सम्बंधित जानकारी
- दुर्गा अष्टमी 2026: चैत्र नवरात्रि की महाष्टमी पर करें 6 उपाय मां महागौरी होंगी प्रसन्न
- दुर्गा महाअष्टमी 2026: सौभाग्य और सिद्धि पाने के 8 चमत्कारी उपाय, जरूर आजमाएं
- Nanda Saptami 2025: नंदा सप्तमी पर्व, जानें इस व्रत का दिव्य महत्व और रोचक जानकारी
- Shardiya navratri 2025: शारदीय नवरात्रि पर कब है नवपत्रिका पूजा, तारीख, मुहूर्त और विधि
- निसंतान दंपत्ति के लिए वरदान है संतान सप्तमी का व्रत, जानें कब है संतान सप्तमी और क्यों है खास?
चैत्र नवरात्रि सप्तमी 2026: नवपत्रिका पूजा का रहस्य, प्रकृति के 9 रूपों में माँ दुर्गा का आगमन
Shardiya navratri saptami 2026: सप्तमी की देवी कालरात्रि हैं। शारदीय नवरात्रि में नवपत्रिका पूजा सप्तमी के दिन होती है। इसी दिन निशा पूजा भी होती है। असम, बंगाल और ओडिशा में नवपत्रिका पूजा का खास महत्व होता है। नवपत्रिका को कलाबाऊ पूजा भी कहते हैं। इस बार यह पूजा 25 मार्च 2026 बुधवार के दिन होगी। शारदीय नवरात्रि की सप्तमी तिथि अपने साथ एक अद्भुत परंपरा लेकर आती है, जिसे हम 'नवपत्रिका पूजा' के नाम से जानते हैं। यह केवल एक अनुष्ठान नहीं, बल्कि साक्षात प्रकृति के माध्यम से शक्ति की आराधना है। आइए जानते हैं क्या है यह रहस्यमयी और पवित्र परंपरा।
क्या है नवपत्रिका? (प्रकृति और शक्ति का संगम)
'नव' का अर्थ है नौ और 'पत्रिका' का अर्थ है पत्ते। मान्यता है कि माँ दुर्गा के नौ दिव्य रूप इन नौ विशेष पौधों के पत्तों में वास करते हैं। जब इन पत्तों को एक साथ जोड़ा जाता है, तो वे साक्षात देवी का स्वरूप बन जाते हैं।
नवपत्रिका पूजा मुहूर्त:
सुबह: 06:19 से 09:23 के बीच।
दोपहर: 10:55 से 12:27 के बीच।
शाम: 05:03 से 07:45 के बीच।
वे नौ दिव्य पत्ते और उनके प्रतीक:
- केला: देवी ब्रह्माणी का प्रतीक।
- कच्वी (अरबी): देवी कालिका का रूप।
- हल्दी: देवी दुर्गा का स्वरूप।
- अनार: देवी रक्तदंतिका का प्रतीक।
- अशोक: शोक दूर करने वालीं देवी शोकहारिणी।
- मनका: देवी चामुंडा का वास।
- धान: देवी लक्ष्मी का स्वरूप।
- बिल्वा (बेल): भगवान शिव की प्रिय और देवी शिवा।
- जौ (जयंती): देवी कार्तिकी का प्रतीक।
सप्तमी पूजा की भव्य विधि: भक्ति का महास्नान
नवपत्रिका की पूजा सप्तमी के दिन अत्यंत श्रद्धा के साथ की जाती है। इसकी प्रक्रिया जितनी पारंपरिक है, उतनी ही मनमोहक भी:
1. महास्नान का विधान: उत्सव की शुरुआत ब्रह्म मुहूर्त में होती है। भक्त स्वयं स्नान करने के पश्चात इन नौ पवित्र पत्तों (नवपत्रिका) को एक साथ बांधकर पवित्र नदियों या जल से स्नान कराते हैं।
2. पारंपरिक श्रृंगार: जिस प्रकार बंगाली परंपरा में 'लाल बॉर्डर वाली सफेद साड़ी' (लाल-पाड़ साड़ी) सौभाग्य का प्रतीक है, उसी साड़ी से नवपत्रिका को ढका जाता है। इसे 'कोला बौ' यानी नव-वधू के रूप में सजाया जाता है।
3. प्राण प्रतिष्ठा: इसके बाद पूजा पंडाल या घर के मंदिर में माँ दुर्गा की मूर्ति की प्राण प्रतिष्ठा की जाती है, जिससे वातावरण में दैवीय ऊर्जा का संचार होता है।
4. षोडशोपचार पूजन: माँ का स्वागत पूरे राजसी ठाठ-बाट से होता है। इसमें 16 प्रकार की सामग्रियों (जैसे चंदन, पुष्प, फल, धूप, दीप और 16 श्रृंगार) से माँ का पूजन किया जाता है।
5. महासंगम और आरती: अंत में ढोल-नगाड़ों और शंख की ध्वनि के बीच माँ की महाआरती होती है और सभी भक्तों में प्रसाद वितरित किया जाता है।
विशेष नोट: नवपत्रिका पूजा हमें सिखाती है कि ईश्वर कहीं बाहर नहीं, बल्कि हमारे आस-पास की प्रकृति और वनस्पति में ही वास करते हैं।
