Maa siddhidatri: शारदीय या चैत्र नवरात्रि के नौवें दिन यानी नवमी को माता सिद्धिदात्री की पूजा होती है। मां दुर्गाजी की नौवीं शक्ति का नाम सिद्धिदात्री हैं। ये सभी प्रकार की सिद्धियों को देने वाली हैं। मां सिद्धिदात्री चार भुजाओं वाली हैं। इनका वाहन सिंह है। ये कमल पुष्प पर भी आसीन होती हैं। इनकी दाहिनी तरफ के नीचे वाले हाथ में कमलपुष्प है। इन्हें कमलारानी भी कहते हैं। मां सिद्धिदात्री भक्तों और साधकों को ये सभी सिद्धियां प्रदान करने में समर्थ हैं। देवीपुराण के अनुसार भगवान शिव ने इनकी कृपा से ही इन सिद्धियों को प्राप्त किया था। इनकी अनुकम्पा से ही भगवान शिव का आधा शरीर देवी का हुआ था। इसी कारण वे लोक में 'अर्द्धनारीश्वर' नाम से प्रसिद्ध हुए।
सिद्धगन्धर्वयक्षाद्यैरसुरैरमरैरपि।
सेव्यमाना सदा भूयात् सिद्धिदा सिद्धिदायिनी॥
1. मां सिद्धिदात्री का अर्थ
'सिद्धि' का अर्थ है अलौकिक शक्ति, पूर्णता या सफलता और 'दात्री' का अर्थ है देने वाली। माता अष्ठ सिद्धियों को देने वाली होने के कारण सिद्धिदात्री हैं।
2. मां सिद्धिदात्री की पूजा विधि
प्रातः काल की तैयारी
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महानवमी के दिन सुबह जल्दी स्नान करके बैंगनी या लाल रंग के वस्त्र धारण करें। ये रंग शक्ति और समृद्धि के प्रतीक हैं।
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पूजा घर में माँ की प्रतिमा के सामने दीप जलाएं और कलश पूजन करें।
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नवरात्रि के आखिरी दिन घी का दीपक जलाने के साथ-साथ मां सिद्धिदात्री को कमल का फूल अर्पित करना शुभ माना जाता है।
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इसके अलावा जो भी फल या भोजन मां को अर्पित करें वो लाल वस्त्र में लपेट कर दें।
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निर्धनों को भोजन कराने के बाद ही खुद खाएं।
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पूजन-अर्चन के पश्चात हवन, कुमारी पूजन, अर्चन, भोजन, ब्राह्मण भोजन करवाकर पूर्ण होता है।
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इस दिन कन्या पूजन के साथ-साथ कई लोग अपने अस्त्र-शस्त्र, वाहनों और व्यावसायिक औजारों की भी पूजा करते हैं।
ध्यान और संकल्प
हाथों में पुष्प लेकर माँ का ध्यान करें और अपनी मनोकामना पूर्ति का संकल्प लें।
इस मंत्र का उच्चारण करें:
सिद्धगन्धर्वयक्षाद्यैरसुरैरमरैरपि।
सेव्यमाना सदा भूयात् सिद्धिदा सिद्धिदायिनी॥
षोडशोपचार पूजन
अभिषेक: माँ को गंगाजल और दूध से स्नान कराएं।
अर्पण: माँ को गंध, अक्षत, धूप और दीपक अर्पित करें। उन्हें लाल रंग के फूल (विशेषकर गुड़हल) और नारंगी रंग के फल चढ़ाना बहुत शुभ होता है।
श्रृंगार: माँ को नौ प्रकार के खाद्य पदार्थ, नौ तरह के फूल और नौ तरह के फल अर्पित करने की परंपरा है।
विशेष भोग (नैवेद्य)
माँ सिद्धिदात्री को तिल का भोग लगाना अत्यंत प्रिय है।
इसके अलावा, महानवमी पर हलवा, पूरी, काले चने और खीर का भोग लगाया जाता है, जिसे बाद में प्रसाद के रूप में बांटा जाता है।
हवन और पूर्णाहुति
नवरात्रि के समापन पर नवमी के दिन हवन का विशेष महत्व है।
'दुर्गा सप्तशती' के मंत्रों के साथ आहुति दें।
