मटका किंग का सबसे बड़ा आकर्षण इसका विषय है क्योंकि यह भारत में सट्टेबाजी के सबसे चर्चित नाम रतन खत्री से प्रेरित कहानी है। सीरिज में इस किरदार को ब्रिज भट्टी के नाम से पेश किया गया है, जो पाकिस्तान से भारत आकर छोटी नौकरी से शुरुआत करता है और फिर ताश के पत्तों के सहारे एक ऐसा नंबर गेम खड़ा करता है, जो मुंबई से निकलकर पूरे देश में फैल जाता है। मिल मजदूरों से लेकर पांच सितारा होटलों के अमीरों तक, हर कोई इस खेल में अपनी किस्मत आजमाता है।
ब्रिज का किरदार इस अवैध धंधे को एक ईमानदार जुए के रूप में पेश करता है, जहां जीतने वाले को पूरा पैसा मिलता है। यही भरोसा उसे भीड़ से अलग करता है और धीरे-धीरे वह एक मसीहा जैसी छवि बना लेता है।
जैसे-जैसे ब्रिज का साम्राज्य फैलता है, वैसे-वैसे सिस्टम उसके खिलाफ खड़ा होता नजर आता है। महाराष्ट्र सरकार खुद की लॉटरी शुरू कर देती है, पुलिस, नेता और बॉलीवुड के लोग उससे वसूली करने लगते हैं। नोटिस, पूछताछ और दबाव, ब्रिज की दुनिया पर शिकंजा कसने लगता है।
लेकिन असली टकराव सिर्फ बाहर नहीं, भीतर भी है। पैसा आते ही रिश्ते टूटने लगते हैं। पत्नी, भाई और करीबी लोग उससे दूर होने लगते हैं। निर्देशक नागराज मंजुले इन सभी परतों को आठ एपिसोड में पिरोने की कोशिश करते हैं, लेकिन असर उतना गहरा नहीं हो पाता जितना होना चाहिए था।
सीरिज की सबसे बड़ी कमजोरी इसका फ्लैट नैरेशन है। जहां कहानी में जबरदस्त उतार-चढ़ाव की गुंजाइश थी, वहां ज्यादातर सीन सपाट नजर आते हैं। आगे क्या होने वाला है, इसका अंदाजा आसानी से लगाया जा सकता है, जिससे रोमांच कम हो जाता है।
कुछ सी, जैसे फ्लाइट में या पुलिस स्टेशन में ब्रिज का नंबर खोलना, जरूर ध्यान खींचते हैं, लेकिन ऐसे पल गिने-चुने हैं।
ब्रिज को सिंधी दिखाया गया है, लेकिन उसके परिवार और बैकग्राउंड को विश्वसनीय तरीके से नहीं रचा गया। एक समय के बाद कहानी ठहर जाती है और ऐसा लगता है कि सिर्फ एपिसोड बढ़ाने के लिए इसे खींचा जा रहा है।
सबसे बड़ी कमी यह है कि मटका गेम कैसे काम करता है, इसे ठीक से समझाया ही नहीं गया। जो दर्शक इस खेल से अनजान हैं, उनके लिए यह कन्फ्यूजिंग बन जाता है। यहां एक-दो एपिसोड पूरी तरह इस सिस्टम को समझाने पर होने चाहिए थे।
नागराज मंजुले ने कहानी को बेहद धीमी गति से आगे बढ़ाया है। ब्रिज को एक ईमानदार अपराधी और कभी-कभी मसीहा के रूप में पेश करना दिलचस्प जरूर है, लेकिन इसे और गहराई दी जा सकती थी।
बजट की कमी भी कई जगह साफ नजर आती है। सेट्स नकली लगते हैं और कार वाले सीन पुराने जमाने की फिल्मों की याद दिलाते हैं।
सीरिज की कास्टिंग भी थोड़ा खटकती है। विजय वर्मा और सई तम्हाणकर जैसे शानदार कलाकार यहां उम्मीद के मुताबिक प्रभाव नहीं छोड़ पाते। विजय वर्मा का अभिनय बेहद सपाट लगता है, जबकि सई भी खास रंग नहीं भर पातीं।
वहीं कृतिका कामरा अपनी परफॉर्मेंस से प्रभावित करती हैं। सिद्धार्थ जाधव और गिरीश कुलकर्णी भी अपने किरदारों में जमे हैं। गुलशन ग्रोवर एक बार फिर बैडमैन की छवि से बाहर नहीं निकल पाते।
मटका किंग एक ऐसी सीरिज है, जिसका विषय बेहद दिलचस्प और संभावनाओं से भरा हुआ था। रतन खत्री से प्रेरित कहानी दर्शकों को बांध सकती थी, लेकिन कमजोर प्रेजेंटेशन, धीमी रफ्तार और अधूरी व्याख्या इसे औसत बना देती है।
यह सीरिज देखी जा सकती है, लेकिन सिर्फ इसके दिलचस्प किरदार और बैकस्टोरी के लिए, न कि इसके ट्रीटमेंट के लिए।