धार भोजशाला को लेकर मध्यप्रदेश हाई कोर्ट ने बड़ा फैसला सुनाया है। हाईकोर्ट ने कहा कि भोजशाला परिसर मंदिर ही है। मस्जिद पक्ष को अलग जमीन दी जाएगी। इसके लिए मस्जिद पक्ष सरकार से याचिका करें। इस संदर्भ में जानिए कि कैसे राजा भोज की नगरी पर हुआ मुस्लिम आक्रांताओं का आक्रमण और कैसे इसे मस्जिद में बदल दिया गया।
राजा भोज का इतिहास:
कुछ विद्वान मानते हैं कि महान राजा भोज (भोजदेव) का शासनकाल 1010 से 1053 तक रहा। राजा भोज ने अपने काल में कई मंदिर बनवाए। राजा भोज के नाम पर भोपाल के निकट भोजपुर बसा है। धार की भोजशाला का निर्माण भी उन्होंने कराया था। कहते हैं कि उन्होंने ही मध्यप्रदेश की वर्तमान राजधानी भोपाल को बसाया था जिसे पहले भोजपाल कहा जाता था।
मध्यप्रदेश के सांस्कृतिक गौरव के जो स्मारक हमारे पास हैं, उनमें से अधिकांश राजा भोज की देन हैं, चाहे विश्वप्रसिद्ध भोजपुर मंदिर हो या विश्वभर के शिवभक्तों के श्रद्धा के केंद्र उज्जैन स्थित महाकालेश्वर मंदिर, धार की भोजशाला हो या भोपाल का विशाल तालाब- ये सभी राजा भोज के सृजनशील व्यक्तित्व की देन हैं। उन्होंने जहां भोज नगरी (वर्तमान भोपाल) की स्थापना की वहीं धार, उज्जैन और विदिशा जैसी प्रसिद्ध नगरियों को नया स्वरूप दिया। उन्होंने केदारनाथ, रामेश्वरम्, सोमनाथ, मुण्डीर आदि मंदिर भी बनवाए, जो हमारी समृद्ध सांस्कृतिक धरोहर हैं।
परमारवंशीय राजाओं ने मालवा के एक नगर धार को अपनी राजधानी बनाकर 8वीं शताब्दी से लेकर 14वीं शताब्दी के पूर्वार्ध तक राज्य किया था। उनके ही वंश में हुए परमार वंश के सबसे महान अधिपति महाराजा भोज ने धार में 1000 ईसवीं से 1055 ईसवीं तक शासन किया। महाराजा भोज से संबंधित 1010 से 1055 ई. तक के कई ताम्रपत्र, शिलालेख और मूर्तिलेख प्राप्त होते हैं। भोज के साम्राज्य के अंतर्गत मालवा, कोंकण, खानदेश, भिलसा, डूंगरपुर, बांसवाड़ा, चित्तौड़ एवं गोदावरी घाटी का कुछ भाग शामिल था। उन्होंने उज्जैन की जगह अपनी नई राजधानी धार को बनाया।
राजा भोज खुद एक विद्वान होने के साथ-साथ काव्यशास्त्र और व्याकरण के बड़े जानकार थे और उन्होंने बहुत सारी किताबें लिखी थीं। मान्यता अनुसार भोज ने 64 प्रकार की सिद्धियां प्राप्त की थीं तथा उन्होंने सभी विषयों पर 84 ग्रंथ लिखे जिसमें धर्म, ज्योतिष, आयुर्वेद, व्याकरण, वास्तुशिल्प, विज्ञान, कला, नाट्यशास्त्र, संगीत, योगशास्त्र, दर्शन, राजनीतिशास्त्र आदि प्रमुख हैं। आईन-ए-अकबरी में प्राप्त उल्लेखों के अनुसार भोज की राजसभा में 500 विद्वान थे। इन विद्वानों में नौ (नौरत्न) का नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय है। मालवा के इस चक्रवर्ती, प्रतापी, काव्य और वास्तुशास्त्र में निपुण और विद्वान राजा राजा भोज के जीवन और कार्यों पर विश्व की अनेक यूनिवर्सिटीज में शोध कार्य हो रहा है।
भोजशाला का इतिहास:
स्थापना: सन् 1034 में कला प्रेमी राजा भोज ने धार में माँ सरस्वती (वाग्देवी) के इस भव्य मंदिर के निर्माण के साथ ही संस्कृत पाठशाला का निर्माण कराया था। यह केवल एक मंदिर नहीं, बल्कि एक महान विश्वविद्यालय था जहाँ वैश्विक स्तर पर संस्कृत, दर्शन, ज्योतिष और वास्तु की शिक्षा दी जाती थी।