हवन के अंत में माँ की आरती करें और क्षमा प्रार्थना करें।
माँ सिद्धिदात्री का शक्तिशाली मंत्र
ॐ देवी सिद्धिदात्र्यै नमः॥
3. मां सिद्धिदात्री की आरती-lyrics
।।माँ सिद्धिदात्री की आरती।।
जय सिद्धिदात्री तू सिद्धि की दाता
तू भक्तों की रक्षक तू दासों की माता,
तेरा नाम लेते ही मिलती है सिद्धि
तेरे नाम से मन की होती है शुद्धि
कठिन काम सिद्ध कराती हो तुम
हाथ सेवक के सर धरती हो तुम,
तेरी पूजा में न कोई विधि है
तू जगदंबे दाती तू सर्वसिद्धि है
रविवार को तेरा सुमरिन करे जो
तेरी मूर्ति को ही मन में धरे जो,
तू सब काज उसके कराती हो पूरे
कभी काम उस के रहे न अधूरे
तुम्हारी दया और तुम्हारी यह माया
रखे जिसके सर पैर मैया अपनी छाया,
सर्व सिद्धि दाती वो है भाग्यशाली
जो है तेरे दर का ही अम्बे सवाली
हिमाचल है पर्वत जहां वास तेरा
महानंदा मंदिर में है वास तेरा,
मुझे आसरा है तुम्हारा ही माता
वंदना है सवाली तू जिसकी दाता..।
(समाप्त)
4. मां सिद्धिदात्री व्रत की कथा
पौराणिक मान्यताओं अनुसार एक बार पूरे ब्रह्मांड में अंधकार छा गया था। उस अंधकार में एक छोटी सी किरण प्रकट हुई। धीरे-धीरे यह किरण बड़ी होती गई और फिर इसने एक दिव्य नारी का रूप धारण कर लिया। मां सिद्धिदात्री ने प्रकट होकर त्रिदेव अर्थात ब्रह्मा, विष्णु, और महेश को जन्म दिया। इन्हीं देवी मां की शिव जी ने आराधना की। देवी ने उन्हें सिद्धियां प्रदान की। इसी कारण देवी मां भगवती का नौवां स्वरूप मां सिद्धिदात्री कहलाया।
एक अन्य पौराणिक कथा के अनुसार जब सभी देवी देवता महिषासुर के अत्याचार से परेशान हो गए थे तब सभी देवताओं ने त्रिदेवों की शरण ली और फिर तीनों देवों (ब्रह्मा, विष्णु और महेश) ने अपने तेज से मां सिद्धिदात्री को जन्म दिया था। इसके बाद सभी देवताओं ने इन्हें अपने शस्त्र प्रदान किए और माता ने महिषासुर से युद्धकर उसका अंत कर दिया।
5. माता सिद्धिदात्री की चालीसा
॥ श्री सिद्धिदात्री चालीसा ॥
॥दोहा॥
नवरात्रि में नवमी दिन, जो सिद्धिदात्री की साध।
उनका कार्य सिद्ध हो, मिट जाए सब बाध॥
॥चौपाई॥
जय सिद्धिदात्री जगदंबा, सिद्धि का दान देने वाली।
जो भी करे विनती तेरी, उसकी हर मनोकामना पूरी वाली॥
शक्ति स्वरूपिणी माँ अम्बे, जो भी सुमिरे तुझको।
कष्ट हरती, दीनों पर कृपा करती, तेरी महिमा असीम है माँ॥
चारों दिशाओं में तेरी महिमा, तुझसे बढ़कर कोई नहीं।
त्रिदेव भी तेरे आगे नतमस्तक, तेरा वरदान सभी माँगे॥
जो सच्चे मन से भजे तुझको, उसके संकट दूर हो जाए।
धन-धान्य की हो प्राप्ति, जीवन में मंगल हो जाए॥
सिद्धिदात्री माँ जगदंबे, तेरे चरणों में शीश नवाए।
तू ही शक्ति, तू ही ममता, जग में तेरा ही गुण गाए॥
सिद्धियों की दात्री माँ तू, तुझसे बड़ा कोई नहीं।
तेरी महिमा अपरंपार है, तेरा ही गुणगान सभी करते॥
जो भी करे ध्यान तेरा, वह भवसागर से तर जाए।
तेरा स्मरण करते ही माँ, सब दुःख दर्द दूर हो जाए॥
भक्तों की रक्षा करने वाली, तू है जगत की पालनहार।
तेरी महिमा गाते गाते, हम भी हो जाएँ तुझपर निसार॥
नवदुर्गा में तेरा स्थान, तुझसे ही है सबका उद्धार।
सिद्धिदात्री माँ तू है जग की, तेरा ही भजते बारम्बार॥
माँ सिद्धिदात्री की महिमा, कोई कह न पाए।
