पांच कर्तव्यों में सिमटा हिन्दू धर्म

अनिरुद्ध जोशी 'शतायु'|
कर्तव्यों का विशद विवेचन धर्मसूत्रों तथा स्मृतिग्रंथों में मिलता है। हम यहां पर सभी को समेटकर संक्षिप्त रूप में प्रस्तुत कर रहे हैं। ये कर्तव्य है-1.संध्योपासन, 2.उत्सव, 3.तीर्थ, 4.संस्कार और 5.धर्म-कर्म। प्रत्येक हिन्दू को इनका नियमपूर्वक पालन करना चाहिए।
1.संध्योपासन- संध्योपासन अर्थात संध्या वंदन। संध्या वंदन आठ प्रहर (दिन के चार प्रहर- पूर्वान्ह, मध्यान्ह, अपरान्ह और सायंकाल। रात के चार प्रहर- प्रदोष, निशिथ, त्रियामा एवं उषा) में से दो पूर्वान्ह और सायंकाल प्रहर की मुख्य होती है। संध्या वंदन के कुछ तरीके हैं- 1.प्रार्थना-स्तुति, 2.ध्यान-साधना, 3.पूजा-आरती और 4.भजन-कीर्तन।
 
2.उत्सव:- पर्व-त्योहार को उत्सव की श्रेणी में रखा गया है। उन त्योहार, पर्व या उत्सव को मनाने का महत्व अधिक है जिनकी उत्पत्ति स्थानीय परम्परा या संस्कृति से न होकर जिनका उल्लेख धर्मग्रंथों में मिलता है। पर्वों में सूर्य-चंद्र की संक्रांतियों और कुम्भ का अधिक महत्व है। प्रत्येक ऋतु में एक उत्सव है। *चैत्र और बैसाख में बसंत ऋतु के मास हैं। बसंत ऋतु में होली, धुलेंडी, रंगपंचमी, बसंत पंचमी, बड़ी नवरात्रि, रामनवमी, नव-संवत्सर, हनुमान जयंती और गुरु पूर्णिमा प्रमुख है। *ज्येष्ठ और आषाढ़ 'ग्रीष्म ऋतु' के मास हैं। इस माह में निर्जला एकादशी, वट सावित्री व्रत, शीतलाष्टमी, देवशयनी एकादशी और गुरु पूर्णिमा आदि व्रत आते हैं। *श्रावण और भाद्रपद 'वर्षा ऋतु' के मास हैं। इस ऋतु में रक्षाबंधन और कृष्ण जन्माष्टमी सबसे बड़े त्योहार हैं। *आश्विन और कार्तिक के मास 'शरद ऋतु' के मास हैं। इस ऋतु के त्योहार हैं- छोटी नवरात्रि, दशहरा और श्राद्ध पक्ष, छठ पूजा जबकि व्रत हैं- गोपाष्टमी, अक्षय नवमी, देवोत्थान एकादशी, बैकुंठ चतुर्दशी, कार्तिक पूर्णिमा, उत्पन्ना एकादशी, विवाह पंचमी, स्कंद षष्ठी आदि। *हेमंत ऋतु में कार्तिक, अगहन और पौष मास आते हैं। कार्तिक मास में धनतेरस, रूप चतुर्दशी, दीपावली, गोवर्धन पूजा, भाई दूज आदि त्योहार हैं जबकि करवा चौथ व्रत। कार्तिक स्नान पूर्ण होकर दीपदान होता है। *शिशिर ऋतु हिन्दू माह के माघ और फाल्गुन के महीने अर्थात पतझड़ माह में आती है। इस ऋतु में मकर संक्रांति का त्योहार आता है, जो हिन्दू धर्म का सबसे बड़ा त्योहार माना जाता है। इस दिन सूर्य दक्षिणायन से उत्तरायण होना शुरू होता है। इसी ऋतु में हिन्दू मास फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी को महाशिवरात्रि का महापर्व मनाया जाता है। इसके अलावा कुंभ का महापर्व है- कुंभ का आयोजन प्रत्येक 12 साल के अंर्तगत 4 बार किया जाता है अर्थात हर 3 साल में एक बार 4 अलग-अलग स्‍थानों पर कुंभ लगता है। अर्द्धकुंभ मेला प्रत्येक 6 साल में हरिद्वार और प्रयाग में लगता है जबकि पूर्णकुंभ हर 12 साल बाद केवल प्रयाग और उज्जैन में ही लगता है। 
 