कहा जाता है कि राजा भोज मां शारदे के महान उपासक थे और यही कारण भी था कि उनकी रुचि शिक्षा एवं साहित्य में बहुत ज़्यादा थी। राजा भोज ने ही सन् 1034 में भोजशाला के रूप में एक भव्य पाठशाला का निर्माण किया और यहां माता सरस्वती की एक प्रतिमा स्थापित की। इसे तब सरस्वती सदन कहा था। भोजशाला को माता सरस्वती का प्राकट्य स्थान भी माना जाता है।
प्रथम हमला (1305): इतिहासकार शिवकुमार गोयल के अनुसार, अलाउद्दीन खिलजी ने इस भव्य केंद्र को पहली बार निशाना बनाया और क्षति पहुँचाई। एक रिपोर्ट के अनुसार सन् 1305 में अलाउद्दीन खिलजी के आक्रमण के समय भोजशाला के शिक्षकों और विद्यार्थियों ने भी खिलजी की इस्लामिक सेना का विरोध किया था। खिलजी द्वारा लगभग 1,200 छात्र-शिक्षकों को बंदी बनाकर उनसे इस्लाम क़ुबूल करने के लिए कहा गया लेकिन इन सभी ने इस्लाम स्वीकार करने से मना कर दिया। इसके बाद इन विद्वानों की हत्या कर दी गई थी और उनके शव को भोजशाला के ही विशाल हवन कुंड में फेंक दिया गया था।
मौलाना कमाल मस्जिद (13वीं-14वीं शताब्दी) दिल्ली से मालवा (धार) आए मौलाना ने यहां सूफी मत का प्रचार किया। उनकी मृत्यु के बाद, उनके सम्मान में भोजशाला परिसर के पास मकबरा बनाया गया और खिलजी शासकों ने इस संपूर्ण स्थान का नाम 'कमाल मौला मस्जिद' रख दिया।
सरस्वती की मूर्ति: सन् 1875 की खुदाई में यहाँ से माँ सरस्वती की एक अत्यंत सुंदर प्रतिमा निकली थी। मेजर किनकेड नाम का एक अंग्रेज अधिकारी इस प्रतिमा को लंदन ले गया, जो वर्तमान में ब्रिटिश संग्रहालय में रखी है।
आंशिक परिवर्तन (1401): दिलावर खां गौरी ने मंदिर के एक ध्वस्त भाग पर मस्जिद का निर्माण कराया। दिलावर खां गौरी ने मां सरस्वती के मंदिर में बने देवस्थलों को खंडित कर, कमाल मौलाना का अवैध मक़बरा बना दिया। कहा जाता है कि भोजशाला में कमाल मौलाना की मज़ार है जबकि इतिहास यह भी कहता है कि कमाल मौलाना की मृत्यु अहमदाबाद में हुई थी, जहाँ उनकी मज़ार स्थित है। फिर भी भोजशाला में मज़ार होने का दावा तथ्यहीन नज़र आता है।
पूर्ण परिवर्तन (1514): महमूद शाह खिलजी के शासनकाल में परिसर के शेष भाग को भी मस्जिद के स्वरूप में बदल दिया गया।
भोजशला संघर्ष का सफर:
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भोजशाला को लेकर सन् 1952 में महाराजा भोज स्मृति बसंतोत्सव समिति ने मुक्ति के प्रयास प्रारंभ किए थे।
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सन् 1961 में पुरातत्ववेत्ता व इतिहासकार पद्म श्री डॉ. वाकणकर ने मां वाग्देवी की प्रतिमा का लंदन संग्रहालय में होना प्रमाणित किया।
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सन् 1970 के बाद मंदिर परिसर में नमाज़ भी प्रारंभ हो गई।
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सन् 1992 बसंत पंचमी को साध्वी ऋतुम्भरा जी द्वारा सरस्वती मंदिर भोजशाला में हनुमान चालीसा का आह्वान किया गया, तब अगले मंगलवार से सत्याग्रह प्रारंभ हुआ।
