Mata shailputri: नवरात्रि की प्रथम देवी मां शैलपुत्री: अर्थ, पूजा विधि, आरती, मंत्र, चालीसा, कथा और लाभ
Maa shailputri: शारदीय या चैत्र नवरात्रि के पहले दिन यानी प्रतिपदा को माता शैलपुत्री की पूजा होगी। इनका वाहन वृषभ है, इसलिए यह देवी वृषारूढ़ा के नाम से भी जानी जाती हैं। इस देवी ने दाएं हाथ में त्रिशूल धारण कर रखा है और बाएं हाथ में कमल सुशोभित है। यही देवी प्रथम दुर्गा हैं। यही सती के नाम से भी जानी जाती हैं।
वन्दे वांच्छितलाभाय चंद्रार्धकृतशेखराम्।
वृषारूढ़ां शूलधरां शैलपुत्रीं यशस्विनीम्॥
1. मां शैलपुत्री का अर्थ
शैल अर्थात पर्वत। शैलपुत्री का अर्थ पर्वत राज हिमालय की पुत्री। यह माता का पुत्री स्वरूप है।
2. मां शैलपुत्री की पूजा विधि
- सबसे पहले मां शैलपुत्री की तस्वीर स्थापित करें और उसके नीचे लकड़ी की चौकी पर लाल वस्त्र बिछाएं।
- इसके ऊपर केशर से 'शं' लिखें और उसके ऊपर मनोकामना पूर्ति गुटिका रखें।
- तत्पश्चात् हाथ में लाल पुष्प लेकर शैलपुत्री देवी का ध्यान करें।
- मंत्र इस प्रकार है- ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डाय विच्चे ॐ शैलपुत्री देव्यै नम:।
- मंत्र के साथ ही हाथ के पुष्प मनोकामना गुटिका एवं मां के तस्वीर के ऊपर छोड़ दें।
- इसके बाद प्रसाद अर्पित करें।
- मां शैलपुत्री को नैवेद्य के रूप में गाय का घी या इससे बनी मिठाई अर्पित करना शुभ है।
मां शैलपुत्री की पूजा का मंत्र:
- मां शैलपुत्री के मंत्र का जाप करें।
- इस मंत्र का जप कम से कम 108 करें।
- शैलपुत्री का मंत्र- ॐ देवी शैलपुत्र्यै नमः॥
- मंत्र संख्या पूर्ण होने के बाद मां दुर्गा के चरणों में अपनी मनोकामना व्यक्त करके मां से प्रार्थना करें तथा आरती एवं कीर्तन करें।
- मंत्र के साथ ही हाथ के पुष्प मनोकामना गुटिका एवं मां के तस्वीर के ऊपर छोड़ दें।
- इसके बाद भोग अर्पित करें तथा मां शैलपुत्री के मंत्र का जाप करें।
- यह जप कम से कम 108 होना चाहिए।
प्रार्थना:
वन्दे वांच्छितलाभाय चंद्रार्धकृतशेखराम्।
वृषारूढ़ां शूलधरां शैलपुत्रीं यशस्विनीम्॥
स्तुति
या देवी सर्वभूतेषु माँ शैलपुत्री रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥
3. मां शैलपुत्री की आरती-lyrics
॥ इति श्री शैलपुत्री माता की आरती ॥
शैलपुत्री मां बैल असवार।
करें देवता जय जयकार।।
शिव शंकर की प्रिय भवानी।
तेरी महिमा किसी ने ना जानी।।
पार्वती तू उमा कहलावे।
जो तुझे सिमरे सो सुख पावे।।
ऋद्धि-सिद्धि परवान करे तू।
दया करे धनवान करे तू।।
सोमवार को शिव संग प्यारी।
आरती तेरी जिसने उतारी।।
उसकी सगरी आस पुजा दो।
सगरे दुख तकलीफ मिला दो।।
घी का सुंदर दीप जला के।
गोला गरी का भोग लगा के।।
श्रद्धा भाव से मंत्र गाएं।
प्रेम सहित फिर शीश झुकाएं।।
जय गिरिराज किशोरी अंबे।
शिव मुख चंद्र चकोरी अंबे।।
मनोकामना पूर्ण कर दो।
भक्त सदा सुख संपत्ति भर दो।।
4. मां शैलपुत्री व्रत की कथा
एक बार जब प्रजापति ने यज्ञ किया तो इसमें सारे देवताओं को निमंत्रित किया, भगवान शंकर को नहीं। सती यज्ञ में जाने के लिए विकल हो उठीं। शंकरजी ने कहा कि सारे देवताओं को निमंत्रित किया गया है, उन्हें नहीं। ऐसे में वहां जाना उचित नहीं है। सती का प्रबल आग्रह देखकर शंकरजी ने उन्हें यज्ञ में जाने की अनुमति दे दी। सती जब घर पहुंचीं तो सिर्फ मां ने ही उन्हें स्नेह दिया। बहनों की बातों में व्यंग्य और उपहास के भाव थे। भगवान शंकर के प्रति भी तिरस्कार का भाव है। दक्ष ने भी उनके प्रति अपमानजनक वचन कहे। इससे सती को क्लेश पहुंचा।
