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नरक से निकले 12 मजदूर : डेढ़ साल तक सूखी रोटी, मारपीट और कैद, घर वापसी पर छलक पड़े आंसू

story of workers rescued from a factory in Muzaffarnagar
Muzaffarnagar Uttar Pradesh News : जब पुलिस की टीम फैक्‍टरी के भीतर पहुंची तो वहां मौजूद मजदूरों की आंखों में डर, थकान और बेबसी साफ दिखाई दे रही थी। ये वे लोग थे जो बेहतर भविष्य और परिवार की खुशहाली का सपना लेकर घर से निकले थे, लेकिन उन्हें नहीं पता था कि रोजगार का यह वादा उन्हें एक ऐसी कैद में पहुंचा देगा, जहां इंसानियत भी शर्मसार हो जाएगी। मुजफ्फरनगर के तितावी क्षेत्र स्थित एक फैक्‍टरी से मुक्त कराए गए इन मजदूरों की कहानी सूदखोर महाजन की याद दिलाती है, आधुनिक युग में यह बंधुआ मजदूरी और मानव शोषण की काली तस्वीरें दिखाती है। 
 
बिहार, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, छत्तीसगढ़, हरियाणा और राजस्थान से आए 12 मजदूरों की जिंदगी पिछले डेढ़ साल से किसी जेल से कम नहीं थी। उन्हें हर महीने वेतन, रहने और खाने की सुविधा का लालच देकर मुजफ्फरनगर की एक फैक्‍टरी में लाया गया था लेकिन यहां पहुंचते ही उनकी दुनिया बदल गई।

मजदूरों के अनुसार, उनसे दिन-रात काम कराया जाता था, जबकि खाने के नाम पर सिर्फ एक बार सूखी रोटी और नमक दिया जाता था। इन लोगों को न मेहनत की कमाई मिलती, न आजादी और न ही इंसानों जैसा व्यवहार।सबसे दर्दनाक बात यह रही कि जो मजदूर घर जाने की बात करता या अपनी मेहनत की कमाई मांगता, उसे लोहे की रॉड और डंडों से पीटा जाता था।

बीमार पड़ने पर इलाज तो दूर, उन्हें आराम तक नहीं करने दिया जाता था। कुछ नाबालिग बच्चों के भी इस अमानवीय व्यवस्था का हिस्सा होने की बात सामने आई है लेकिन उम्मीद की एक किरण तब जगी, जब एक श्रमिक किसी तरह वहां से निकल भागा।

आखिरकार एक श्रमिक हिम्मत जुटाकर किसी तरह फैक्‍टरी से निकलने में सफल हुआ और पुलिस तक पहुंच गया। उसकी सूचना पर पुलिस, श्रम विभाग और प्रशासन की संयुक्त टीम ने छापेमारी कर फैक्‍टरी में बंधक बनाकर रखे गए सभी 12 मजदूरों को मुक्त कराया। कार्रवाई के दौरान दो आरोपियों को गिरफ्तार कर लिया गया, जबकि मुख्य आरोपी की तलाश जारी है।
 
पुलिस, श्रम विभाग और प्रशासन की संयुक्त टीम ने फैक्‍टरी पर छापा मारकर सभी मजदूरों को मुक्त कराया। जब इन श्रमिकों के गले में फूलों की मालाएं डाली गईं तो उनकी आंखों में खुशी और राहत के आंसू थे। लंबे समय बाद उन्हें अपने परिवारों से मिलने और सामान्य जीवन में लौटने की उम्मीद दिखाई दे रही थी। श्रमिकों के लिए यह सिर्फ एक पुलिस कार्रवाई नहीं थी, बल्कि उन लोगों के लिए नई शुरुआत थी जिन्होंने महीनों तक दर्द, भूख और अत्याचार सहा था।
 
मुक्त कराए गए एक श्रमिक ने भावुक होते हुए बताया कि उसे अपने परिवार की याद तो हर दिन आती थी, लेकिन बाहर निकलने का कोई रास्ता नहीं था। फैक्‍टरी से भागने की कोशिश करने वालों पर पालतू पिटबुल कुत्ता छोड़ दिया जाता था। डर और अत्याचार का ऐसा माहौल था कि मजदूरों ने अपनी किस्मत को ही कैद मान लिया था।
 
इन मजदूरों के लिए आज़ादी सिर्फ फैक्‍टरी से बाहर निकलना नहीं है, बल्कि अपने परिवारों के पास लौटना, अपने बच्चों को गले लगाना और फिर से सम्मान के साथ जिंदगी जीने का अवसर है। यह घटना समाज को यह सोचने पर मजबूर करती है कि आधुनिक दौर में भी बंधुआ मजदूरी जैसी अमानवीय प्रथाएं किस तरह लोगों की जिंदगी को निगल रही हैं।
 
आज ये 12 मजदूर आज़ाद हैं, लेकिन उनकी आंखों में कैद के दिनों की दहशत अभी भी बाकी है। फिर भी, उनके चेहरों पर लौटती मुस्कान इस बात का संकेत है कि उम्मीद और इंसानियत की जीत आखिरकार हुई, साथ ही उनकी मुक्ति इस बात का संदेश भी देती है कि अन्याय कितना भी बड़ा क्यों न हो, साहस और संवेदनशील कार्रवाई उसके खिलाफ सबसे बड़ी ताकत बन सकती है।
Edited By : Chetan Gour
लेखक के बारे में
हिमा अग्रवाल