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क्या तमिलनाडु में राष्ट्रपति शासन संभव है? त्रिशंकु विधानसभा की स्थिति में राज्यपाल के सामने कौन से विकल्प हैं?

Is President Rule possible in Tamil Nadu
चेन्नई/नई दिल्ली: तमिलनाडु की राजनीति में हालिया घटनाक्रमों ने एक बार फिर संवैधानिक नैतिकता और राज्यपाल की शक्तियों पर बहस छेड़ दी है। तमिलगा वेत्री कड़गम (TVK) के अध्यक्ष सी. जोसेफ विजय और राज्यपाल राजेंद्र विश्वनाथ अर्लेकर के बीच हालिया संवाद ने 'त्रिशंकु विधानसभा' (Hung Assembly) की स्थिति में सरकार गठन की जटिलताओं को सतह पर ला दिया है।

क्या है ताजा विवाद?
राज्यपाल राजेंद्र विश्वनाथ अर्लेकर ने स्पष्ट किया है कि वर्तमान में राज्य विधानसभा में सरकार बनाने के लिए आवश्यक बहुमत का समर्थन स्थापित नहीं हो पाया है। राज्यपाल का यह रुख इस सिद्धांत पर आधारित है कि उनकी पहली प्राथमिकता एक 'स्थिर सरकार' का गठन करना है। यदि कोई भी दल बहुमत साबित नहीं कर पाता, तो राज्य 'संवैधानिक तंत्र की विफलता' की ओर बढ़ सकता है, जिससे अनुच्छेद 356 के तहत राष्ट्रपति शासन का मार्ग प्रशस्त हो सकता है। ALSO READ: तमिलनाडु में बड़ा सियासी गेम, DMK की शर्त ने बढ़ाई ADMK की उलझन, TVK को छोटे दलों से उम्मीद

त्रिशंकु विधानसभा: राज्यपाल के पास क्या हैं विकल्प?
जब किसी भी दल को स्पष्ट बहुमत नहीं मिलता, तो राज्यपाल को अपनी विवेकपूर्ण शक्तियों का उपयोग करना पड़ता है। सरकारिया आयोग और सर्वोच्च न्यायालय के दिशा-निर्देशों के अनुसार, वरीयता का क्रम इस प्रकार होना चाहिए:

चुनाव-पूर्व गठबंधन: सबसे पहले उन दलों के गठबंधन को आमंत्रित करना जिन्होंने चुनाव साथ मिलकर लड़ा हो और जिनके पास सर्वाधिक सीटें हों।

सबसे बड़ा अकेला दल: वह पार्टी जो सबसे अधिक सीटें जीतकर आई हो और अन्य के समर्थन से बहुमत का दावा पेश करे।

चुनाव-पश्चात गठबंधन: चुनाव के बाद बना नया गठबंधन, जो सदन में बहुमत दिखाने में सक्षम हो। ALSO READ: तमिलनाडु में AIADMK में बवाल, विजय के समर्थन में पलानीसामी के 30 विधायक?

सर्वोच्च न्यायालय के ऐतिहासिक फैसले और राज्यपाल की सीमाएं
भारत के न्यायिक इतिहास में दो बड़े फैसले राज्यपाल की शक्तियों और राष्ट्रपति शासन की संभावनाओं को परिभाषित करते हैं:

1. एस.आर. बोम्मई मामला (1994):
नौ न्यायाधीशों की पीठ ने स्पष्ट किया था कि राज्यपाल को विकल्पों की तलाश करनी चाहिए। यदि सभी विकल्प विफल हो जाते हैं और कोई भी दल स्थिर सरकार बनाने में सक्षम नहीं होता, तभी इसे संवैधानिक तंत्र की विफलता माना जाएगा। अदालत ने कहा था कि राज्यपाल को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि दलबदल जैसी गतिविधियों को बढ़ावा न मिले।

2. रामेश्वर प्रसाद बनाम भारत संघ:
सात न्यायाधीशों की पीठ ने राज्यपालों द्वारा 'पक्षपातपूर्ण राजनीति' करने के खिलाफ चेतावनी दी थी। अदालत ने पाया था कि अक्सर अनुच्छेद 356 का उपयोग केंद्र में सत्ताधारी दल के राजनीतिक हितों को साधने के लिए किया जाता रहा है।

'कूलिंग-ऑफ पीरियड' की आवश्यकता: 
अदालत ने एक महत्वपूर्ण टिप्पणी 'कूलिंग-ऑफ पीरियड' को लेकर भी की थी। अक्सर सक्रिय राजनीति से तुरंत निकले नेताओं को राज्यपाल बना दिया जाता है, जिससे उनकी 'तटस्थता' पर सवाल उठते हैं। रामेश्वर प्रसाद मामले में कहा गया था कि बिना किसी अंतराल के राज्यपाल नियुक्त किए गए व्यक्ति से दलीय राजनीति से ऊपर उठकर काम करने की उम्मीद करना कठिन होता है।

क्या तमिलनाडु में राष्ट्रपति शासन लगेगा?
विशेषज्ञों का मानना है कि राष्ट्रपति शासन 'अंतिम विकल्प' होना चाहिए। जैसा कि सर्वोच्च न्यायालय ने कहा है, गठबंधन सरकारें अब अपवाद नहीं बल्कि नियम बन गई हैं। यदि सी. जोसेफ विजय या कोई अन्य समूह वैचारिक समानता के आधार पर चुनाव-पश्चात गठबंधन के माध्यम से बहुमत साबित कर देता है, तो राज्यपाल उसे सरकार बनाने से नहीं रोक सकते। तमिलनाडु में राष्ट्रपति शासन तभी संभव है जब राज्यपाल पूरी तरह आश्वस्त हो जाएं कि कोई भी दल या 'समूह' (चाहे चुनाव-पूर्व हो या बाद का) एक स्थिर सरकार देने की स्थिति में नहीं है। हालांकि, राज्यपाल को 'उचित समय' देना अनिवार्य है, लेकिन यह समय इतना लंबा भी नहीं होना चाहिए कि लोकतांत्रिक मूल्यों का हनन हो।

संपादकीय नोट: यह लेख संवैधानिक प्रावधानों, सरकारिया आयोग की रिपोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक निर्णयों के विश्लेषण पर आधारित है।
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