पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में करारी हार के बाद ममता बनर्जी के खिलाफ बड़ी बगावत की इनसाइड स्टोरी
पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में टीएमसी की करारी हार के बाद अब पार्टी में बगावत खुलकर सामने आ गई है। सोशल मीडिया पर टीएमसी के बागी सांसदों के हस्ताक्षर वाला एक पत्र वायरल हो रहा है जिसमें 19 सांसदों के साइन है। टीएमसी के बागी सांसदों का दावा है कि कल्याण बनर्जी को लोकसभा में चीफ व्हिप बनाए जाने के पहले ही सांसदों ने लोकसभा स्पीकर को पत्र लिखकर अलग गुट की मांग की थी। वहीं अब ममता के सबसे करीबी कल्याण बनर्जी ने भी बगावत का बिगुल फूंक कर नई चुनौती खड़ी कर दी है। वहीं पश्चिम बंगाल में टीमसी के विधायक दल में भी बागवत खुलकर सामने आ चुकी है। 60 विधायकों ने अपना अलग गुट बनाकर ममता बनर्जी को खुली चुनौती देते हुए कहा विधानसभा सत्र में तस्वीर पूरी तरह साफ हो जाएगी।
क्यों बिखर रहा टीएमसी का संगठन?-पश्चिम बंगाल की राजनीति में डेढ़ दशक तक अजेय मानी जाने वाली टीएमसी के लिए विधानसभा चुनावी हार केवल एक राजनीतिक झटका नहीं, बल्कि संगठनात्मक स्तर पर एक बड़े संकट की शुरुआत के तौर पर दिख रहा है। पार्टी की शीर्ष नेता ममता बनर्जी के नेतृत्व पर पहली बार इतने खुले तौर पर सवाल उठ रहे हैं। लोकसभा सांसदों की बढ़ती नाराजगी और राज्यसभा सांसदों के लगातर इस्तीफों ने पार्टी के भीतर चल रहे असंतोष को सार्वजनिक कर दिया है।
पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव परिणाम आने के बाद से ही कोलकाता से लेकर दिल्ली तक टीएमसी के भीतर बेचैनी का माहौल है। टीएमसी में बगावत का सबसे बड़ा कारण पुरानी बनाम नई पीढ़ी के बीच जारी मतभेद को माना जा रहा है। इस बात को समझना ज्यादा मुश्किल नहीं है कि पार्टी के बीच ये जंग एक अघोषित जंग है। पिछले कुछ वर्षों में पार्टी में जिस तरह से ममता बनर्जी के भतीजे अभिषेक बनर्जी का पार्टी में कद बढ़ा और पार्टी के बड़े निर्णयों में उनका सीधा दखल हुआ, उससे पार्टी के वरिष्ठ नेताओं का नराज कर दिया।
पार्टी के कई सांसदों और वरिष्ठ नेताओं ने खुलेआम ममता बनर्जी के भतीजेष अभिषेक बनर्जी की भूमिका और कार्यप्रणाली पर सवाल उठाते हुए ममता बनर्जी पर जमीनी कार्यकर्ताओं की बात नहीं सुनने का आरोप लगाया है। ममता बनर्जी के भतीजे अभिषेक बनर्जी को पार्टी में नंबर दो और भविष्य का नेता माना जाता है। उनके कड़े और नए फैसलों से पार्टी के कई पुराने, वरिष्ठ और कद्दावर नेता खुद को किनारे महसूस कर रहे हैं।
अभिषेक बनर्जी के खिलाफ खुली बगावत- पार्टी में लंबे समय से सीनियर नेताओं के निशाने पर रहे पार्टी के महासचिव अभिषेक बनर्जी के खिलाफ अब खुलकर बगावत हो गई है। ममता के सबसे विश्वत माने जाने वाले पार्टी के सीनियर नेता कल्याण बनर्जी अब टूक शब्दों में कहा दिया है कि दीदी को खुद उनमें और अभिषेक बनर्जी में से एक को चुनना होगाा। इस बात की शुरुआत तब हुई जब,जाली हस्ताक्षर मामले में फंसे अभिषेक बनर्जी का केस लड़ने से कल्याण बनर्जी ने इनकार कर दिया। कल्याण बनर्जी ने मीडिया से बातचीत में यहां तक कहा कि अभिषेक बनर्जी का प्रतिनिधित्व न करने का उनका फैसला न सिर्फ इस मामले में बल्कि किसी भी अन्य मामले में अभिषेक के उनके प्रति अहंकारी व्यवहार के कारण लिया गया है।
