सम्बंधित जानकारी
- ट्रंप का बड़ा दावा: ईरान के साथ डील फाइनल, जल्द खुल सकता है होर्मुज स्ट्रेट
- Top News 12 June: ईरान डील पर ट्रंप का बड़ा दावा, मीनाक्षी नटराजन की याचिका पर सुनवाई समेत दिनभर की 5 बड़ी खबरें
- ईरान पर हमला नहीं करेंगे Donald Trump, अमेरिकी राष्ट्रपति ने अचानक क्यों बदला प्लान, पेंटागन में लॉकडाउन
- 9वीं पास युवाओं के लिए शानदार मौका! अहमदाबाद ट्रैफिक पुलिस में 526 पदों पर भर्ती, महिला-पुरुष दोनों कर सकते हैं आवेदन
- एथेनॉल वाले पेट्रोल पर टैक्स खत्म! इस बड़े फैसले से क्या पेट्रोल सस्ता होगा, आपकी गाड़ी पर क्या होगा असर?
गृहिणी अब 'राष्ट्र निर्माता': सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला, घरेलू काम की कीमत 30,000 रुपए महीना तय
सुप्रीम कोर्ट ने गृहिणी को राष्ट्र निर्माता बताते हुए एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया। गृहिणियों के काम की कीमत कम से कम 30 हजार रुपए प्रतिमाह यानी 3.6 लाख रुपए सालाना मानी जाएगी। श्रम का मुल्य हर तीसरे साल 10 प्रतिशत बढ़ेगा। शीर्ष अदालत ने अपने फैसले में कहा कि गृहिणी की मृत्यु पूरे परिवार के लिए घरेलू देखभाल का नुकसान है। अदालत ने सड़क हादसे में महिला की मौत के 25 साल बाद पति को 62.77 लाख का मुआवजा देने को कहा।
'होममेकर' शब्द को अब 'नेशन बिल्डर' की पहचान
एक मामले की सुनवाई के दौरान जस्टिस संजय करोल और कोटिस्वर सिंह की पीठ ने घर के बिना पैसे वाले कामों की आर्थिक अहमियत पर जोर दिया और उम्मीद जताई कि होममेकर शब्द को अब नेशन बिल्डर यानी राष्ट्र निर्माता के तौर पर भी देखा जाएगा। घरेलू महिलाएं घर में योगदान देती हैं। वे राष्ट्र निर्माता हैं। वे राष्ट्र का निर्माण करती हैं। आप उस योगदान का आकलन कैसे करेंगे और उसे पैसे में कैसे बदलेंगे? 'होममेकर' शब्द को अब 'नेशन बिल्डर' की पहचान भी मिलेगी।
कैसे कम होती है राष्ट्रीय आय?
अदालत ने कहा कि घरेलू देखभाल सेवाओं के नुकसान को मुआवजे की अलग श्रेणी माना जाए। इसके लिए गृहिणियों की काल्पनिक मासिक आय 30,000 रुपए निर्धारित करने का निर्देश दिया गया। जिन मामलों में गृहणी कामकाजी है यानी नौकरीपेशा है वहां घरेलू देखभाल के नुकसान का हिस्सा उस मासिक आय से अतिरिक्त होगा जो कोर्ट के सामने साबित की जाएगी।
पीठ ने अर्थशास्त्री सर सेसिल पिगू का जिक्र करते हुए कहा कि महिलाओं की दी गई सेवाएं तब आय में गिनी जाती हैं जब वे मजदूरी के बदले दी जाती हैं, चाहें फैक्ट्री में हो या घर पर, लेकिन जब मांएं और पत्नियां अपने परिवार के लिए मुफ्त में ये सेवाएं देती हैं, तो उन्हें इसमें नहीं गिना जाता। इसलिए अगर कोई आदमी अपनी हाउसकीपर या रसोइए से शादी कर लेता है, नेशनल डिविडेंट (राष्ट्रीय आय) कम हो जाता है।
भारत की जीडीपी में 15-17 प्रतिशत योगदान
कोर्ट ने कहा कि महिलाओं के बिना पैसे वाले देखभाल के काम का भारत की जीडीपी में 15-17 प्रतिशत योगदान माना जाता है, फिर भी उसे न तो पैसे मिलते हैं और न पहचान। पीठ ने उम्मीद जताई की देश के सभी उच्च न्यायालयों के मुख्य न्यायाधीश इस विषय की निगरानी करेंगे, ताकि गृहिणियों के योगदान को उचित कानूनी मान्यता मिल सके।
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में मोटर वाहन दुर्घटना के वर्षों से लंबित मामलों पर चिंता जताते हुए उनके त्वरित निबटारे के लिए दिशा निर्देश जारी किये हैं।
edited by : Nrapendra Gupta
