नए नियम में MP के 4 शहरों में बाहर हो जाएंगे सैकड़ों अस्पताल, कहां इलाज कराएंगे आयुष्मान योजना के लाखों मरीज?
इंदौर में 10 अस्पतालों के पास भी नहीं NABH certificate, आज से लागू नया नियम, अस्पतालों की होगी जांच
एक अप्रैल से मध्यप्रदेश के अस्पतालों के लिए NABH certificate का नया नियम लागू होने जा रहा है। इस नए नियम का मतलब है कि जिन अस्पतालों के पास यह सर्टिफिकेट होगा, वही अस्पताल आयुष्मान योजना के तहत कार्ड धारक मरीजों का इलाज कर पाएंगे, जिन अस्पतालों के पास यह सर्टिफिकेट नहीं है, वो योजना से बाहर हो जाएंगे। पहले ही आयुष्मान कार्ड धारक मरीजों को अस्पतालों में कई तरह की मुसीबतों का सामना करना पड़ता है। ऐसे में हजारों- लाखों आयुष्मान कार्ड धारक मरीज परेशान होंगे।
स्वास्थ्य विभाग के जानकारों ने वेबदुनिया को बताया कि नए नियम सिर्फ निजी अस्पतालों के लिए लाया गया है, ऐसे में मध्यप्रदेश के इंदौर, भोपाल, ग्वालियर और जबलपुर के 80 प्रतिशत अस्पताल बाहर हो जाएंगे। वहीं, इंदौर में तो 10-12 अस्पतालों के पास भी NABH certificate नहीं है, ऐसे में लाखों मरीज कहां जाएंगे और कहां अपना इलाज कराएंगे, यह सवाल बना हुआ है।
बता दें कि आयुष्मान योजना के तहत ज्यादातर गरीब तबके और वंचित वर्ग के मरीज अपना इलाज कराते हैं। इन मरीजों में कई ऐसे लोग हैं जो आदिवासी इलाकों से आते हैं। इनमें पूरा निमाड़ क्षेत्र शामिल है। यहां से कई गरीब और आदिवासी महिलाएं और बच्चे इस योजनाओं का लाभ लेते हैं।
क्या है नया नियम : बता दें कि प्राइवेट अस्पतालों में इलाज की गुणवत्ता सुधारने के लिए NABH (National Accreditation Board for Hospitals & Healthcare Providers) सर्टिफिकेशन अनिवार्य किया जा रहा है। आयुष्मान भारत योजना के तहत फुल NABH वाले अस्पतालों को सीधा इंपैनलमेंट मिलेगा। 1 अप्रैल 2026 से, भोपाल, इंदौर, ग्वालियर, और जबलपुर में बिना किसी NABH प्रमाण पत्र वाले अस्पताल आयुष्मान योजना के अंतर्गत इलाज नहीं कर पाएंगे। एंट्री लेवल NABH छोटे अस्पतालों के लिए शर्त है कि उन्हें दो साल के भीतर अपना स्टेटस अपग्रेड करना होगा, नहीं तो उनकी संबद्धता खत्म कर दी जाएगी। जबकि ऐसे अस्पताल जिनके पास कोई भी NABH सर्टिफिकेशन नहीं है, वे आयुष्मान योजना में इलाज नहीं कर पाएंगे।
4 शहरों 395 आयुष्मान अस्पताल : बता दें कि मध्यप्रदेश के 4 शहरों भोपाल, इंदौर, ग्वालियर, और जबलपुर में यह नियम लागू किया जा रहा है। इन चारों शहरों में कुल 395 आयुष्मान अस्पताल हैं। इनमें से भी 212 अस्पताल ऐसे हैं जो एंट्री लेवल पर हैं। जबकि सिर्फ 59 के पास NABH सर्टिफिकेट है। ऐसे में बाकी अस्पतालों को नए नियम के मुताबिक अपग्रेड करना होगा, तभी वे मरीजों का इलाज कर पाएंगे, अन्यथा नहीं।
