सिर पर चोटी क्यों रखी जाती है?

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वैदिक संस्कृति में चोटी को 'शिखा' कहते हैं। स्त्रियां भी चोटी रखती हैं। उसका भी कारण है। और उपनयन संस्कार के समय यह किया जाता है। प्रत्येक हिन्दू को यह करना होता है। इस संस्कार के बाद ही बच्चा द्विज कहलाता है। 'द्विज' का अर्थ होता है जिसका दूसरा जन्म हुआ हो, अब बच्चे को पढ़ाई करने के लिए गुरुकुल भेजा जा सकता है। पहले यह संस्कार करते समय यह तय किया जाता था कि बच्चों को ब्राह्मणत्व ग्रहण करना है, क्षत्रियत्व या वैश्यत्व। जब यह तय हो जाता था ‍तभी उसके अनुसार शिक्षा दी जाती थी। पहले सभी शूद्र कहलाते थे।


प्रत्येक स्त्री तथा पुरुष को अपने सिर पर चोटी यानी कि बालों का समूह अनिवार्य रूप से रखना चाहिए।

बच्चे की उम्र के पहले वर्ष के अंत में या तीसरे, पांचवें या सातवें वर्ष के पूर्ण होने पर बच्चे के बाल उतारे जाते हैं और यज्ञ किया जाता है जिसे मुंडन संस्कार या चूड़ाकर्म संस्कार कहा जाता है। इससे बच्चे का सिर मजबूत होता है तथा बुद्धि तेज होती है। उपनयन संस्कार बच्चे के 6 से 8 वर्ष की आयु के बीच में किया जाता है। इसमें यज्ञ करके बच्चे को एक पवित्र धागा पहनाया जाता है, इसे यज्ञोपवीत या जनेऊ भी कहते हैं। बालक को जनेऊ पहनाकर गुरु के पास शिक्षा अध्ययन के लिए ले जाया जाता था। वैदिक काल में 7 वर्ष की आयु में शिक्षा ग्रहण करने के लिए भेजा जाता था। आजकल तो 3 वर्ष की आयु में ही स्कूल में दाखिला लेना होता है।

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