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Mata kalratri: नवरात्रि की सप्तमी की देवी मां कालरात्रि: अर्थ, पूजा विधि, आरती, मंत्र, चालीसा, कथा और लाभ
Maa kalratri: शारदीय या चैत्र नवरात्रि के सातवें दिन यानी सप्तमी को माता कालरात्रि की पूजा होती है। मां कालरात्रि का रंग घने अंधकार की तरह एकदम काला है। सिर के बाल बिखरे हुए हैं और गले में विद्युत की तरह चमकने वाली माला है। अंधकारमय स्थितियों का विनाश करने वाली शक्ति हैं कालरात्रि। काल से भी रक्षा करने वाली यह शक्ति है। इस देवी के तीन नेत्र हैं। ये तीनों ही नेत्र ब्रह्मांड के समान गोल हैं। इनकी सांसों से अग्नि निकलती रहती है। ये गर्दभ की सवारी करती हैं। ऊपर उठे हुए दाहिने हाथ की वर मुद्रा भक्तों को वर देती है। दाहिनी ही तरफ का नीचे वाला हाथ अभय मुद्रा में है। यानी भक्तों हमेशा निडर, निर्भय रहो। बाईं तरफ के ऊपर वाले हाथ में लोहे का कांटा तथा नीचे वाले हाथ में खड्ग है।
चंद्रहासोज्ज्वलकरा शार्दूलवरवाहना।
कालरात्रि शुभं दद्याद्देवी दानवघातिनी॥
1. मां कालरात्रि का अर्थ
'काल' का अर्थ है समय या मृत्यु और 'रात्रि' का अर्थ है रात। माँ कालरात्रि का स्वरूप अंधकार के समान काला है और वे काल (मृत्यु) का भी विनाश करने वाली हैं, इसलिए उन्हें कालरात्रि कहा जाता है। वे अज्ञानता के अंधकार को मिटाकर प्रकाश लाती हैं।
2. मां कालरात्रि की पूजा विधि
- नवरात्रि की सप्तमी तिथि को मां कालरात्रि के पूजन के दिन सुबह स्नानादि से निवृत्त हो जाएं।
- अब रोली, अक्षत, दीप, धूप अर्पित करें।
- मां कालरात्रि को रातरानी का फूल चढाएं।
- चीकू, गुड़ का भोग अर्पित करें।
- मां की आरती करें।
- इसके साथ ही दुर्गा सप्तशती, दुर्गा चालीसा तथा मंत्र जपें।
- इस दिन लाल कंबल के आसन तथा लाला चंदन की माला से मां कालरात्रि के मंत्रों का जाप करें।
- अगर लाला चंदन की माला उपलब्ध न हो तो रूद्राक्ष की माला का उपयोग कर सकते हैं।
कालरात्रि देवी का मंत्र:
मंत्र: ॐ ऐं ह्रीं क्लीं कालरात्र्यै नमः।
प्रार्थना:
या देवी सर्वभूतेषु मां कालरात्रि रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥
चंद्रहासोज्ज्वलकरा शार्दूलवरवाहना।
कालरात्रि शुभं दद्याद्देवी दानवघातिनी॥
एकवेणी जपाकर्णपूरा नग्ना खरास्थिता।
लम्बोष्ठी कर्णिकाकर्णी तैलाभ्यक्तशरीरिणी॥
वामपादोल्लसल्लोहलताकण्टकभूषणा।
वर्धनमूर्धध्वजा कृष्णा कालरात्रिर्भयंकरी॥
3. मां कालरात्रि की आरती-lyrics
।।माँ कालरात्रि की आरती।।
कालरात्रि जय जय महाकाली
काल के मुंह से बचाने वाली
दुष्ट संहारिणी नाम तुम्हारा
महा चंडी तेरा अवतारा
पृथ्वी और आकाश पर सारा
महाकाली है तेरा पसारा
खंडा खप्पर रखने वाली
दुष्टों का लहू चखने वाली
कलकत्ता स्थान तुम्हारा
सब जगह देखूं तेरा नजारा
सभी देवता सब नर नारी
गावे स्तुति सभी तुम्हारी
रक्तदंता और अन्नपूर्णा
कृपा करे तो कोई भी दुःख ना
ना कोई चिंता रहे ना बीमारी
ना कोई गम ना संकट भारी
उस पर कभी कष्ट ना आवे
महाकाली मां जिसे बचावे
तू भी 'भक्त' प्रेम से कह
कालरात्रि मां तेरी जय।
(समाप्त)
4. मां कालरात्रि व्रत की कथा
पौराणिक कथा के अनुसार रक्तबीज नामक राक्षस ने देवता और मनुष्य सभी त्रस्त थे। रक्तबीज राक्षस की विशेषता यह थी कि जैसे ही उसके रक्त की बूंद धरती पर गिरती तो उसके जैसा एक और राक्षस पैदा हो जाता था। इस राक्षस से परेशान होकर समस्या का हल जानने सभी देवता भगवान शिव के पास पहुंचे। भगवान शिव को पता था कि इसका वध अंत में देव पार्वती ही करेंगी। भगवान शिव ने माता से अनुरोध किया। इसके बाद मां पार्वती ने स्वंय शक्ति व तेज से मां कालरात्रि को उत्पन्न किया। इसके बाद जब मां ने दैत्य रक्तबीज का अंत किया और उसके शरीर से निकलने वाले रक्त को मां कालरात्रि ने जमीन पर गिरने से पहले ही अपने मुख में भर लिया। इस रूप में मां पार्वती कालरात्रि कहलाई।
5. माता कालरात्रि की चालीसा
॥ श्री कालरात्रि चालीसा ॥
।।दोहा।।
जय काली, कलिमलहरण, महिमा अगम अपार.
