यात्रा संस्मरण : मेरी दक्षिण की यात्रा

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मोबाइल पर एयरटेल का संदेश आने पर कि- तमिलनाडू में आपका स्वागत है, पता चला कि हम एक स्टेट की सीमा पार कर चुके हैं। अब हम कन्याकुमारी में थे। नेट पर समुद्र के बीच खड़ा विवेकानंद स्मारक, कन्याकुमारी के श्रृंगार होटल की छत से दिखाई दे रहा विवेकानंद स्मारक, तमिल कवि थिरूवेलूवर की समृद्धि और स्नेह का प्रतिनिधित्व कर रहा 133 फुट ऊॅंचा भव्य स्मारक- आमंत्राण पर आमंत्रण दे रहे थे। नेशनल हाईवे पर खड़ा श्रृंगार होटल समुद्र तट के पास ही था। शाम को ही हम वहां आ जुटे। सब जगमगा रहा था। फोटो लेने का सोच ही रही थी, कि सारी लाइट्स बुझ गई। अगली सुबह साढ़े सात ही जाकर हम लाईन में लग गए। सात पैंतालीस पर टिकटों का वितरण शुरू हुआ।
> इतनी लम्बी लाइन और फिर फेरी (नौका) की भीड़। यहां अधिकांश स्थानीय लोग ही थे। औरतें बिना फॉल की गहरे चुभते रंगों की साड़ियां पहनें थी और पुरुष लगभग धोती अंगोछा लिए थे। फेरी में बैठते ही लोग लगातार कुछ गाने लगे थे। क्या गा रहे थे, यह तो स्पष्ट नहीं, पर जैसे उत्तर भारत में वैष्णो देवी की यात्रा के समय जय जयकार करते जाते हैं, वैसा ही कुछ लग रहा था। हम सागर के उस पाइंट पर पहुंच चुके थे, जहां तीन समुद्र मिलते हैं- अरब महासागर, बंगाल की खाड़ी और हिन्द महासागर। त्रिवेणी में लोग स्नान कर रहे थे। स्वामी विवेकानंद रॉक मेमोरियल 1970 में बनाकर इस महान संत और सुधारक को समर्पित कर दिया गया। अब पुम्पुहर शिपिंग कॉर्पोरेशन व्दारा स्मारक के लिए, फेरी सेवा आयोजित थी। सागर किनारे से जरा सा दूर, दो विशालकाय चट्टानों पर स्मारक बने थे। थिरूवेलूवर ने थिरूकुरल नामक धार्मिक पुस्तक लिखी थी, जिसके 133 अध्यायों में 1330 कविताएं हैं,  और पास ही विवेकानंद स्मारक। यहीं पर देवी कन्याकुमारी का मंदिर था। खचाखच भरा हुआ बाजार और शंकराचार्य बगीचा मंडप था।
 
कोवलम तो शुद्ध यात्रा स्थल ही था। होटल 'समुद्रा' मीलों फैला लग रहा था। समुद्र का एक किनारा होटल के अंदर था। बड़े बड़े पार्क, सजे धुले-पुंछे पेड, पौधे, पत्थर, चट्टानें थी। बीच पर उतरने की खूबसूरत सीढ़ियां थी। ओपन एअर डिनर की व्यवस्था थी। छोटी बच्चियों के कत्थक थे। शरीर को तरोताजा करने वाले आयुर्वेदिक मसाज केन्द्र थे। लगभग सौ कमरों के इस होटल में मुख्यतः ऐसे अंग्रेज यात्री थे, जिन्हें हमारी पांच हजार वर्ष पुरानी आयुर्वेदिक चिकित्सा प्रणाली से शरीर, मन और आत्मा तक को शुद्ध और स्वस्थ करने के चमत्कार देखने थे। इन उपचार विधियों में शिरोवस्थी, अभियानम्‌, धारा, उदराथानम् आदि कई प्रकार थे। दूसरे समुद्री किनारों का चक्कर भी लगाया, पर वहां की भीड़-भाड़ से अपने होटल का किनारा ही अच्छा लगा।
 