3.तीर्थ- तीर्थ और तीर्थयात्रा का बहुत पुण्य है। कौन-सा है एक मात्र तीर्थ? तीर्थाटन का समय क्या है? ‍जो मनमाने तीर्थ और तीर्थ पर जाने के समय हैं उनकी यात्रा का सनातन धर्म से कोई संबंध नहीं। तीर्थों में कैलाश मानसरोवर, अमरनाथ, चार धाम, सप्तपुरी, द्वादश ज्योतिर्लिंग और 51 शक्तिपीठ ही प्रमुख है। चार धार्म की यात्रा में सभी के दर्शन हो जाते हैं। चार धाम:- बद्रीनाथ, द्वारका, रामेश्वरम, जगन्नाथ पुरी। द्वादश ज्योतिर्लिंग:- सोमनाथ, द्वारका, महाकालेश्वर, श्रीशैल, भीमाशंकर, ॐकारेश्वर, केदारनाथ विश्वनाथ, त्र्यंबकेश्वर, रामेश्वरम, घृष्णेश्वर, बैद्यनाथ। सप्तपुरी- काशी, मथुरा, अयोध्या, द्वारका, माया, कांची और अवंति (उज्जैन)।
 
4.संस्कार:- संस्कारों के प्रमुख प्रकार सोलह बताए गए हैं जिनका पालन करना हर हिंदू का कर्तव्य है। इन संस्कारों के नाम है-गर्भाधान, पुंसवन, सीमन्तोन्नयन, जातकर्म, नामकरण, निष्क्रमण, अन्नप्राशन, मुंडन, कर्णवेधन, विद्यारंभ, उपनयन, वेदारंभ, केशांत, सम्वर्तन, विवाह और अंत्येष्टि। प्रत्येक हिन्दू को उक्त संस्कार को अच्छे से नियमपूर्वक करना चाहिए। यह हमारे सभ्य और हिन्दू होने की निशानी है।
 
5.धर्म-कर्म:- धर्म-कर्म का अर्थ यह कि हम ऐसा कार्य करें जिससे हमारे मन और मस्तिष्क को शांति मिले और हम मोक्ष का द्वार खोल पाएं। ऐसा कार्य जिससे परिवार, समाज, राष्ट्र और स्वयं को लाभ मिले। धर्म को पांच तरीके से साधा जा सकता है- 1.व्रत, 2.सेवा, 3.दान, 4.यज्ञ और 5.धर्म प्रचार।
 
व्रत:- चतुर्मास व्रत का माह हैं। उक्त 4 माह हैं- श्रावण, भाद्रपद, आश्‍विन और कार्तिक। चातुर्मास के प्रारंभ को 'देवशयनी एकादशी' कहा जाता है और अंत को 'देवोत्थान एकादशी'। इसमें श्रावण और कार्तिक सबसे महत्वपूर्ण है। उक्त 4 माह में विवाह संस्कार, जातकर्म संस्कार, गृह प्रवेश आदि सभी मंगल कार्य निषेध माने गए हैं। व्रतों से सबसे श्रेष्ठ व्रत को एकादशी और प्रदोष कहा गया है। वर्ष में 24 एकादशियां और 24 प्रदोष व्रत होते हैं। हर तीसरे वर्ष अधिकमास जुड़ने से यह 26 हो जाते हैं।
 