प्रदेश के 80 प्रतिशत अस्पताल हो जाएंगे बाहर : स्वास्थ्य विशेषज्ञों के साथ चर्चा में सामने आया कि नए नियम से पूरे प्रदेश में करीब 80 प्रतिशत अस्पताल बाहर हो जाएंगे, जिसका सीधा असर आयुष्मान कार्ड धारक मरीजों पर होगा। ऐसे में सवाल है कि कम से कम तब तक जब तक बाकी अस्पताल अपग्रेड नहीं हो जाते, प्रदेश के लाखों मरीज अपना इलाज कराने कहां जाएंगे। जिनके पास यह सर्टिफिकेट है उनके पास ओवर क्राउडिंग हो जाएगी।
इंदौर में क्या स्थिति : जबकि इंदौर की बात करें तो यहां डॉक्टरों के मुताबिक 10 या 12 अस्पताल भी शहर में ऐसे नहीं हैं, जिनके पास NABH certificate हो। सिर्फ कुछ बड़े अस्पतालों के पास NABH certificate है। ऐसे में उन पर दबाव बढेगा और ज्यादा मरीजों की संख्या पहुंचने की वजह से वे उन्हें कैसे संभालेंगे और क्या व्यवस्थाएं करेंगे यह सवाल बना हुआ है।
बड़े अस्पतालों को फायदा पहुंचाने की साजिश : स्वास्थ्य विशेषज्ञों और कुछ निजी अस्पताल संचालकों ने अपना नाम प्रकाशित नहीं करने की शर्त पर बताया कि यह सीधे- सीधे प्रदेश के बड़े अस्पतालों को फायदा पहुंचाने के लिए लाया गया नियम है। उन्होंने बताया कि जब अस्पतालों और नर्सिंग होम को स्थानीय विभागीय स्तर पर मान्यता मिली हुई है तो फिर इस नए नियम का क्या औचित्य है। उनका तर्क है कि अगर उनके लिए NABH certificate लेना अनिवार्य करना था तो फिर उन्हें स्थानीय स्तर पर मान्यता क्यों दी गई।
कोर्ट जा सकते हैं अस्पताल संचालक : स्वास्थ्य विभाग में दबी जुबान चर्चा है कि ज्यादातर अस्पताल और नर्सिंग होम संचालक इन नए नियम से नाराज हैं। वे इसे बड़े अस्पतालों को फायदा पहुंचाने की साजिश बता रहे हैं। कहा जा रहा है बगैर NABH certificate के संचालित हो रहे अस्पतालों के संचालक नियम के खिलाफ कोर्ट जा सकते हैं।
क्या कहते है स्वास्थ्य अधिकारी : इंदौर स्वास्थ्य विभाग के सीएमएचओ डॉ माधव प्रसाद हसानी ने वेबदुनिया को बताया कि शासन अस्पतालों के जो निर्धारित मापदंड हैं वो सुनिश्चित करना चाहता है— और उसी तारतम्य में यह नए नियम का फैसला लिया गया होगा। ऐसा मेरा मानना है।
196 बीमारियों को योजना से बाहर : एक निजी डॉक्टर से अपना नाम प्रकाशित नहीं करने की शर्त पर बताया कि सरकार ने मलेरिया, मोतियाबिंद, सर्जिकल डिलीवरी और नसबंदी जैसी 196 बीमारियों को निजी अस्पतालों में आयुष्मान योजना के दायरे से बाहर कर दिया गया है। अब इन बीमारियों का इलाज केवल सरकारी अस्पतालों में ही संभव है, जिससे निजी अस्पतालों पर निर्भर मरीजों को दिक्कत हो रही है। उन्होंने बताया कि ऐसे कई मरीज आते हैं, लेकिन उन्हें मजबूरी में सरकारी अस्पताल लौटना पड रहा है। बता दें कि इंदौर जिले में लगभग 4.5 लाख से अधिक परिवार आयुष्मान योजना के दायरे में आते हैं।
ग्राउंड पर क्या है आयुष्मान योजना की हकीकत?
