पश्चिम बंगाल में आज शुभेंदु अधिकारी के मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने के साथ राज्य में पहली बार बीजेपी सत्ता में काबिज हो गई है। पश्चिम बंगाल में बीजेपी सरकार के गठन के साथ साल 2014 में केंद्र में मोदी सरकार के गठन के साथ मोदी-शाह की जोड़ी ने जिस अंग', 'बंग', और 'कलिंग' मिशन का आगाज किया था, वह अब पूरा हो गया है। बीते एक दशक में बीजेपी ने अपने विस्तार के लिए एक खास मॉडल अपनाया है, जिसे सरकार में आने का 'पैराशूट मॉडल' कहा जा रहा है।
दरअसल भारतीय राजनीति में पिछले एक दशक के दौरान बीजेपी ने सिर्फ वैचारिक विस्तार ही नहीं किया, बल्कि संगठनात्मक स्तर पर भी एक नई रणनीति अपनाई। यह रणनीति है सत्ता में आने का पैराशूट मॉडल”। पैराशूट मॉडल यानि पार्टी की वह रणनीति जिसमें दूसरे दलों के प्रभावशाली नेताओं को भाजपा में शामिल कर उन्हें बड़ी राजनीतिक भूमिका देना। यानि जिन राज्यों में भाजपा का संगठन मजबूत नहीं था वहां पर पहले दूसरे दलों के बड़े नेताओं की पैराशूट एंट्री कराई गई, फिर उनके चेहरे को आगे कर राज्य में संगठन खड़ा किया गया है और सत्ता में आने पर उन्हें मुख्यमंत्री पद से नवाजा गया है।
इस कड़ी में पश्चिम बंगाल में आज मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने वाले शुभेंदु अधिकारी, बिहार में भाजपा के पहले मुख्यमंत्री बनने वाले सम्राट चौधरी और असम में दूसरी बार मुख्यमंत्री बनने जा रहे हिमंता बिस्व सरमा तीन बड़े नाम शामिल है। यह तीनों नेता भाजपा की राजनीतिक प्रयोग के बड़े उदाहरण हैं। इन नेताओं की राजनीतिक यात्रा यह दिखाती है कि भाजपा अब केवल कैडर आधारित पार्टी नहीं रह गई, बल्कि वह क्षेत्रीय सामाजिक समीकरणों और स्थानीय नेतृत्व को भी अपने विस्तार का अहम माध्यम बना रही है।
ममता के करीब अब बंगाल में BJP के मुख्यमंत्री-शुभेंदु अधिकारी जिनकी गिनती ममता बनर्जी के सबसे विश्वस्त नेताओं के तौर पर होती थी वह 2020 तक टीएमसी में नंबर-2 के नेता था। शुभेंदु लंबे समय तक तृणमूल कांग्रेस का मजबूत चेहरा रहे और नंदीग्राम आंदोलन के प्रमुख नेताओं में शामिल थे। वहीं शुभेंदु अधिकारी के भाजपा में शामिल होने के बीच भी एक सियासी कहानी है। 2021 के विधानसभा चुनाव से पहले साल 2020 में जब टीएमसी में रणनीतिक सहयोगी के तौर पर प्रशांत किशोर और उनकी कंपनी I-PAC की एंट्री हुई तो अचानक से पार्टी में ममता बनर्जी के भतीजे अभिषेक बनर्जी का कद बढ़ना शुरु हुआ, तो शुभेंदु अधिकारी ममता का साथ छोड़ भाजपा में शामिल हो गए।
2020 में भाजपा में शामिल होने के बाद उन्होंने सीधे 2021 के विधानसभा चुनाव में मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को नंदीग्राम में चुनौती दी और चुनाव में उन्हें हराकर राष्ट्रीय राजनीति में सुर्खियों में आ गए। 2021 में भाजपा को वह सफलता नहीं मिली जिसे वह सत्ता में आ सके लेकिन शुभेंदु पश्चिम बंगाल में भाजपा की राजनीति का केंद्रीय चेहरा बन गए। भाजपा ने उनके जरिए यह समझा कि बंगाल में केवल वैचारिक राजनीति से काम नहीं चलेगा, बल्कि स्थानीय जनाधार वाले नेताओं की भी जरूरत है। इस बार विधानसभा चुनाव में शुभेंदु अधिकारी ने ममता बनर्जी को उनके ही गढ़ भवानीपुर में हराकर पश्चिम बंगाल में भाजपा की सरकार की इबारत लिख दी।
