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Last Modified: बुधवार, 6 मई 2026 (14:42 IST)

पश्चिम बंगाल के मुस्लिम-बहुल जिलों में ममता बनर्जी की हार की कहानी, आंकड़ों की जुबानी

पश्चिम बंगाल के मुस्लिम इलाकों में कैसे हारी ममता बनर्जी और भाजपा ने ऐसा क्या कमाल किया

Why did Mamata lose in Bengal
Why did Mamata lose in Bengal: पश्चिम बंगाल की राजनीति में लंबे समय तक यह धारणा मजबूत रही कि मुस्लिम-बहुल जिले- विशेषकर मुर्शिदाबाद, मालदा और उत्तर दिनाजपुर — तृणमूल कांग्रेस के सबसे सुरक्षित चुनावी किले हैं, लेकिन 2026 के चुनावी नतीजों ने इस राजनीतिक समीकरण को पूरी तरह से बदल दिया।
 
इस बार कहानी सिर्फ भाजपा की बढ़त की नहीं है, बल्कि उस सामाजिक और चुनावी पुनर्संरचना की है जिसमें वर्षों से एकजुट दिखने वाला अल्पसंख्यक वोट कई हिस्सों में बिखर गया। इसी बिखराव ने उन सीटों पर भी सत्ता का संतुलन बदल दिया जहां कभी तृणमूल की जीत लगभग तय मानी जाती थी।

आंकड़े क्या कहते हैं?

तीनों प्रमुख मुस्लिम-बहुल जिलों की कुल 43 विधानसभा सीटों पर भाजपा ने उल्लेखनीय बढ़त दर्ज की। 2021 में जहां भाजपा को केवल 8 सीटें मिली थीं, वहीं 2026 में यह संख्या बढ़कर 19 तक पहुंच गई। दूसरी ओर तृणमूल कांग्रेस 35 सीटों से घटकर 22 पर सिमट गई।
Why did Mamata lose in Bengal
बाकी सीटें कांग्रेस, सीपीआई (एम) और क्षेत्रीय दलों — विशेषकर एजेयूपी — के बीच बंट गईं। राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार  यह बदलाव केवल भाजपा के विस्तार का परिणाम नहीं, बल्कि विपक्षी वोटों के पुनर्वितरण का संकेत है, जिसने तृणमूल के  पारंपरिक समर्थन आधार को कमजोर कर दिया।

मुर्शिदाबाद : तृणमूल का सबसे बड़ा झटका

मुर्शिदाबाद इस बदलाव का सबसे बड़ा उदाहरण बनकर उभरा। करीब 66 प्रतिशत मुस्लिम आबादी वाले इस जिले में 2021 में तृणमूल ने 22 में से 20 सीटें जीती थीं। लेकिन 2026 में उसका आंकड़ा घटकर केवल 9 सीटों तक रह गया। भाजपा ने 9 सीटें जीत लीं, जबकि पिछली बार उसके खाते में केवल 2 सीटें थीं।
 
राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण सीटें — रानीनगर, डोमकल, रेजिनगर और नवदा — बहुकोणीय मुकाबलों में बदल गईं। इन क्षेत्रों में कांग्रेस, वामदलों और छोटे क्षेत्रीय दलों ने अल्पसंख्यक वोट बैंक में सेंध लगाई। परिणामस्वरूप तृणमूल का परंपरागत बढ़त अंतर कई सीटों पर खत्म हो गया।
 

एसआईआर और मतदाता सूची विवाद की भूमिका

इस चुनाव में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) ने भी राजनीतिक बहस को तेज किया। तृणमूल कांग्रेस ने आरोप लगाया कि अकेले मुर्शिदाबाद में लगभग 7.8 लाख नाम हटाए गए, जिसका असर उसके परंपरागत मतदाता आधार पर पड़ा।
 
हालांकि चुनावी विश्लेषकों का मानना है कि निर्णायक कारण केवल मतदाता सूची विवाद नहीं था। असल प्रभाव उस राजनीतिक बिखराव का था जिसमें अल्पसंख्यक वोट एक दल के पीछे संगठित होने के बजाय कई विकल्पों में विभाजित हो गया। यही विभाजन करीबी मुकाबलों में निर्णायक साबित हुआ।

भाजपा को कैसे मिला फायदा?

