महाप्रभु वल्लभाचार्य जी की कथा पर विवाद : कथावाचक इंद्रेश उपाध्याय ने हाथ जोड़कर मांगी माफी, कहा- 'अब बिना प्रमाण नहीं कहूंगा कोई बात'
श्री महाप्रभु बल्लभाचार्य को लेकर जगन्नाथ पुरी में महाप्रसाद से जुड़ी कही गई कथा पर बल्लभकुल आचार्य की तीखी प्रतिक्रिया पर वृंदावन के प्रख्यात कथावाचक इंद्रेश उपाध्याय ने सभी पुष्टिमार्गीय आचार्यों से क्षमा मांगते हुए भविष्य में ऐसी गलती न होने की बात कही है।
कथावाचक इंद्रेश उपाध्याय ने अपने ऑफिशियल यूट्यूब चैनल 'भक्ति पथ' पर वीडियो जारी करके श्री महाप्रभु बल्लभाचार्य जी के पुष्टिमार्गीय आचार्य वंशजों से क्षमा मांगी। उन्होंने कहा कि उनका भाव महाप्रभुजी के प्रति गलत नहीं था और ऐसा लगा तो वह उसके लिए क्षमा मांगते हैं। उनसे लोक कथा के कारण यह भूल हुई है।
उन्होंने कहा यह भूल उनसे लोक कथा के कारण हुई है। वह भविष्य में बगैर पुष्टि के लोककथा नहीं करेंगे और मूलकथा करेगे। वह ब्रजवासी हैं और उनके पिता और दीक्षा गुरु सभी का एक ही ध्येय रहता है कि कभी ऐसी गलती व्यास पीठ से ना हो।
उपाध्याय ने कहा कि कई बार मूल कथा के साथ लोक कथा सुनने को मिलती है जो बिल्कुल अलग होती है। बस उसी लोक कथा के भाव से उन्होंने ऐसी बात कही।
इस कथा पर मचा था बवाल
इंद्रेश उपाध्याय ने महाराष्ट्र में कथा के दौरान श्री महाप्रभु वल्लभाचार्य जी से जुड़ी एक कथा सुनाई थी। इसमें उन्होंने कहा कि जगन्नाथ पुरी में श्री महाप्रभु वल्लभाचार्य जी को महाप्रसाद दिया गया। उस दिन एकादशी का दिन होने के कारण उन्होंने पाया नहीं और उसे लेकर खड़े रहे। इसके बाद ठाकुर जी ने नाराजगी जताई और द्वादशी पर श्री महाप्रभु वल्लभाचार्य जी ने वह प्रसाद पाया और उनके हाथ पर सफेद निशान पड़ गया। इस कथा पर पुष्टिमार्गीय आचार्य ने नाराजगी जताते हुए कहा कि इंद्रेश उपाध्याय पर गलत कथा कहने की बात कही।
इंद्रेश उपाध्याय ने कहा कि जब यह बात आई तो पुष्टिमार्गीय आचार्य जी ने उन्हें प्रामाणिक भेजा जिसमें लिखा हुआ था कि महाप्रभुजी को जगन्नाथ पुरी में जब महाप्रसाद मिला तो वह उसके प्रति अनन्य आदर और आनंद से भर गए। उन्होंने पूरी रात महाप्रसाद की महिमा का स्तुति गान किया और इस भाव विभोर अवस्था में स्वतः ही द्वादशी लग गई, जिसके बाद उन्होंने प्रसाद ग्रहण किया।
edited by : Nrapendra Gupta
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