सेवा:- सर्व प्रथम माता-पिता, फिर बहन-बेटी, फिर भाई-बांधु की किसी भी प्रकार से सहायता करना ही धार्मिक सेवा है। इसके बाद अपंग, महिला, विद्यार्थी, संन्यासी, चिकित्सक और धर्म के रक्षकों की सेवा-सहायता करना पुण्य का कार्य माना गया है। इसके अलवा सभी प्राणियों, पक्षियों, गाय, कुत्ते, कौए, चींटी आति को अन्न जल देना। यह सभी यज्ञ कर्म में आते हैं।
 
दान:- वेदों में तीन प्रकार के दाता कहे गए हैं- 1.उक्तम, 2.मध्यम और 3.निकृष्‍ट। धर्म की उन्नति रूप सत्यविद्या के लिए जो देता है वह उत्तम। कीर्ति या स्वार्थ के लिए जो देता है तो वह मध्यम और जो वेश्‍यागमनादि, भांड, भाटे, पंडे को देता वह निकृष्‍ट माना गया है। पुराणों में अनेकों दानों का उल्लेख मिलता है जिसमें अन्नदान, विद्यादान, अभयदान और धनदान को ही श्रेष्ठ माना गया है, यही पुण्‍य भी है।
 
यज्ञ : यज्ञ के प्रमुख पांच प्रकार हैं- ब्रह्मयज्ञ, देवयज्ञ, पितृयज्ञ, वैश्वदेव यज्ञ और अतिथि यज्ञ। यज्ञ पालन से ऋषि ऋण, ‍‍देव ऋण, पितृ ऋण, धर्म ऋण, प्रकृति ऋण और मातृ ऋण समाप्त होता है। नित्य संध्या वंदन, स्वाध्याय तथा वेदपाठ करने से ब्रह्म यज्ञ संपन्न होता है। इससे 'ऋषि ऋण' ‍चुकता होता है। देवयज्ञ सत्संग तथा अग्निहोत्र कर्म से सम्पन्न होता है। इसके लिए वेदी में अग्नि जलाकर होम किया जाता है यही अग्निहोत्र यज्ञ है। इससे 'देव ऋण' चुकता होता है। पितृयज्ञ को श्राद्धकर्म भी कहा गया है। सत्य और श्रद्धा से किए गए कर्म श्राद्ध और जिस कर्म से माता, पिता और आचार्य तृप्त हो वह तर्पण है। यह यज्ञ सम्पन्न होता है सन्तानोत्पत्ति से। इसी से 'पितृ ऋण' भी चुकता होता है। वैश्वदेव यज्ञ को भूत यज्ञ भी कहते हैं। सभी प्राणियों तथा वृक्षों के प्रति करुणा और कर्त्तव्य समझना उन्हें अन्न-जल देना ही भूत यज्ञ या वैश्वदेव यज्ञ कहलाता है। अर्थात जो कुछ भी भोजन कक्ष में भोजनार्थ सिद्ध हो उसका कुछ अंश उसी अग्नि में होम करें जिससे भोजन पकाया गया है। फिर कुछ अंश गाय, कुत्ते और कौवे को दें। अतितिथ यज्ञ से अर्थ मेहमानों की सेवा करना उन्हें अन्न-जल देना। अपंग, महिला, विद्यार्थी, संन्यासी, चिकित्सक और धर्म के रक्षकों की सेवा-सहायता करना ही अतिथि यज्ञ है। इससे संन्यास आश्रम पुष्ट होता है। यही पुण्य है। यही सामाजिक कर्त्तव्य है। इसके अलावा अग्निहोत्र, अश्वमेध, वाजपेय, सोमयज्ञ, राजसूय और अग्निचयन का वर्णण यजुर्वेद में मिलता है।
 
धर्म प्रचार:- धर्म की प्रशंसा करना और धर्म के बारे में सही जानकारी को लोगों तक पहुंचाना प्रत्येक हिन्दू का कर्तव्य होता है। धर्म प्रचार में वेद, उपनिषद और गीता के ज्ञान का प्रचार करना ही उत्तम माना गया है। धर्म प्रचारकों के कुछ प्रकार हैं।



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