Gas crisis in Uttar Pradesh industries: पश्चिम एशिया में बढ़ते सैन्य तनाव और वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति पर पड़े उसके असर की आंच अब भारत के छोटे-बड़े उद्योगों तक महसूस की जाने लगी है। इसका सबसे तीखा असर उत्तर प्रदेश के उन शहरों में दिखाई दे रहा है, जिनकी पहचान किसी खास उद्योग से जुड़ी है—चाहे वह खुर्जा की पॉटरी हो, फिरोजाबाद की चूड़ियां, आगरा का पेठा या मेरठ का खेल उद्योग, बैंडबाजा, हैंडलूम उद्योग या अन्य क्लस्टर।
गैस की कीमतों में अचानक आई भारी बढ़ोतरी और आपूर्ति में आई कमी ने इन उद्योगों की कमर तोड़ दी है। कई इकाइयों में उत्पादन ठप पड़ गया है, जबकि हजारों कारीगर और मजदूर इस चिंता में हैं कि उनका काम कब दोबारा शुरू होगा। यह संकट सिर्फ कारोबार का नहीं, बल्कि लाखों लोगों की रोजी-रोटी और स्थानीय अर्थव्यवस्था के अस्तित्व का सवाल बन गया है। बेवदुनिया आज यूपी के विभिन्न कलस्टर से जीरो ग्राउंड पर क्या स्थिति है उससे रूबरू करवा रहा है।
खुर्जा की खामोश भट्टियां
उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर जिले का खुर्जा एशिया के सबसे बड़े पॉटरी क्लस्टर के रूप में जाना जाता है। यहां बनने वाले मिट्टी के बर्तन और सिरेमिक उत्पाद देश-विदेश में अपनी खास पहचान रखते हैं। लेकिन इन दिनों खुर्जा की पहचान बन चुकी भट्टियां ठंडी पड़ती जा रही हैं। करीब 300 से 325 पॉटरी इकाइयों में से लगभग 80 प्रतिशत ने उत्पादन बंद कर दिया है। फैक्ट्रियों में चाक और मशीनें लगभग खामोश हैं और हजारों कारीगर काम बंद होने से असमंजस में हैं।
पॉटरी उद्योग से जुड़े उद्यमी सुभाष खन्ना बताते हैं कि पिछले 60 वर्षों में उन्होंने ऐसा संकट पहले कभी नहीं देखा। खुर्जा में लगभग 30 से 40 हजार कुशल कारीगर इस उद्योग से जुड़े हुए हैं और हर महीने करीब 70 करोड़ रुपए का कारोबार होता है, जिसमें से 15 से 20 प्रतिशत उत्पाद विदेशों में निर्यात किए जाते हैं।
लेकिन, गैस कंपनियों की नई शर्तों ने उद्योग को मुश्किल में डाल दिया है। तय सीमा तक गैस का मूल्य लगभग 49 रुपए प्रति किलो है, जबकि उससे अधिक उपयोग करने पर कीमत लगभग 119.90 रुपए प्रति किलो तक पहुंच जाती है। एलपीजी की कीमतें भी 61 रुपए से बढ़कर 93 रुपए प्रति किलो हो गई हैं। उद्यमियों का कहना है कि इतनी महंगी गैस पर उत्पादन करना संभव नहीं है, क्योंकि बाजार में उतनी कीमत पर माल बिक नहीं पाएगा।
सुहाग नगरी फिरोजाबाद की फीकी पड़ती रौनक
कांच की चूड़ियों के लिए दुनिया भर में प्रसिद्ध फिरोजाबाद भी इस संकट से अछूता नहीं है। यहां की चूड़ी फैक्ट्रियां पूरी तरह गैस आधारित भट्टियों पर निर्भर हैं, जिनमें कांच को पिघलाकर चूड़ियां बनाई जाती हैं। गैस की कीमतों में अचानक हुई बढ़ोतरी ने उत्पादन लागत को काफी बढ़ा दिया है। कई कारीगरों का कहना है कि पहले जैसी गुणवत्ता की चूड़ियां बनाना मुश्किल हो गया है। बाजार में भी इसका असर दिखने लगा है और अच्छी क्वालिटी की चूड़ियों की कमी महसूस की जा रही है।
ईद का त्योहार नजदीक होने के कारण यह चूड़ी कारोबार का सबसे अहम समय होता है। देश के कई हिस्सों से व्यापारी पहले ही ऑर्डर दे चुके हैं, लेकिन वे पुराने दामों पर ही माल लेना चाहते हैं। उत्पादन लागत बढ़ने के कारण कई व्यापारियों को मजबूरी में पुराने ऑर्डर रद्द करने पड़े हैं। फिरोजाबाद के मशहूर चूड़ी मार्केट में भी इस बार त्योहार की रौनक कुछ फीकी दिखाई दे रही है। फैंसी चूड़ियों के तोड़े करीब 10 रुपए तक महंगे हो गए हैं, जिससे बिक्री पर भी असर पड़ा है।