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सन् 2000 में 'घर-घर देवालय' स्थापना के द्वारा धर्म जागरण का कार्य भी शुरू हुआ।
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इसके साथ सन् 2003 में लाखों श्रद्धालुओं ने मां वाग्देवी का पूजन भोजशाला में किया।
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6 फ़रवरी 2003 बसंत पंचमी और शुक्रवार एक ही दिन था, उस दिन भोजशाला मुक्ति के लिए एक लाख से अधिक धर्मरक्षकों का संगम एवं संकल्प ही हुआ।
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18-19 फ़रवरी 2003 को भोजशाला आंदोलन में तीन कार्यकर्ताओं का बलिदान हुआ और 1400 कार्यकर्ताओं पर प्रतिबंधात्मक कार्यवाही हुई।
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08 अप्रैल 2003 को 650 वर्ष बाद हिन्दूओं को दर्शन एवं पूजन का अधिकार प्राप्त हुआ।
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सन् 2006 की बंसत पंचमी, शुक्रवार को पहली बार दिन भर गर्भगृह में हवन पूजन किया गया।
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संगठित हिन्दू समाज के पराक्रम के कारण सन् 2013 में भोजशाला परिसर के बाहर नमाज़ हुई।
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2016 में सूर्योदय के साथ ही गर्भ गृह में सरस्वती माता के तेल चित्र की पूजा-स्थापना के साथ यज्ञ प्रारंभ हुआ। संघर्ष, संगठन और पराक्रम के बल पर वर्ष में 52 दिन पूजन का अधिकार प्राप्त हुआ है।
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2022: हिंदू फ्रंट फॉर जस्टिस ने 2022 में मप्र हाईकोर्ट की इंदौर बेंच में याचिका लगाकर भोजशाला के लिए वैज्ञानिक सर्वे की मांग की।
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11 मार्च 2024: हाईकोर्ट ने एएसआई को पूरे परिसर का सर्वे और विशेषज्ञ रिपोर्ट तैयार करने का निर्देश दिया।
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1 अप्रैल 2024: सुप्रीम कोर्ट ने सर्वे पर पूरी रोक नहीं लगाई, लेकिन कहा कि सर्वे आदेश के परिणाम पर कोई कार्रवाई न हो।।
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मार्च-जून 2024: एएसआई ने करीब 98 दिन सर्वे किया। रिपोर्ट में अभिलेख, मूर्तिकला, स्थापत्य अवशेष और शिलालेखों के आधार पर कहा कि मौजूदा ढांचा पहले के मंदिरों के हिस्सों से बना है। मुस्लिम पक्ष ने आपत्ति जताई।
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22 जनवरी 2026: सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट में सीलबंद पड़ी एएसआई रिपोर्ट खोलकर दोनों पक्षों को प्रति उपलब्ध कराने और आपत्तियां/सुझाव दाखिल करने की अनुमति देने को कहा।।
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अप्रैल-मई 2026: हाईकोर्ट ने सभी पक्षों... याचिकाकर्ता, मुस्लिम पक्ष, इंटरवीनर और एएसआई की दलीलें सुनीं। 12 मई को फैसला सुरक्षित। 15 मई को फैसला।