वे अपने पति का यह अपमान न सह सकीं और योगाग्नि द्वारा अपने को जलाकर भस्म कर लिया। इस दारुण दुःख से व्यथित होकर शंकर भगवान ने उस यज्ञ का विध्वंस करा दिया। यही सती अगले जन्म में शैलराज हिमालय की पुत्री के रूप में जन्मीं और शैलपुत्री कहलाईं। पार्वती और हेमवती भी इसी देवी के अन्य नाम हैं। शैलपुत्री का विवाह भी भगवान शंकर से हुआ। शैलपुत्री शिवजी की अर्द्धांगिनी बनीं। इनका महत्व और शक्ति अनंत है।
5. माता शैलपुत्री की चालीसा
॥दोहा॥
श्री गणेश गिरिजा सुवन,
मंगल करण कृपाल।
विघ्न हरण मंगल मूरति,
जय जय गिरिजा लाल॥
॥चौपाई॥
जय गिरिराजकुमारि जगत जननी।
सकल सृष्टि पालक भवानी भवानी॥
जय शैलपुत्री माता महिमा अपार।
जो कोई तुमको ध्यावत भव भव पार॥
चंद्रार्ध मस्तक विराजत सुभ गंगा।
तुमहि देखि हरषत हिय शिव संगा॥
वाहन वृषभ राजत छवि निराली।
सोहत रूप मातु शिव की ललाली॥
कहत अष्टमां महिमा अमृत वाणी।
महिमा अपरम्पार विधि न जानी॥
कली कालक पाप हटावनि हरता।
संतन प्रभु प्रीति प्रभु भवानी करता॥
जो कोई तुहि ध्यावत रुधि रासि भवानी।
सकल सृष्टि पालक दुर्गा भवानी॥
गौरी शंकर संग विराजति सुहावनि।
मंगल कारण काली माई कहलावनि॥
ध्यान धरत जो कोई नर भवानी।
सकल सृष्टि में होत सुबानी॥
श्री शैलपुत्री चालीसा का पाठ।
करत ध्यान जस आपनि दास॥
विनय राम दास मनु प्रीतम भवानी।
तासु ध्यान से सकल सृष्टि भवानी॥
6. मां शैलपुत्री की पूजा का लाभ
- मूलाधार चक्र की जागृति
- स्थिरता और धैर्य
- भय और दोषों से मुक्ति
- सौभाग्य और उत्तम स्वास्थ्य
- मनोवांछित फल की प्राप्ति
7. मां शैलपुत्री पर पूछे जाने वाले प्रश्न-FAQs
1. माँ शैलपुत्री का जन्म कैसे हुआ था?
पौराणिक कथा के अनुसार, अपने पूर्व जन्म में वे राजा दक्ष की पुत्री सती थीं। सती ने योगाग्नि में भस्म होने के बाद पर्वतराज हिमालय के घर पुत्री के रूप में जन्म लिया। हिमालय (शैल) की पुत्री होने के कारण ही इनका नाम 'शैलपुत्री' पड़ा।
2. माँ शैलपुत्री का स्वरूप कैसा है?
माँ शैलपुत्री का स्वरूप बेहद सौम्य और शांत है। वे सफेद वस्त्र धारण करती हैं। उनके दाहिने हाथ में त्रिशूल और बाएं हाथ में कमल का पुष्प सुशोभित है। वे वृषभ (बैल) पर सवार होती हैं, इसलिए उन्हें 'वृषारूढ़ा' भी कहा जाता है।
3. नवरात्रि के पहले ही दिन इनकी पूजा क्यों की जाती है?
नवदुर्गाओं में माँ शैलपुत्री प्रथम स्थान पर आती हैं। योग साधना में यह 'मूलाधार चक्र' की अधिष्ठात्री हैं। आध्यात्मिक यात्रा की शुरुआत यहीं से होती है, इसलिए शक्ति की उपासना के पहले दिन इनका पूजन अनिवार्य माना गया है।
4. माँ शैलपुत्री को कौन सा रंग प्रिय है?
माँ शैलपुत्री को सफेद (श्वेत) रंग अत्यंत प्रिय है। यह रंग शुद्धता, शांति और भक्ति का प्रतीक है। भक्त इस दिन सफेद या पीले वस्त्र पहनकर पूजा कर सकते हैं।
5. इनका ध्यान मंत्र क्या है?
पूजा के समय इस मंत्र का जाप करना अत्यंत फलदायी माना जाता है:
वन्दे वाञ्छितलाभाय चन्द्रार्धकृतशेखराम्।
वृषारूढां शूलधरां शैलपुत्रीं यशस्विनीम्॥
6. क्या माँ शैलपुत्री और माँ पार्वती एक ही हैं?
हाँ, माँ शैलपुत्री को ही माँ पार्वती का स्वरूप माना जाता है। हिमालय की पुत्री होने के कारण वे पार्वती कहलाईं और शिव की अर्धांगिनी बनीं।
7. माँ शैलपुत्री की पूजा से कौन से ग्रह का दोष दूर होता है?
ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, माँ शैलपुत्री का संबंध चंद्रमा से है। यदि किसी व्यक्ति का मन अशांत रहता है या कुंडली में चंद्र दोष है, तो इनकी पूजा से मानसिक शांति और शुभ फलों की प्राप्ति होती है।
8. माँ को किन चीजों का भोग लगाना चाहिए?
माँ शैलपुत्री को गाय का शुद्ध घी चढ़ाना सबसे उत्तम है। यदि संभव हो, तो घी से बनी मिठाइयों का भोग लगाएँ। माना जाता है कि इससे भक्त को लंबी आयु और निरोगी काया मिलती है।
Edited by Anirudh Joshi