वापसी का सफर लगभग शुरू हो गया था। त्रिवेंद्रम से दिल्ली की फ्लाइट लगभग चार घंटे की थी। सुना था, कि राजधानी दिल्ली में 2005 में बना अक्षरधाम मंदिर, देश का अव्दि‍तीय मंदिर है। पर देखकर ही पता चला कि भारतीय कला, प्रज्ञा, चिंतन, मूल्य यहां किस प्रकार संचित एवं आरक्षित किए गए हैं। मैथिली शरण गुप्त की- 'भारत भारती' का मानों यह अगला चरण है। (वह पुण्य भूमि प्रसिद्ध है, जिसके निवासी आर्य हैं, विद्या कला कौशल्य के जो प्रथम आचार्य हैं।) श्वेत और गुलाबी पत्थर से बने इस मंदिर को श्री भगवान स्वामी नारायण की पुण्य स्मृति में प्रमुख स्वामी महाराज व्दारा पांच वर्ष में आकार दिया गया। सौ एकड़ भूमि में फैले इस मंदिर के निर्माण में 7000 व्यक्तियों की बुद्धि एवं क्रियाओं का योगदान रहा । 22 एकड़ में तो उपवन ही फैले थे। उपवन खंडों में हरे रंग के विभिन्न शेड आकर्षित कर रहे थे। कनाट प्लेस से मात्र 15 मिनट की दूरी पर इतना शान्त एवं दिव्य लोक भी बसा हो सकता है, इसका बिल्कुल अनुमान नहीं था। दृश्य और श्रव्य हर रूप में यहां सूत्र (विचार) वाक्य ही बिखरे थे। दशव्दार के बाद हम भक्ति व्दार से निकले। इस भक्ति व्दार पर भक्ति एवं उपासना के 208 युगल स्वरूप मंडित थे। आगंतुकों का स्वागत करने वाला अगला व्दार- मयूर व्दार था। यहां सभी तोरण और स्तंभ 869 मयूरों का आनंदनृत्य प्रस्तुत कर रहे थे। महालय में भगवान स्वामी नारायण की पंचधातु निर्मित, स्वर्ण मंडित 11 फुट ऊॅंची प्रतिमा के अलावा लक्ष्मी नारायण, सीता राम, राधा कृष्ण, पार्वती महादेव की भी संगमरमर की प्रतिमाएं थी। महालय की बाहरी दीवार पर भारतीय ऋषियों, आचार्यों, देवताओं एवं महापुरुषों की स्थापना की गई थी। पत्थरों पर लोक कथाएं, पौराणिक आख्यान तराशे हुए थे।
 
ऐसी झलकियां तो हमें कहीं न कहीं दक्षिण के मंदिरों में भी मिल चुकी थी। अद्भुत था, यहां का प्रदर्शनी खंड। इसके भी तीन भाग थे- सहजानंद दर्शन, नीलकंठ दर्शन एवं संस्कृति विहार। सहजानंद दर्शन में भगवान स्वामी नारायण के जीवन प्रसंगों को रोबसेटिक्स, एनीमेट्रोनिक्स, ध्वनि प्रकाश, सराउण्ड डायोरामा आदि आधुनिक तकनीकों व्दारा प्रस्तुत करते हुए श्रद्धा, करुणा, शान्ति के सनातन मूल्यों का संदेश दिया गया था। सब मंत्रमुग्ध कर रहा था, हृदय ही नहीं, समस्त इद्रियों को प्रभावित कर रहा था। नीलकंठ दर्शन में बड़े पर्दे पर चालीस मिनट में बालयोगी नीलकंठ की जीवनयात्रा प्रस्तुत की गई थी। जिसकी शूटिंग 108 दृश्य स्थलों पर, 45000 पात्रों व्दारा संपन्न की गई थी। इस फिल्मांकन में उन्नीसवीं शताब्दी के भारत की झलक के साथ-साथ तीर्थस्थलों, सांस्कृतिक परंपराओं तथा उच्चत्तम जीवन मूल्यों का समाहार था।
 
संस्कृति विहार के लिए हम फिर लाइन में लग गए। खाना-पीना तो दूर, पानी की बोतल तक साथ ले जाना वर्जित था। सब तरफ खामोशी थी। यह नौका विहार का सेशन था। चौदह मिनट के लिए सरस्वती नदी के तट पर विहार का आयोजन था। दस हजार वर्ष पुरानी भारतीय संस्कृति को यहां आठ सौ पुतलों तथा अन्य अनेक उपक्रमों से मूर्त किया गया था। पूरा नौका विहार प्रत्येक भारतीय के अंदर आत्मविश्वास जगा रहा था, कि विश्व में तुम ही श्रेष्ठ हो। रात की गाड़ी से वापसी रही। आश्चर्य, कि थकान का नाम तक नहीं था।
 
 
 
 



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