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"हाथ में मोटी फाइल और राहुल गांधी से मुलाकात! क्या सच में होने जा रहा है कांग्रेस-TMC का महाविलय?

rahul gandhi meets abhishek banerjee
पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी को उस समय एक और झटका लगा जब सुष्मिता देव का राज्यसभा से इस्तीफा दे दिया। इधर ममता के सोनिया गांधी से 2 बार मुलाकात के बाद अभिषेक बनर्जी की राहुल गांधी से मुलाकात के बाद कयास लग रहे हैं कि तृणमूल कांग्रेस का कांग्रेस में विलय हो सकता है। ALSO READ: क्या यूसुफ पठान ने भी बदल ली है टीम, अमित शाह से मुलाकात की अटकलें, कल्याण बनर्जी के दावे से उड़ी ममता बनर्जी की नींद
 

राहुल गांधी से मिले अभिषेक बनर्जी

TMC सांसद अभिषेक बनर्जी ने दिल्ली में 10, जनपथ पर लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी से मुलाकात की। इस बैठक में टीएमसी सांसद डेरेक ओ ब्रायन भी शामिल थे। मंगलवार को TMC चेयरपर्सन ममता बनर्जी ने कांग्रेस संसदीय दल की चेयरपर्सन सोनिया गांधी से मुलाकात की थी। इससे पहले इंडिया गठबंधन की बैठक में भी सोनिया और ममता गर्मजोशी से मिली थीं।
 

पार्टी बचाने में जुटे ममता और अभिषेक

राज्यसभा चुनाव से पहले ताबड़तोड़ टीएमसी सांसदों के इस्तीफों के बीच ममता बनर्जी और अभिषेक बनर्जी पार्टी बचाने में जुटे हैं। बताया जा रहा है कि जब अभिषेक बनर्जी 10 जनपथ पहुंचे तो उनके हाथ में एक मोटी फाइल थी। यह भी कहा जा रहा है कि इसमें दोनों दलों के मर्जर होने संबंधी दस्तावेज हैं।
 

विलय से ममता और टीएमसी को क्या फायदा? 

अगर कांग्रेस और तृणमूल कांग्रेस का विलय होता है तो इससे ममता बनर्जी और टीएमसी को कई फायदे हो सकते हैं:
 
राष्ट्रीय स्तर पर स्वीकार्यता : टीएमसी मुख्य रूप से पश्चिम बंगाल तक सीमित है। त्रिपुरा, गोवा या मेघालय जैसे राज्यों में उसने विस्तार की कोशिश की, लेकिन उसे खास कामयाबी नहीं मिली। कांग्रेस के साथ विलय से ममता बनर्जी को रातों-रात एक अखिल भारतीय नेतृत्व का ढांचा मिल जाएगा। इससे उनकी पहचान सिर्फ एक क्षेत्रीय नेता की न रहकर राष्ट्रीय स्तर की हो जाएगी।
 
'INDIA' गठबंधन और विपक्ष का चेहरा बनने का मौका : ममता बनर्जी की छवि एक कड़क और जमीनी संघर्ष करने वाली नेता की है। यदि दोनों दलों का विलय होता है, तो वह राष्ट्रीय स्तर पर भाजपा और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सामने विपक्ष का मजबूत और अनुभवी चेहरा बनकर उभर सकती हैं। 
 
ममता को मिलेगा यह मौका : टीएमसी के पास बंगाल के बाहर कैडर या मजबूत बूथ स्तर का नेटवर्क नहीं है। कांग्रेस का संगठन भले ही कमजोर हुआ हो, लेकिन देश के लगभग हर जिले और राज्य में उसके कार्यकर्ता और पुराना ढांचा मौजूद है। इस तैयार ढांचे का सीधा फायदा ममता बनर्जी को अपनी बात पूरे देश में पहुंचाने के लिए मिलेगा।
 
बंगाल में होगा बड़ा फायदा : पश्चिम बंगाल में आज भी कुछ इलाकों (जैसे मालदा, मुर्शिदाबाद) में कांग्रेस का अपना पारंपरिक वोट बैंक है। टीएमसी और कांग्रेस के एक होने से राज्य में धर्मनिरपेक्ष और भाजपा-विरोधी वोटों का बिखराव पूरी तरह रुक जाएगा। इससे मतों का ध्रुवीकरण सीधे टीएमसी के पक्ष में होगा, जिससे राज्य में उनकी पकड़ और मजबूत हो जाएगी।
 

विलय से कांग्रेस को क्या फायदा?

बंगाल में ज़मीनी ताकत और सीटों की गारंटी : 
कांग्रेस पिछले कुछ चुनावों से पश्चिम बंगाल में लगभग हाशिए पर आ चुकी है। टीएमसी के साथ विलय होने से कांग्रेस को देश के तीसरे सबसे ज्यादा लोकसभा सीटों (42 सीटें) वाले राज्य में सीधे तौर पर एक मजबूत जमीनी संगठन और भारी वोट बैंक मिल जाएगा। इससे संसद में कांग्रेस की ताकत में इजाफा हो सकता है।
 
एक आक्रामक और जुझारू जमीनी नेता की एंट्री : कांग्रेस पर अक्सर यह आरोप लगता है कि उसके पास शीर्ष स्तर पर ऐसे नेताओं की कमी है जो 24 घंटे चुनावी मोड में रहकर आक्रामक राजनीति कर सकें। ममता बनर्जी अपनी जुझारू और संघर्षशील राजनीति के लिए जानी जाती हैं। उनके आने से कांग्रेस कार्यकर्ताओं में एक नया जोश भरेगा और भाजपा के खिलाफ सड़क पर उतरकर लड़ने वाली एक कद्दावर नेता उन्हें मिल जाएगी।

 
क्षेत्रीय दलों को साधने में आसानी : ममता बनर्जी के संबंध देश के अन्य क्षेत्रीय दलों (जैसे सपा, राजद, द्रमुक, एनसीपी) के साथ काफी अच्छे हैं। कई बार जो क्षेत्रीय दल कांग्रेस के नेतृत्व को स्वीकार करने में हिचकिचाते हैं, वे ममता बनर्जी की मौजूदगी के कारण कांग्रेस के साथ अधिक सहजता से काम करने को तैयार हो सकते हैं। इससे विपक्ष को एकजुट करना आसान हो जाएगा।
 


विलय में क्या है मुश्किल?

हालांकि यह पूरा समीकरण इस बात पर निर्भर करता है कि दोनों दल अपनी महत्वाकांक्षाओं को कितना छोड़ पाते हैं। कांग्रेस के लिए अधीर रंजन चौधरी से जैसे नेताओं को मनाना भी मुश्कल होगा। बंगाल में कांग्रेस की साथी वामपंथी पार्टियां इस फैसले के बाद पूरी तरह अलग हो सकती हैं।
edited by : Nrapendra Gupta 
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