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नासिक को टक्कर दे रहा है बाबा महाकाल का शहर? उज्जैन में हो रही है सेब (Apple) की बंपर खेती, करोड़ों की कमाई का मौका

Ujjain Apple Farming vs Nashik Climate
Ujjain Apple Farming vs Nashik Climate: जब भी सेब (Apple) का नाम आता है, तो हमारे दिमाग में कश्मीर या हिमाचल प्रदेश की बर्फीली वादियां और ठंडी हवाएं घूमने लगती हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं कि देश के सबसे गर्म इलाकों में से एक, मध्य प्रदेश के उज्जैन में किसान अब सेब की सफल खेती कर रहे हैं?
 
यह खबर सुनते ही महाराष्ट्र के किसानों, विशेषकर देश की 'ग्रेप कैपिटल' कहे जाने वाले नासिक के बागवानों के मन में एक बड़ा सवाल कौंध रहा है— "अगर उज्जैन की तपती गर्मी में सेब उग सकता है, तो कृषि के मामले में सबसे एडवांस माने जाने वाले नासिक में ऐसा क्यों नहीं हो सकता?" 
 
आइए कृषि वैज्ञानिकों (Agricultural Experts) के नजरिए से समझते हैं इसके पीछे का पूरा गणित, मौसम का विज्ञान और छिपे हुए अवसर।

सेब की खेती का नया चमत्कार : HRMN-99 वैरायटी

पारंपरिक रूप से सेब को फलने-फूलाने के लिए 1000 से 1500 घंटे की 'चिलिंग ऑवर' (Chilling Hours) तक के तापमान की जरूरत होती है। यही कारण है कि यह पहाड़ों तक सीमित था। लेकिन हिमाचल के किसान हरिमन शर्मा द्वारा विकसित की गई HRMN-99 नाम की खास वैरायटी ने इस परिभाषा को बदल दिया है। यह वैरायटी:
  • 40 से 42 डिग्री तक के उच्च तापमान को भी सहन कर सकती है।
  • इसे सर्दियों में बहुत ज्यादा ठंड या बर्फबारी की जरूरत नहीं होती।
  • इसी तकनीक का फायदा उठाकर उज्जैन और मालवा क्षेत्र के कुछ प्रगतिशील किसानों ने इसके बाग लगा दिए हैं।

तो फिर नासिक में क्यों नहीं हो सकती सेब की खेती?

अब आते हैं सबसे मुख्य सवाल पर। तकनीकी रूप से देखें तो नासिक में भी सेब की खेती बिल्कुल संभव है, लेकिन व्यावहारिक और आर्थिक कारणों से वहां के किसान इसे नहीं अपना रहे हैं। इसके पीछे 4 मुख्य कारण हैं:
 
1. 'चिलिंग ऑवर' और आर्द्रता (Humidity) का अंतर
उज्जैन (मालवा क्षेत्र) में सर्दियों के दौरान तापमान काफी नीचे (8 से 10 डिग्री तक) चला जाता है और वहां की हवा सूखी (Dry Climate) होती है, जो सेब के पौधों को सर्दियों में सुप्तावस्था (Dormancy) में जाने में मदद करती है। इसके विपरीत, नासिक का तापमान सर्दियों में बहुत ज्यादा नीचे नहीं गिरता और पश्चिमी घाट के पास होने के कारण हवा में नमी (Humidity) अधिक होती है, जिससे फंगस का खतरा बढ़ जाता है।
 
2. नासिक के पास पहले से ही 'ब्लैक गोल्ड' (अंगूर) है
नासिक की मिट्टी और जलवायु अंगूर (Grapes), प्याज और टमाटर के लिए दुनिया में सबसे बेहतरीन मानी जाती है। वहां के किसानों के पास अंगूर की खेती का दशकों का अनुभव और स्थापित ग्लोबल मार्केट (Export Market) है। कोई भी किसान स्थापित मुनाफे को छोड़कर सेब जैसी नई फसल पर जोखिम नहीं लेना चाहता।
 
3. आर्थिक गणित (Economic Viability)
उज्जैन में सेब की खेती अभी शुरुआती या प्रयोगात्मक स्तर पर है। वहां पारंपरिक फसलों (गेहूं, सोयाबीन) से मुनाफा कम होने के कारण किसान नए प्रयोग कर रहे हैं। दूसरी ओर, नासिक का एक एकड़ अंगूर का बाग, सेब की शुरुआती फसल के मुकाबले कहीं ज्यादा रिटर्न देता है।
 
4. पानी का प्रबंधन
सेब के पौधों को गर्मी के महीनों (मार्च से जून) में नियमित लेकिन नियंत्रित पानी की जरूरत होती है। नासिक के कुछ इलाके गर्मियों में पानी की भारी किल्लत से जूझते हैं, जहां अंगूर के बागों को बचाना ही प्राथमिकता बन जाता है।

यदि नासिक के किसान सेब उगाना चाहें, तो क्या हैं नियम? (Expert Agri Tips)

अगर नासिक या महाराष्ट्र के अन्य गर्म इलाकों के किसान ट्रायल के तौर पर सेब उगाना चाहते हैं, तो कृषि विशेषज्ञों के अनुसार इन बातों का ध्यान रखना बेहद जरूरी है:
  • सही वैरायटी का चयन : केवल HRMN-99, अन्ना (Anna), या डोरसेट गोल्डन (Dorset Golden) वैरायटी के पौधे ही लगाएं। कश्मीरी सेब लगाने की भूल बिल्कुल न करें।
  • मिट्टी का परीक्षण : दोमट मिट्टी (Loam Soil) इसके लिए सबसे बेस्ट है।
  • शेड नेट और ड्रिप इरिगेशन : गर्मियों की तेज धूप से बचाने के लिए शुरुआती सालों में शेड नेट का उपयोग करें और पानी के लिए केवल ड्रिप सिस्टम अपनाएं ताकि जड़ों में पानी जमा न हो।
  • धीरज रखें : मैदानी इलाकों में सेब के पौधे को व्यावसायिक रूप से फल देने में 3 से 4 साल का समय लगता है।
उज्जैन में सेब की खेती यह साबित करती है कि आधुनिक कृषि तकनीक से भूगोल की सीमाओं को बदला जा सकता है। नासिक में सेब न होने का कारण 'अक्षमता' नहीं, बल्कि 'आर्थिक प्राथमिकता' है। नासिक के किसान अगर चाहें तो अपनी खाली या कम उपजाऊ जमीन पर ट्रायल के लिए कुछ पौधे लगाकर इसकी शुरुआत जरूर कर सकते हैं।
 
(यह लेख कृषि विशेषज्ञों के अनुभवों और गर्म जलवायु में सेब की खेती के सफल प्रयोगों पर आधारित है। अपनी भूमि पर किसी भी नई फसल की शुरुआत करने से पहले स्थानीय कृषि विज्ञान केंद्र (KVK) या कृषि अधिकारी से सलाह अवश्य लें।)
Edited by: Vrijendra Singh Jhala 
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