1. 'सर्वर डाउन' का पुराना बहाना: शहर के कई निजी अस्पतालों में जब मरीज आयुष्मान कार्ड दिखाता है, तो अक्सर जवाब मिलता है— "पोर्टल नहीं चल रहा है।" इस तकनीकी खामी की आड़ में मरीजों को घंटों इंतजार कराया जाता है या फिर इमरजेंसी का हवाला देकर कैश जमा करने का दबाव बनाया जाता है।
2. पैकेज के बाहर का खर्चा : नियम के मुताबिक आयुष्मान योजना में दवाइयों और जांचों का खर्च शामिल है। लेकिन ग्राउंड पर हकीकत कुछ ओर ही है।
सरकारी अस्पतालों (जैसे MYH) में भारी भीड़ के कारण आयुष्मान मरीजों को वेटिंग दी जा रही है। वहीं, कुछ निजी अस्पताल 'बेड फुल' होने का बहाना बनाकर आयुष्मान मरीजों को भर्ती करने से कतराते हैं, क्योंकि उन्हें डर रहता है कि सरकारी भुगतान में देरी होगी।
उम्मीद और हकीकत के बीच
केस 1: चंदन नगर के रहने वाले आरिफ बताते हैं कि उनके पिता को दिल की बीमारी है। निजी अस्पताल ने कार्ड तो लिया, लेकिन स्टेंट के नाम पर उनसे 30 हजार रुपए नकद जमा करवा लिए। तर्क दिया गया कि "योजना वाला स्टेंट अच्छी क्वालिटी का नहीं है।"
केस 2: धार से इंदौर आए एक परिवार ने बताया कि तीन दिन से वे अस्पताल के आयुष्मान काउंटर के चक्कर काट रहे हैं, लेकिन वहां बैठने वाला ऑपरेटर कभी 'लंच' पर होता है तो कभी 'सिस्टम अपडेट' होने की बात कहता है।
केस 2: कुछ निजी अस्पतालों द्वारा मरीजों को आयुष्मान कार्ड होने के बावजूद भर्ती करने से मना किया जा रहा है। एक अस्पताल पहुंचे मरीज किशोर लाल ने बताया कि उनके पास कार्ड है। लेकिन इसके बावजूद उन्हें एडमिट करने से मना कर दिया गया। उन्हें कहा गया कि पहले 50 हजार रुपए जमा करवाइए। जब इसे लेकर शिकायत की गई तो उन्हें धमकाया गया।
डॉ. प्रवीण दाणी जनरल फिजिशियन, इंदौर ने बताया कि आयुष्मान भारत योजना (PM-JAY) निस्संदेह भारत के स्वास्थ्य क्षेत्र की सबसे क्रांतिकारी योजनाओं में से एक है। इंदौर जैसे 'मेडिकल हब' में, जहां मालवा और निमाड़ के गरीब मरीज इलाज की उम्मीद लेकर आते हैं, यह योजना कई परिवारों को बिकने से बचा रही है। लेकिन, एक डॉक्टर के तौर पर जब मैं इसे करीब से देखता हूं, तो इसमें कुछ गंभीर 'सिस्टमैटिक गैप्स' (प्रणालीगत कमियां) नजर आती हैं, जिन्हें नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। इन्हें सुधारने के लिए शासन को कॉल लेना चाहिए।
क्या कहते हैं जिम्मेदार?
स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों का कहना है कि किसी भी मरीज को इलाज से मना नहीं किया जा सकता। यदि कोई अस्पताल पैसे मांगता है या सर्वर का बहाना बनाता है, तो उसकी शिकायत 1800-233-2085 पर की जा सकती है।
कागजों पर आयुष्मान योजना करोड़ों लोगों के लिए वरदान है, लेकिन इंदौर जैसे मेडिकल हब में सिस्टम की सुस्ती और अस्पतालों की मनमानी इस योजना की साख पर सवाल उठा रही है। जब तक मॉनिटरिंग सख्त नहीं होगी, मरीज "मुफ्त इलाज" के सपने और "कर्ज के बोझ" के बीच पिसता रहेगा।
बता दें कि आयुष्मान योजना के तहत ज्यादातर गरीब तबके और वंचित वर्ग के मरीज अपना इलाज कराते हैं। इन मरीजों में कई ऐसे लोग हैं जो आदिवासी इलाकों से आते हैं। इनमें पूरा निमाड़ क्षेत्र शामिल है। यहां से कई गरीब और आदिवासी महिलाएं और बच्चे इस योजनाओं का लाभ लेते हैं।
