चैत्र या शारदीय नवरात्रि की अष्टमी और नवमी तिथि पर देवी माँ की विशेष पूजा और हवन का विधान है। यदि आप बिना पंडित के स्वयं घर पर सरल विधि से हवन करना चाहते हैं, तो यह तरीका अपनाएँ।
हवन के लिए जरूरी सामग्री
हवन कुंड: तांबे का कुंड या 8 ईंटों से बना चौकोर कुंड (इसे मिट्टी या गोबर से लीपकर स्वास्तिक बनाएँ और कलावा बाँधें)।
मुख्य सामग्री: आम की सूखी लकड़ियाँ, घी, कपूर, अक्षत (चावल), जौ, काले तिल और शक्कर (बूरा)।
विशेष आहुति: लौंग का जोड़ा, इलायची, बताशा, मखाने, सूखे मेवे और शहद।
हवन की सरल प्रक्रिया
अग्नि स्थापना: हवन कुंड में आम की लकड़ियाँ रखकर कपूर की सहायता से अग्नि जलाएँ।
शुरुआती आहुति: सबसे पहले गणेश जी, अग्नि देव, नवग्रह, कुलदेवता और स्थान देवता के नाम की घी से आहुति दें।
देवी पूजन: 'ॐ दुर्गाय नमः स्वाहा' या 'ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे स्वाहा' मंत्र पढ़ते हुए अपनी श्रद्धा अनुसार आहुतियां दें। आप दुर्गा सप्तशती के मंत्रों का प्रयोग भी कर सकते हैं।
विशेष भोग: अंत में खीर, फल और शहद की आहुति दें।
पूर्ण आहुति: एक सूखे नारियल (गोला) में छेद करके उसमें घी, पान, सुपारी, लौंग और बताशा भरें। उसे लाल कपड़े या कलावे से लपेटकर 'ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदम्...' मंत्र के साथ अग्नि में समर्पित करें।
समापन: हवन के बाद परिवार सहित आरती करें, सामर्थ्य अनुसार दक्षिणा निकालें और माँ से अपनी गलतियों के लिए क्षमा माँगते हुए सुख-समृद्धि की कामना करें।
हवन के मुख्य मंत्र (स्वाहा के साथ बोलें)
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ॐ आग्नेय नम: स्वाहा (ॐ अग्निदेव ताम्योनम: स्वाहा)।
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ॐ गणेशाय नम: स्वाहा।
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ॐ गौरियाय नम: स्वाहा।
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ॐ नवग्रहाय नम: स्वाहा।
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ॐ दुर्गाय नम: स्वाहा।
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ॐ महाकालिकाय नम: स्वाहा।
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ॐ हनुमते नम: स्वाहा।
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ॐ भैरवाय नम: स्वाहा।
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ॐ कुल देवताय नम: स्वाहा।
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ॐ स्थान देवताय नम: स्वाहा
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ॐ ब्रह्माय नम: स्वाहा।
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ॐ विष्णुवे नम: स्वाहा।
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ॐ शिवाय नम: स्वाहा।
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ॐ जयंती मंगलाकाली भद्रकाली कपालिनी दुर्गा क्षमा शिवाधात्री स्वाहा।
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ॐ स्वधा नमस्तुति स्वाहा।
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ॐ ब्रह्मामुरारी त्रिपुरांतकारी भानु: क्षादी: भूमि सुतो बुधश्च: गुरुश्च शक्रे शनि राहु केतो सर्वे ग्रहा शांति कर: स्वाहा।
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ॐ गुरुर्ब्रह्मा, गुरुर्विष्णु, गुरुर्देवा महेश्वर: गुरु साक्षात परब्रह्मा तस्मै श्री गुरुवे नम: स्वाहा।
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ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिंम् पुष्टिवर्धनम्/ उर्वारुकमिव बन्धनान् मृत्योर्मुक्षीय मामृतात् मृत्युन्जाय नम: स्वाहा।
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ॐ शरणागत दीनार्त परित्राण परायणे, सर्व स्थार्ति हरे देवि नारायणी नमस्तुते।