वहीं टीमसी की बागी सांसद शताब्दी रॉय ने कहा कि पार्टी के अंदर अंसतोष लंबे समय से चल रहा था लेकिन पार्टी के अंदर आवाज उठाने नहीं दिया जाता था। वह कहती है कि पार्टी के अंदर नाराजगी लंबे समय से थी जो अब खुलकर सामने आ रही है।
सांसदों के इस्तीफे से बिगड़े हालात- विधानसभा चुनाव के समय से टीएमसी के भीतर जिस अंसतोष की आग सुलग रही थी वह अब बगावत के रूप में भड़क गई है। पार्टी के सांसदों ने ममता के नेतृत्व की कार्यशैली पर सवाल उठाने शुरू कर दिए। अंसतोष की शुरुआत बंद कमरों की बैठकों से हुई, लेकिन अब वह इस्तीफे और अगल गुट के रूप मान्यता तक पहुंच गई है। पार्टी सांसदों ने आरोप लगाया कि विधानसभा के दौरान स्थानीय नेताओं की राय को महत्व नहीं दिया गया और उम्मीदवार चयन में भी संगठन की अपेक्षा व्यक्तिगत निष्ठा को प्राथमिकता दी गई। पार्टी सांसदों की गुस्सा अभिषेक बनर्जी के खिलाफ अधिक दिख रहा है।
लोकसभा सांसदों की यह नाराजगी केवल संगठनात्मक मुद्दों तक सीमित नहीं है। कई नेताओं का मानना है कि पार्टी के भीतर नई पीढ़ी और पुराने नेतृत्व के बीच संवाद की कमी लगातार बढ़ती गई। स्थिति तब और गंभीर हो गई जब राज्यसभा के सांसदों ने इस्तीफा देना शुरु कर दिया है। अब तक पार्टी के तीन सांसदों ने इस्तीफा दे दिया है। सांसदों का इस्तीफ इस बात का साफ संकेत दिया कि असंतोष केवल निचले स्तर तक सीमित नहीं है, बल्कि पार्टी के उच्चतम स्तरों तक पहुंच चुका है।
निशाने पर टीएमसी टीएमसी नेता?- विधानसभा चुनाव में टीएमसी की हार के बाद जिस तरह से टीएमसी के नेताओं को निशाना बनाया जा रहा है. उसको भी पार्टी में बगावत का बड़ा कारण माना जा रहा है। विधानसभा चुनाव से पहले और बाद पश्चिम बंगाल में केंद्रीय एजेंसियों की कार्रवाई और पार्टी के कई बड़े नेताओं के जेल जाने से भी आंतरिक असंतोष बढ़ा है। ऐसे में कुछ नेता अपनी राजनीतिक जमीन बचाने के लिए भी पाला बदलने की ताक में हैं।
ममता बनर्जी के सामने 3 बड़ी चुनौती?
1-पार्टी में बागवत और बिखराव को रोकना- ममता बनर्जी के सामने पहले बड़ी चुनौती पार्टी में बगावत को रोकना है। अगर ममता कल्याण बनर्जी जैसे पार्टी के बड़े नेताओं को मना लेती है,तो पार्टी में संभावित एक बड़ी टूट को रोकर सकती है।
1-पार्टी में बागवत और बिखराव को रोकना- ममता बनर्जी के सामने पहले बड़ी चुनौती पार्टी में बगावत को रोकना है। अगर ममता कल्याण बनर्जी जैसे पार्टी के बड़े नेताओं को मना लेती है,तो पार्टी में संभावित एक बड़ी टूट को रोकर सकती है।
2-टीएमसी का अस्तित्व बचाना- ममता बनर्जी ने कांग्रेस से अलग होगा वर्ष 1998 में जिस टीएमसी का गठन किया था, उसके अस्त्तिव पर भी सवाल उठने लगे है। पिछले दिनों टीएमसी के कांग्रेस में विलय की चर्चा भी खूब चली। वहीं कोलकाता से लेकर दिल्ली तक पार्टी के बागी विधायक और सांसद बागी गुट के ही असल टीएमसी होने दावा कर रहे है, उससे साफ है कि आने वाले समय में ममता के सामने चुनौती और बड़ी होगी।
3-अभिषेक बनर्जी को पार्टी की बागडोर सौंपना- ममता बनर्जी अब उम्र के उस पड़ाव पर है जहां पर उनको पार्टी में अपना उत्तराधिकारी तय करना है। ऐसे में यह बड़ा सवाल है कि जब भीतजे अभिषेक बनर्जी के खिलाफ पार्टी में इतना बड़ा अंसतोष है तो क्या ममता अभिषके को पार्टी की बागडोर सौंपने में सफल हो पाएगी।