क्या है नया नियम : बता दें कि प्राइवेट अस्पतालों में इलाज की गुणवत्ता सुधारने के लिए NABH (National Accreditation Board for Hospitals & Healthcare Providers) सर्टिफिकेशन अनिवार्य किया जा रहा है। आयुष्मान भारत योजना के तहत फुल NABH वाले अस्पतालों को सीधा इंपैनलमेंट मिलेगा। 1 अप्रैल 2026 से, भोपाल, इंदौर, ग्वालियर, और जबलपुर में बिना किसी NABH प्रमाण पत्र वाले अस्पताल आयुष्मान योजना के अंतर्गत इलाज नहीं कर पाएंगे। एंट्री लेवल NABH छोटे अस्पतालों के लिए शर्त है कि उन्हें दो साल के भीतर अपना स्टेटस अपग्रेड करना होगा, नहीं तो उनकी संबद्धता खत्म कर दी जाएगी। जबकि ऐसे अस्पताल जिनके पास कोई भी NABH सर्टिफिकेशन नहीं है, वे आयुष्मान योजना में इलाज नहीं कर पाएंगे।
प्रदेश के 80 प्रतिशत अस्पताल हो जाएंगे बाहर : स्वास्थ्य विशेषज्ञों के साथ चर्चा में सामने आया कि नए नियम से पूरे प्रदेश में करीब 80 प्रतिशत अस्पताल बाहर हो जाएंगे, जिसका सीधा असर आयुष्मान कार्ड धारक मरीजों पर होगा। ऐसे में सवाल है कि कम से कम तब तक जब तक बाकी अस्पताल अपग्रेड नहीं हो जाते, प्रदेश के लाखों मरीज अपना इलाज कराने कहां जाएंगे। जिनके पास यह सर्टिफिकेट है उनके पास ओवर क्राउडिंग हो जाएगी।
इंदौर में क्या स्थिति : जबकि इंदौर की बात करें तो यहां डॉक्टरों के मुताबिक 10 या 12 अस्पताल भी शहर में ऐसे नहीं हैं, जिनके पास NABH certificate हो। सिर्फ कुछ बड़े अस्पतालों के पास NABH certificate है। ऐसे में उन पर दबाव बढेगा और ज्यादा मरीजों की संख्या पहुंचने की वजह से वे उन्हें कैसे संभालेंगे और क्या व्यवस्थाएं करेंगे यह सवाल बना हुआ है।
कोर्ट जा सकते हैं अस्पताल संचालक : स्वास्थ्य विभाग में दबी जुबान चर्चा है कि ज्यादातर अस्पताल और नर्सिंग होम संचालक इन नए नियम से नाराज हैं। वे इसे बड़े अस्पतालों को फायदा पहुंचाने की साजिश बता रहे हैं। कहा जा रहा है बगैर NABH certificate के संचालित हो रहे अस्पतालों के संचालक नियम के खिलाफ कोर्ट जा सकते हैं।
क्या कहते है स्वास्थ्य अधिकारी : इंदौर स्वास्थ्य विभाग के सीएमएचओ डॉ माधव प्रसाद हसानी ने वेबदुनिया को बताया कि शासन अस्पतालों के जो निर्धारित मापदंड हैं वो सुनिश्चित करना चाहता है— और उसी तारतम्य में यह नए नियम का फैसला लिया गया होगा। ऐसा मेरा मानना है।
- सिर्फ प्राइवेट अस्पतालों को लेना होगा NABH certificate
- मध्यप्रदेश के 80 प्रतिशत अस्पताल हो जाएंगे नियम से बाहर
- इंदौर में सिर्फ 10-12 अस्पतालों के पास भी नहीं NABH certificate
- इंदौर, भोपाल, ग्वालियर और जबलपुर में आज से लागू नियम
- जिन बड़े अस्पतालों के पास NABH certificate वहीं होगा आयुष्मान इलाज
- नए नियम के बाद अस्पतालों में मरीजों की होगी ओवर क्राउडिंग
- लाखों आयुष्मान कार्ड धारक मरीज हो सकते हैं परेशान
- ज्यादातर छोटे अस्पतालों के पास नहीं है NABH certificate
- कोर्ट जा सकते हैं छोटे निजी अस्पतालों के संचालक
196 बीमारियों को योजना से बाहर : एक निजी डॉक्टर से अपना नाम प्रकाशित नहीं करने की शर्त पर बताया कि सरकार ने मलेरिया, मोतियाबिंद, सर्जिकल डिलीवरी और नसबंदी जैसी 196 बीमारियों को निजी अस्पतालों में आयुष्मान योजना के दायरे से बाहर कर दिया गया है। अब इन बीमारियों का इलाज केवल सरकारी अस्पतालों में ही संभव है, जिससे निजी अस्पतालों पर निर्भर मरीजों को दिक्कत हो रही है। उन्होंने बताया कि ऐसे कई मरीज आते हैं, लेकिन उन्हें मजबूरी में सरकारी अस्पताल लौटना पड रहा है। बता दें कि इंदौर जिले में लगभग 4.5 लाख से अधिक परिवार आयुष्मान योजना के दायरे में आते हैं।