जो भी हो तेरे ध्यान में लीन, वह सब संकट से छूट जाए॥
सर्व सिद्धियों की दात्री माँ, तेरे चरणों में शीश नवाए।
जो तेरा स्मरण करते, वे भवसागर से पार हो जाए॥
।।दोहा।।
माँ सिद्धिदात्री का जो भी ध्यान करे सुमिरन।
उसके सब कष्ट कट जाएं, हो उसका मंगल सदा॥
॥इति श्री सिद्धिदात्री चालीसा सम्पूर्ण॥
6. मां सिद्धिदात्री की पूजा का लाभ
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माँ सिद्धिदात्री कर्म में पूर्णता और सफलता प्रदान करती हैं।
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साधक को माता आठ सिद्धियां (अणिमा, महिमा आदि) देती हैं।
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कठिन से कठिन कार्य सरल हो जाते हैं।
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व्यक्ति को संसार में यश, बल और धन की प्राप्ति होती है।
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मोक्ष के मार्ग खुलते हैं और मानसिक शांति मिलती है।
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जो भक्त नियम से नौ दिनों तक पूजा करते हैं, माँ उन्हें पूर्णता का आशीर्वाद देती हैं।
7. मां सिद्धिदात्री पर पूछे जाने वाले प्रश्न-FAQs
1. माँ का नाम 'सिद्धिदात्री' क्यों है?
'सिद्धि' का अर्थ है अलौकिक शक्ति, पूर्णता या सफलता और 'दात्री' का अर्थ है देने वाली। जो देवी अपने भक्तों को सभी प्रकार की सिद्धियाँ और मनोवांछित फल प्रदान करती हैं, उन्हें सिद्धिदात्री कहा जाता है। मार्कण्डेय पुराण के अनुसार, अणिमा, महिमा, गरिमा, लघिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, ईशित्व और वशित्व—ये आठों सिद्धियाँ माँ की कृपा से ही प्राप्त होती हैं।
2. भगवान शिव का 'अर्धनारीश्वर' रूप इनसे कैसे जुड़ा है?
पौराणिक कथाओं के अनुसार, भगवान शिव ने माँ सिद्धिदात्री की कठोर तपस्या करके ही सभी आठ सिद्धियां प्राप्त की थीं। माँ की अनुकंपा से ही शिव जी का आधा शरीर देवी का हुआ, जिसके बाद वे संसार में 'अर्धनारीश्वर' के नाम से प्रसिद्ध हुए।
3. माँ सिद्धिदात्री का स्वरूप कैसा है?
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माँ का स्वरूप दिव्य और तेजमयी है:
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वाहन: वे कमल के पुष्प पर विराजमान हैं (सिंह भी उनका वाहन है)।
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मुद्रा: माँ की चार भुजाएं हैं। दाहिने नीचे वाले हाथ में चक्र, ऊपर वाले हाथ में गदा, बाएं नीचे वाले हाथ में शंख और ऊपर वाले हाथ में कमल का पुष्प है।
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आभा: उनके मुख पर मंद मुस्कान और शांत भाव रहता है।
4. महानवमी पर कौन सा भोग लगाना चाहिए?
माँ सिद्धिदात्री को तिल का भोग लगाना अत्यंत प्रिय है। इसके अलावा नवमी के दिन विशेष रूप से हलवा, पूरी, काले चने, खीर और नारियल का भोग लगाया जाता है। नौ प्रकार के खाद्य पदार्थों का नैवेद्य अर्पित करना भी श्रेष्ठ माना जाता है।
5. पूजा के लिए प्रभावी मंत्र कौन सा है?
माँ की स्तुति के लिए इस मंत्र का जप करें:
या देवी सर्वभूतेषु माँ सिद्धिदात्री रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥
बीज मंत्र:
ॐ देवी सिद्धिदात्र्यै नमः॥