महिष मर्दिनी कालिका, देहु अभय अपार॥
।।चौपाई।।
अरि मद मान मिटावन हारी, मुण्डमाल गल सोहत प्यारी॥
अष्टभुजी सुखदायक माता, दुष्टदलन जग में विख्याता॥ 1॥
भाल विशाल मुकुट छवि छाजै, कर में शीश शत्रु का साजै॥
दूजे हाथ लिए मधु प्याला, हाथ तीसरे सोहत भाला॥ 2॥
चौथे खप्पर खड्ग कर पांचे, छठे त्रिशूल शत्रु बल जांचे॥
सप्तम करदमकत असि प्यारी, शोभा अद्भुत मात तुम्हारी॥ 3॥
अष्टम कर भक्तन वर दाता, जग मनहरण रूप ये माता॥
भक्तन में अनुरक्त भवानी, निशदिन रटें ऋषि-मुनि ज्ञानी॥ 4॥
महाशक्ति अति प्रबल पुनीता, तू ही काली तू ही सीता॥
पतित तारिणी हे जग पालक, कल्याणी पापी कुल घालक॥ 5॥
शेष सुरेश न पावत पारा, गौरी रूप धर्यो इक बारा॥
तुम समान दाता नहिं दूजा, विधिवत करें भक्तजन पूजा॥ 6॥
रूप भयंकर जब तुम धारा, दुष्टदलन कीन्हेहु संहारा॥
नाम अनेकन मात तुम्हारे, भक्तजनों के संकट टारे॥ 7॥
कलि के कष्ट कलेशन हरनी, भव भय मोचन मंगल करनी॥
महिमा अगम वेद यश गावैं, नारद शारद पार न पावैं॥ 8॥
भू पर भार बढ़्यो जब भारी, तब तब तुम प्रकटीं महतारी॥
आदि अनादि अभय वरदाता, विश्वविदित भव संकट त्राता॥ 9॥
कुसमय नाम तुम्हारौ लीन्हा, उसको सदा अभय वर दीन्हा॥
ध्यान धरें श्रुति शेष सुरेशा, काल रूप लखि तुमरो भेषा॥ 10॥
कलुआ भैंरों संग तुम्हारे, अरि हित रूप भयानक धारे॥
सेवक लांगुर रहत अगारी, चौसठ जोगन आज्ञाकारी॥ 11॥
त्रेता में रघुवर हित आई, दशकंधर की सैन नसाई॥
खेला रण का खेल निराला, भरा मांस-मज्जा से प्याला॥ 12॥
रौद्र रूप लखि दानव भागे, कियौ गवन भवन निज त्यागे॥
तब ऐसौ तामस चढ़ आयो, स्वजन विजन को भेद भुलायो॥ 13॥
ये बालक लखि शंकर आए, राह रोक चरनन में धाए॥
तब मुख जीभ निकर जो आई, यही रूप प्रचलित है माई॥ 14॥
बाढ़्यो महिषासुर मद भारी, पीड़ित किए सकल नर-नारी॥
करूण पुकार सुनी भक्तन की, पीर मिटावन हित जन-जन की॥ 15॥
तब प्रगटी निज सैन समेता, नाम पड़ा मां महिष विजेता॥
शुंभ निशुंभ हने छन माहीं, तुम सम जग दूसर कोउ नाहीं॥ 16॥
मान मथनहारी खल दल के, सदा सहायक भक्त विकल के॥
दीन विहीन करैं नित सेवा, पावैं मनवांछित फल मेवा॥ 17॥
संकट में जो सुमिरन करहीं, उनके कष्ट मातु तुम हरहीं॥
प्रेम सहित जो कीरति गावैं, भव बंधन सों मुक्ती पावैं॥ 18॥
काली चालीसा जो पढ़हीं, स्वर्गलोक बिनु बंधन चढ़हीं॥
दया दृष्टि हेरौ जगदम्बा, केहि कारण मां कियौ विलम्बा॥ 19॥
करहु मातु भक्तन रखवाली, जयति जयति काली कंकाली॥
सेवक दीन अनाथ अनारी, भक्तिभाव युति शरण तुम्हारी॥ 20॥
।।दोहा।।
प्रेम सहित जो करे, काली चालीसा पाठ.