हिमंता बिस्व सरमा बीजेपी का नया हिंदुत्व चेहरा- वहीं असम में भाजपा की दूसरी बार सत्ता में काबिज कराने वाले हिमंता बिस्व सरमा भाजपा के पैराशूट मॉडल की सबसे ब़ड़ी मिसाल माने जाते हैं। कभी कांग्रेस में तरुण गोगोई सरकार के सबसे प्रभावशाली मंत्री रहे हिमंता ने 2015 में कांग्रेस छोड़कर भाजपा का दामन थाम लिया था। उस समय इसे केवल व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा का फैसला माना गया, लेकिन बाद की राजनीति ने साबित किया कि भाजपा ने पूर्वोत्तर की राजनीति को बदलने के लिए उन्हें रणनीतिक रूप से इस्तेमाल किया। हिमंता ने न केवल असम में भाजपा को मजबूत किया, बल्कि पूर्वोत्तर के कई राज्यों में पार्टी के विस्तार में केंद्रीय भूमिका निभाई। आज वे भाजपा के सबसे प्रभावशाली मुख्यमंत्रियों में गिने जाते हैं। असम विधानसभा चुनाव में भाजपा को दूसरी बार प्रचंड बहुमत से सरकार बनाकर उन्होंने एक बार मोदी-शाह के निर्णय को सही साबित कर दिया है।
2017 में पैराशूट एंट्री, अब बीजेपी के पहले 'सम्राट'- पश्चिम बंगाल से ठीक पहले बिहार में पहली बार बीजेपी के मुख्यमंत्री के तौर पर शपथ लेने वाले सम्राट चौधरी भी भाजपा की इसी रणनीति का हिस्सा है। सम्राट चौधरी मूल रूप से राष्ट्रीय जनता दल के कार्यकर्ता और नेता था और बाद में नीतीश के साथ आकर सत्ता का स्वाद चखा। वह साल 2017 में भाजपा में शामिल हुए। इसके बाद वह बिहार भाजपा के अध्यक्ष और बाद में नीतीश सरकार में उपमुख्यमंत्री बने। सम्राट चौधरी बीजेपी की गिनती उन मुख्यमंत्रियों के तौर पर है जो आरएसएस की पृष्ठभूमि से नहीं आते हैं। उनके पिता शकुनी चौधरी ख़ुद समता पार्टी के संस्थापक सदस्यों में से एक थे। शकुनी चौधरी का नाम कुशवाहा समाज के बड़े नेताओं में शुमार है और वो ख़ुद भी विधायक और सांसद रहे वहीं सम्राट चौधरी की गिनती भी राज्य के कुशवाहा समाज के बड़े नेताओं पर होती है।
दरअसल बिहार जैसे सामाजिक समीकरणों वाले राज्य में भाजपा को ऐसे नेताओं की जरूरत है जो क्षेत्रीय जातीय राजनीति को समझते हों। सम्राट चौधरी को आगे बढ़ाकर भाजपा ने ओबीसी राजनीति में अपनी पकड़ मजबूत करने की कोशिश की और अब वह राज्य में बीजेपी के पहले मुख्यमंत्री के तौर पर इसे मजबूत भी कर रहे है।
इन तीनों उदाहरणों से भाजपा की राजनीति में आए बदलाव को समझा जा सकता है। एक समय भाजपा अपने मूल संगठन और वैचारिक प्रतिबद्धता को सबसे ऊपर रखती थी। पार्टी में वर्षों काम करने वाले कार्यकर्ताओं को ही शीर्ष पद मिलते थे। लेकिन नरेंद्र मोदी और अमित शाह के नेतृत्व में भाजपा ने अधिक व्यावहारिक राजनीति अपनाई। अब पार्टी चुनावी जीत को प्राथमिकता देती है और इसके लिए दूसरे दलों से प्रभावशाली नेताओं को शामिल करने में कोई हिचक नहीं दिखाती। ऐसे राज्य जहां भाजपा का संगठन कमजोर था वहां पर भाजपा ने सत्ता में आने का पैराशूट मॉडल बनाया और फिर सत्ता में काबिज हुई। भाजपा की चुनावी सफलता यह संकेत देती है कि फिलहाल यह रणनीति कारगर साबित हो रही है। भाजपा समझ चुकी है कि क्षेत्रीय नेतृत्व, जातीय समीकरण और स्थानीय राजनीतिक प्रभाव भी महत्वपूर्ण हैं। हिमंता, सम्राट और शुभेंदु जैसे नेता भाजपा के लिए केवल चेहरे नहीं हैं, बल्कि वे उन सामाजिक और क्षेत्रीय समूहों तक पहुंच का माध्यम हैं जहां पार्टी पहले कमजोर मानी जाती थी।