1. 'सर्वर डाउन' का पुराना बहाना: शहर के कई निजी अस्पतालों में जब मरीज आयुष्मान कार्ड दिखाता है, तो अक्सर जवाब मिलता है— "पोर्टल नहीं चल रहा है।" इस तकनीकी खामी की आड़ में मरीजों को घंटों इंतजार कराया जाता है या फिर इमरजेंसी का हवाला देकर कैश जमा करने का दबाव बनाया जाता है।
2. पैकेज के बाहर का खर्चा : नियम के मुताबिक आयुष्मान योजना में दवाइयों और जांचों का खर्च शामिल है। लेकिन ग्राउंड पर हकीकत कुछ ओर ही है।
- मरीजों से बाहर की लैब से जांच कराने को कहा जा रहा है।
- सर्जरी के लिए लगने वाले 'स्पेशल इम्प्लांट्स' के नाम पर 20 से 50 हजार रुपए तक अलग से मांगे जा रहे हैं।
- फार्मेसी पर "स्टॉक नहीं है" कहकर महंगी दवाएं बाहर से मंगवाई जा रही हैं।
सरकारी अस्पतालों (जैसे MYH) में भारी भीड़ के कारण आयुष्मान मरीजों को वेटिंग दी जा रही है। वहीं, कुछ निजी अस्पताल 'बेड फुल' होने का बहाना बनाकर आयुष्मान मरीजों को भर्ती करने से कतराते हैं, क्योंकि उन्हें डर रहता है कि सरकारी भुगतान में देरी होगी।
उम्मीद और हकीकत के बीच
केस 1: चंदन नगर के रहने वाले आरिफ बताते हैं कि उनके पिता को दिल की बीमारी है। निजी अस्पताल ने कार्ड तो लिया, लेकिन स्टेंट के नाम पर उनसे 30 हजार रुपए नकद जमा करवा लिए। तर्क दिया गया कि "योजना वाला स्टेंट अच्छी क्वालिटी का नहीं है।"
केस 2: कुछ निजी अस्पतालों द्वारा मरीजों को आयुष्मान कार्ड होने के बावजूद भर्ती करने से मना किया जा रहा है। एक अस्पताल पहुंचे मरीज किशोर लाल ने बताया कि उनके पास कार्ड है। लेकिन इसके बावजूद उन्हें एडमिट करने से मना कर दिया गया। उन्हें कहा गया कि पहले 50 हजार रुपए जमा करवाइए। जब इसे लेकर शिकायत की गई तो उन्हें धमकाया गया।
- इंदौर के जिला प्रशासन और स्वास्थ्य विभाग के पास हर महीने औसतन 100 से अधिक शिकायतें
- अस्पताल अक्सर 20,000 से 50,000 रुपए तक की 'अतिरिक्त राशि' मांगते हैं
- इंदौर जिले में लगभग 4.5 लाख से अधिक परिवार आयुष्मान योजना के दायरे में आते हैं
- इंदौर में 10 अस्पतालों के पास भी नहीं NABH certificate
डॉ. प्रवीण दाणी जनरल फिजिशियन, इंदौर ने बताया कि आयुष्मान भारत योजना (PM-JAY) निस्संदेह भारत के स्वास्थ्य क्षेत्र की सबसे क्रांतिकारी योजनाओं में से एक है। इंदौर जैसे 'मेडिकल हब' में, जहां मालवा और निमाड़ के गरीब मरीज इलाज की उम्मीद लेकर आते हैं, यह योजना कई परिवारों को बिकने से बचा रही है। लेकिन, एक डॉक्टर के तौर पर जब मैं इसे करीब से देखता हूं, तो इसमें कुछ गंभीर 'सिस्टमैटिक गैप्स' (प्रणालीगत कमियां) नजर आती हैं, जिन्हें नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। इन्हें सुधारने के लिए शासन को कॉल लेना चाहिए।
क्या कहते हैं जिम्मेदार?
स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों का कहना है कि किसी भी मरीज को इलाज से मना नहीं किया जा सकता। यदि कोई अस्पताल पैसे मांगता है या सर्वर का बहाना बनाता है, तो उसकी शिकायत 1800-233-2085 पर की जा सकती है।