तिनकी पूरन कामना, होय सकल जग ठाठ॥
॥इति श्री कालरात्रि चालीसा सम्पूर्ण॥
6. मां कालरात्रि की पूजा का लाभ
- इनका रूप भले ही भयंकर हो लेकिन ये सदैव शुभ फल देने वाली मां हैं। इसीलिए ये शुभंकरी कहलाईं अर्थात् इनसे भक्तों को किसी भी प्रकार से भयभीत या आतंकित होने की कतई आवश्यकता नहीं।
- उनके साक्षात्कार से भक्त पुण्य का भागी बनता है।
- चीकू या गुड़ का नैवेद्य चढ़ाने व उसे ब्राह्मण को दान करने से शोक से मुक्ति मिलती है एवं आकस्मिक आने वाले संकटों से रक्षा भी होती है।
- माँ कालरात्रि शत्रुओं का नाश करने वाली और भय को दूर करने वाली देवी हैं। उनकी पूजा से आकस्मिक मृत्यु का भय समाप्त होता है।
- भूत-प्रेत, बुरी शक्तियां और नकारात्मक ऊर्जा दूर भागती हैं। ग्रह बाधाएं (विशेषकर शनि दोष) शांत होती हैं।
7. मां कालरात्रि पर पूछे जाने वाले प्रश्न-FAQs
1. माँ कालरात्रि का नाम 'कालरात्रि' क्यों पड़ा?
'काल' का अर्थ है समय या मृत्यु और 'रात्रि' का अर्थ है रात। माँ कालरात्रि का स्वरूप अंधकार के समान काला है और वे काल (मृत्यु) का भी विनाश करने वाली हैं, इसलिए उन्हें कालरात्रि कहा जाता है। वे अज्ञानता के अंधकार को मिटाकर प्रकाश लाती हैं।
2. माँ कालरात्रि का स्वरूप कैसा है?
माँ का स्वरूप अत्यंत डरावना लेकिन शुभ फल देने वाला है:
वर्ण: घने अंधकार की तरह काला।
केश: बिखरे हुए और लंबे।
नेत्र: तीन गोल नेत्र जो ब्रह्मांड की तरह चमकते हैं।
वाहन: गधा (गर्धब)।
मुद्रा: उनके गले में बिजली की तरह चमकने वाली माला है। उनके चार हाथ हैं जिनमें से एक में खड्ग (तलवार), दूसरे में लोहे का अस्त्र, और बाकी दो हाथ वरद और अभय मुद्रा में हैं।
3. माँ कालरात्रि की पूजा का क्या महत्व है?
माँ कालरात्रि शत्रुओं का नाश करने वाली और भय को दूर करने वाली देवी हैं। उनकी पूजा से:
आकस्मिक मृत्यु का भय समाप्त होता है।
भूत-प्रेत, बुरी शक्तियां और नकारात्मक ऊर्जा दूर भागती हैं।
ग्रह बाधाएं (विशेषकर शनि दोष) शांत होती हैं।
4. माँ को 'शुभंकरी' क्यों कहा जाता है?
यद्यपि माँ का रूप अत्यंत भयानक है, लेकिन वे अपने भक्तों पर सदैव कृपा बरसाती हैं और उन्हें शुभ फल प्रदान करती हैं। भक्तों को उनसे डरने की आवश्यकता नहीं होती, इसीलिए उनका एक नाम 'शुभंकरी' भी है।
5. माँ कालरात्रि का पसंदीदा भोग क्या है?
माँ कालरात्रि को गुड़ या गुड़ से बनी मिठाइयों का भोग अत्यंत प्रिय है। सप्तमी के दिन गुड़ का दान करना भी बहुत शुभ माना जाता है।
6. पूजा के समय किस मंत्र का जप करना चाहिए?
माँ की कृपा पाने के लिए इस बीज मंत्र का जप करना श्रेष्ठ है:
ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे नमः।
या विशेष स्तुति मंत्र:
एकवेणी जपाकर्णपूरा नग्ना खरास्थिता।
लम्बोष्ठी कर्णिकाकर्णी तैलाभ्यक्त शरीरिणी॥