आगरा का पेठा उद्योग संकट में
ताजमहल की नगरी आगरा की पहचान सिर्फ उसकी ऐतिहासिक धरोहरों से नहीं, बल्कि यहां बनने वाले मशहूर पेठे से भी है। लगभग 500 करोड़ रुपए के सालाना कारोबार वाले इस उद्योग से करीब 5,000 लोग सीधे तौर पर जुड़े हुए हैं। लेकिन कमर्शियल गैस सिलेंडरों की भारी किल्लत के कारण कई इकाइयों की भट्टियां ठंडी पड़ने लगी हैं। नूरी गेट क्षेत्र में ग्रीन गैस की पाइपलाइन होने के बावजूद करीब 60 से 70 पेठा इकाइयों को गैस की आपूर्ति नहीं मिल पा रही है।
व्यापारियों का कहना है कि पाइप्ड नेचुरल गैस (पीएनजी) की आपूर्ति का आश्वासन जरूर मिला है, लेकिन जमीनी स्तर पर अभी तक कोई ठोस व्यवस्था नहीं हो पाई है। यदि स्थिति जल्द नहीं सुधरी, तो न सिर्फ उत्पादन ठप हो सकता है बल्कि हजारों मजदूरों के सामने रोजी-रोटी का संकट खड़ा हो जाएगा।
मेरठ के उद्योगों पर भी गहराया संकट
पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव का असर मेरठ के औद्योगिक ढांचे पर भी साफ दिखाई देने लगा है। एलपीजी और पीएनजी गैस की कमी के कारण यहां के कई उद्योग प्रभावित हुए हैं। अनुमान है कि करीब 50 हजार श्रमिकों और उनके परिवारों की आजीविका पर इसका सीधा असर पड़ सकता है। इंडियन इंडस्ट्रीज एसोसिएशन के अध्यक्ष अंकित सिंघल के मुताबिक मेरठ जिले में लगभग 200 उद्योग ऐसे हैं जो एलपीजी और पीएनजी पर निर्भर हैं। गैस आपूर्ति में आई कमी के कारण उत्पादन बुरी तरह प्रभावित हुआ है।
स्थिति तब और गंभीर हो गई जब गैस आपूर्ति करने वाली कंपनी गेल ने औद्योगिक इकाइयों को मिलने वाली पीएनजी सप्लाई में 20 प्रतिशत कटौती कर दी। पहले प्रदूषण नियंत्रण के लिए उद्योगों को डीजल से गैस आधारित ईंधन अपनाने के निर्देश दिए गए थे और उद्योगपतियों ने भारी निवेश करके अपनी इकाइयों को गैस पर शिफ्ट किया था। अब यही व्यवस्था उनके लिए संकट का कारण बन गई है।
उद्योग संगठन एसोसिएशन के सचिव गौरव जैन का कहना है कि यदि हालात जल्द सामान्य नहीं हुए, तो मेरठ में रोजाना करीब 200 से 250 करोड़ रुपए के कारोबार पर असर पड़ सकता है। खेल उद्योग से जुड़े निर्यात ऑर्डर भी अटकने लगे हैं, जिससे अंतरराष्ट्रीय बाजार में भारतीय कारोबारियों की साख प्रभावित होने की आशंका है।
सिर्फ उद्योग नहीं, लाखों परिवारों की जिंदगी दांव पर
यह संकट सिर्फ फैक्ट्रियों और कारोबार तक सीमित नहीं है। इन उद्योगों से जुड़े हजारों कारीगर, मजदूर, छोटे व्यापारी और उनके परिवार भी इसकी चपेट में आ गए हैं। कई मजदूर दिहाड़ी पर काम करते हैं और उत्पादन रुकते ही उनकी आय भी बंद हो जाती है। उद्योग जगत का कहना है कि यदि सरकार और प्रशासन ने जल्द हस्तक्षेप कर गैस आपूर्ति और कीमतों के मुद्दे का समाधान नहीं निकाला, तो उत्तर प्रदेश के कई ऐतिहासिक उद्योग गंभीर आर्थिक संकट में फंस सकते हैं।
पश्चिम एशिया के युद्ध की यह दूर की आंच अब उत्तर प्रदेश के शहरों की गलियों, कारखानों और मजदूरों के घरों तक पहुंच चुकी है, जहां सबसे बड़ा सवाल यही है कि काम फिर कब शुरू होगा।
Edited by: Vrijendra Singh Jhala