मुजफ्फरनगर में कांवड़ यात्रा का बदला रंग, बेटियां भी उठा रहीं डाक कांवड़, परिवार और भाइयों का मिला साथ
सावन शुरू होते ही पहले समय कदम्ब की डाली, आम के पेड़ पर झूलों की आहट सुनाई देती थी। कानों में महिलाओं के लोक संगीत 'झूला तो पड़ गया अम्बुआ की डाल पे जी' सुनाई देने लगता था। लेकिन समय ने करवट लेते हुए महिलाओं को कांवड़.यात्रा का हिस्सा बना दिया। एक समय में कांवड़ यात्रा को केवल पुरुषों की परंपरा माना जाता था, लेकिन अब तस्वीर तेजी से बदल रही है जहां महिलाएं भी कंधे से कंधा मिलाकर पुरूषों के साथ हरिद्वार से गंगाजल लेकर पैदल यात्रा करती दिखाई दे रही है।
इसबार कांवड़ यात्रा में देश की बेटियों ने भी कुछ अलग कर दिखाने की मन में ठान ली। जिसके चलते हरिद्वार से हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के विभिन्न जिलों से बड़ी संख्या में बेटियां डाक कांवड़ लेने निकल पड़ी। यह बेटियां पूरे जोश, आत्मविश्वास और अनुशासन के साथ अपने कांवड़ सफर पर रवाना हुईं। इन बेटियों के कदमों में आस्था और चेहरे पर आत्मविश्वास की झलक साफ दिखाई दे रही है, वही उनकी सुरक्षा का जिम्मा उनके भाईयों ने उठाया है।
डाक कांवड़ ला रही इन युवतियों में कई सेना, अर्धसैनिक बल और पुलिस भर्ती की तैयारी कर रही हैं, तो कुछ राष्ट्रीय स्तर की खिलाड़ी हैं। कबड्डी, कुश्ती और वेटलिफ्टिंग जैसे खेलों में लगातार पसीना बहाने वाली इन बेटियों का कहना है कि डाक कांवड़ की कठिन यात्रा उनके लिए केवल धार्मिक आस्था और विश्वास नही है, बल्कि यह उनके शारीरिक क्षमता, मानसिक मजबूती और अनुशासन की परीक्षा की भी घड़ी है।
हरियाणा के साथ-साथ मेरठ, बागपत, बिजनौर, सहारनपुर, बुलंदशहर और आसपास के जिलों से पहुंचीं युवतियां अलग-अलग टोलियों में हरिद्वार से गंगाजल लेकर अपने गंतव्य की तरफ दौड़ती नजर आईं। इनमें दो सगी बहनें विशेष आकर्षण का केंद्र रहीं, जो 71 लीटर गंगाजल के साथ डाक कांवड़ ला रही हैं। एक बहन वेटलिफ्टर है, जबकि दूसरी राष्ट्रीय स्तर की कबड्डी खिलाड़ी। उनकी मेहनत और संकल्प ने राह चलते अन्य बेटियों के लिए भी प्रेरणा के द्वार खोलेगी।
डाक कांवड़ लाने वाली बेटियों का सफर आसान नहीं था। जब उन्होंने पहली बार डाक कांवड़ लाने की इच्छा अपने परिवार के सामने रखी, तो पहले परिवार तैयार नही हुए, कई घरों ने बेटियों सुरक्षा को की चिंता जताई और उन्हें इजाजत देने से इंकार कर दिया। ऐसे समय में भाइयों ने अपने बहनों के फैसले का स्वागत करते हुए सुरक्षा का वादा देकर उनका हाथ थाम लिए या। उन्होंने परिवार को भरोसा दिलाया कि जब उनकी बहनें डाक कांवड़ लेकर चलेंगी और वे पूरी यात्रा में उनकी सुरक्षा और सहयोग के लिए हर कदम पर साथ रहेंगे। भाइयों के इस विश्वास ने बहनों का आत्मबल मजबूत कर दिया, बहनों ने इसे रक्षाबंधन का गिफ्ट मान लिया।
कांवड़ मार्ग पर इन बेटियों को समाज का भरपूर स्नेह मिल रहा है। जगह-जगह स्थानीय लोगों ने तालियां बजाकर उनका स्वागत किया, जबकि पुलिसकर्मियों ने भी उनका उत्साह बढ़ाया। एक पुलिस अधिकारी के प्रेरणादायी शब्द युवतियों के दिल को छू गए। उन्होंने कहा, "बेटियों को उड़ान भरने दीजिए, यही नई पीढ़ी मजबूत भारत की पहचान बनेगी और देश को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाएगी।" युवतियों का कहना है कि इस तरह के प्रोत्साहन ने उनकी थकान को ऊर्जा में बदल दिया और लक्ष्य तक पहुंचने का संकल्प और मजबूत कर दिया।
यह दृश्य केवल कांवड़ यात्रा का नहीं, बल्कि बदलते भारत समाज की सोच का भी प्रतीक है। जहां परिवार भरोसा देता है, भाई सुरक्षा का संबल बनते हैं और समाज सम्मान के साथ बेटियों का उत्साह बढ़ाता है, वहां बेटियां हर चुनौती को अवसर में बदलकर नई मिसाल कायम करती हैं।

