताओं की दुहाई देकर समाज इस विषय पर अपने तर्क प्रस्तुत करता है। उनके अनुसार केवल एक ही प्रकार के संबंध जायज हैं और वे हैं स्त्री-पुरुष के संबंध। वह भी केवल संतनोत्तपत्ति के लिए हैं न‍ कि मनोरंजन के लिए।

यही कारण है कि हम इस विषय पर आज तक किसी ठोस निष्कर्ष पर नहीं पहुँच पाए हैं। हर बार इस विषय पर जिस जोर-शोर से बहस छिड़ती है उतनी ही जल्दी समाज के ठेकेदारों की डाँट-फटकार से यह मामला ठंडे बस्ते में कैद भी हो जाता है।

* कुछ चौंका देने वाले मामले :-
अपने ही माँ-बाप की हत्या के आरोप में फँसी मेरठ की प्रियंका सिंह व उसकी सहेली अंजू सिंह हाल ही में अपने ही रिश्तेदारों द्वारा लगाए गए समलैंगिक संबंधों के आरोपों के घेरे में भी आ चुकी हैं।

कहते हैं संबंधों के चलते ही ‍इन दोनों ने हत्या की यह साजिश रची। इस प्रकार के कई मामले आए दिन हमारे सामने आते हैं, जिनमें समलैंगिक जोड़े इन संबंधों पर समाज की पहरेदारी का खुलकर विरोध करते हैं।

कुछ समय पूर्व समलैंगिक संबंधों का एक ओर चौंका देने वाला मामला सामने आया, जिसमें अहमदाबाद की निमिषा और बिनाल ने अपने 'लेस्बियन संबंधों' को हकीकत में बदलते हुए एक-दूजे से विवाह किया। इस रिश्ते को सामान्य दिखाने के लिए निमिषा ने मर्दों का पहनावा अपनाते हुए अपना नाम भी बदलकर पिंटू भाई रख लिया। मेडिकल तकनीक से दोनों के घर पुत्र के रूप में खुशियों ने दस्तक दी।

विवाह के कुछ समय पश्चात बिनाल की मृत्यु हो गई। अब कानून के सामने निमिषा (पिंटू भाई) पिता के रूप में अपने पुत्र को अपने पास रखने की गुहार कर रही है परंतु कानूनी दाँव-पेच इस रिश्ते को स्वीकारने से इंकार करते हुए पुत्र को उसके नाना-नानी को सौंपने का समर्थन कर रहा है। यहीं पर मानव की स्वच्छदंता व कानून की तकरार में कई मासूमों की जिंदगियाँ अधर में रह जाती हैं व उन्हें अपने माँ-बाप का नाम नहीं मिल पाता।

* महानगरीय संस्कृति दे रही है बढ़ावा :-
छोटे-छोटे शहरों को तेजी से अपने आगोश में लेती महानगरीय संस्कृति युवाओं की बिंदास छवि को बढ़ावा दे रही है। पहले की तरह अब आजकल के युवा अपने मित्र या प्रेमी से सेक्स अपील करने में थोड़ी-सी भी झिझक महसूस नहीं करते।

कल तक संस्कारों की दुहाई देने वाले इस देश में आज सब कुछ खुल्लम-खुल्ला हो रहा है, जो कि हमारी संस्कृति के खिलाफ है। पश्चिमी सभ्यता का अंधानुकरण करने वाले युवाओं के लिए इस प्रकार के प्यार का अंजाम क्या होगा, इससे तो वे भी बखूबी वाकिफ हैं।

* महानगरों में है समलैंगिकों की माँग :-
भारत के बड़े-बड़े महानगरों में अब समलैंगिक एकजुट होकर अपने अधिकारों की माँग कर रहे हैं। निजामों के शहर हैदराबाद में भी समलैंगिक गे बार, याहू चैट ग्रुप गे, मित्रुदु आदि के माध्यम से एक-दूसरे से संपर्क साध रहे हैं। वहीं खुलेपन की मिसाल बना अहमदाबाद व बेंगलुरु के युवा भी खुलकर समलैंगिकता को स्वीकार कर रहे हैं।

गायत्री शर्मा|
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भले ही भारतीय कानून की नजरों में समलैंगिक संबंध अपराधों की श्रेणी में आते हैं परंतु प्यार करने वाले दो दिलों के लिए ये एक स्वाभाविक कृत्य है। 'सेक्स' और 'कामुकता' जैसे मुद्दों पर चुप्पी साधने वाला समाज इस मुद्दे पर तब तक किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुँच पाएगा जब तक वह अपनी संकीर्ण विचारधारा के दायरे से बाहर निकलकर इन मुद्दों पर खुली चर्चा नहीं करता।



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