जहां एक तरफ अल्पसंख्यक वोट विभाजित हुए, वहीं दूसरी तरफ कई क्षेत्रों में हिंदू मतदाताओं का अपेक्षाकृत अधिक ध्रुवीकृत और  संगठित मतदान देखने को मिला। कांडी और नबग्राम जैसी सीटों पर भाजपा ने इसी सामाजिक-सांख्यिकीय समीकरण का लाभ उठाया। विश्लेषकों का मानना है कि  यदि मुकाबला द्विध्रुवीय रहता, तो इन सीटों पर भाजपा की राह उतनी आसान नहीं होती।
 
यानी चुनाव का वास्तविक गणित दो समानांतर प्रक्रियाओं पर टिका था:

विपक्षी वोटों का बिखराव

  • भाजपा समर्थक वोटों का अपेक्षाकृत अधिक एकीकरण
  • इसी संयोजन ने तृणमूल के पारंपरिक किलों में सेंध लगाने का रास्ता तैयार किया।
  • मालदा और उत्तर दिनाजपुर में भी बदला समीकरण 
मालदा में भाजपा की सीटें 4 से बढ़कर 6 हो गईं। हालांकि कांग्रेस यहां पूरी तरह समाप्त नहीं हुई, लेकिन उसके प्रभाव ने तृणमूल की जीत के अंतर को कम करने में बड़ी भूमिका निभाई। इसी तरह उत्तर दिनाजपुर में भाजपा 2 से बढ़कर 4 सीटों तक पहुंची, जबकि तृणमूल 7 से घटकर 5 सीटों पर आ गई। कई सीटों पर कांग्रेस और वाम उम्मीदवारों का संयुक्त वोट शेयर उस अंतर से  अधिक था जिससे तृणमूल पराजित हुई। इससे स्पष्ट संकेत मिलता है कि विपक्षी एकता की कमी भाजपा के लिए अप्रत्यक्ष लाभ  में बदल गई।

तीन जिलों से आगे का असर

यह पैटर्न केवल तीन जिलों तक सीमित नहीं रहा। दक्षिण 24 परगना और बीरभूम के कुछ हिस्सों में भी इसी तरह के संकेत  दिखाई दिए, जहाँ अल्पसंख्यक मतदाता निर्णायक भले न हों, लेकिन चुनावी परिणामों को प्रभावित करने की स्थिति में हैं। इन क्षेत्रों में भी बिखरे विपक्षी वोट और भाजपा समर्थक मतों की अपेक्षाकृत एकजुटता ने राजनीतिक संतुलन बदल दिया।

2021 और 2026 के बीच क्या बदला?

  • 2021 के चुनाव में तृणमूल कांग्रेस ने खुद को भाजपा के खिलाफ सबसे मजबूत राजनीतिक दीवार के रूप में प्रस्तुत किया था।
  • एनआरसी और सीएए जैसे मुद्दों के कारण बड़ी संख्या में अल्पसंख्यक मतदाता रणनीतिक रूप से तृणमूल के पीछे एकजुट हुए थे।
लेकिन 2026 में वही रणनीतिक एकता कमजोर पड़ती दिखाई दी। अल्पसंख्यक मतदाताओं का एक हिस्सा कांग्रेस और वामपंथी  दलों की ओर लौटा, जबकि कुछ वोट छोटे क्षेत्रीय दलों में चले गए। नतीजा यह हुआ कि भाजपा को उन इलाकों में भी लाभ मिला जहां उसका संगठनात्मक आधार पहले सीमित माना जाता था।

बंगाल की राजनीति के लिए बड़ा संकेत

2026 के नतीजे यह बताते हैं कि पश्चिम बंगाल की राजनीति अब केवल ध्रुवीकरण या पहचान आधारित वोटिंग तक सीमित नहीं  रही। वोटों का बिखराव, स्थानीय उम्मीदवारों का प्रभाव, क्षेत्रीय असंतोष और बहुकोणीय मुकाबले अब चुनावी परिणामों को अधिक  गहराई से प्रभावित कर रहे हैं।
 
तृणमूल कांग्रेस के लिए सबसे बड़ा संदेश यही है कि पुराने सामाजिक गठबंधनों पर निर्भर रहना अब पर्याप्त नहीं होगा। वहीं विपक्ष के लिए यह चुनाव एक स्पष्ट चेतावनी है — चुनावी राजनीति में अनैक्य केवल वैचारिक कमजोरी नहीं, बल्कि प्रत्यक्ष राजनीतिक नुकसान में बदल सकता है।
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