अरावली पर सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर क्या बोले पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव?
भूपेंद्र यादव ने सोशल मीडिया साइट एक्स पर अपनी पोस्ट में कहा, मैं अरावली रेंज से जुड़े अपने आदेश पर रोक लगाने और मुद्दों का अध्ययन करने के लिए एक नई समिति बनाने के सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों का स्वागत करता हूं। हम अरावली रेंज की सुरक्षा और बहाली में MOEFCC से मांगी गई सभी सहायता देने के लिए प्रतिबद्ध हैं। मौजूदा स्थिति के अनुसार, नए माइनिंग लीज या पुराने माइनिंग लीज के रिन्यूअल के संबंध में खनन पर पूरी तरह से रोक जारी है।
क्या था 20 नवंबर 2025 का फैसला? : सुप्रीम कोर्ट ने पर्यावरण मंत्रालय की कमेटी की सिफारिश स्वीकार करते हुए अरावली की नई परिभाषा को मंजूरी दी थी। इसमें कहा गया था कि कोई भी जगह जो स्थानीय जमीन से 100 मीटर या उससे ज्यादा ऊंची हो अरावली हिल कहलाएगी। दो या ज्यादा ऐसी हिल्स जो एक-दूसरे से 500 मीटर के अंदर हों, तो उनके बीच की जमीन भी अरावली रेंज का हिस्सा मानी जाएगी। सस्टेनेबल माइनिंग प्लान तैयार होने तक नए खनन लाइसेंस पर रोक। संवेदनशील इलाकों में खनन पूरी तरह प्रतिबंधित कर दिया गया।
क्या है सुप्रीम कोर्ट का फैसला : सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि 20 नवंबर के आदेश पर अमल से पहले एक स्वतंत्र और निष्पक्ष समीक्षा जरूरी है। इसके लिए एक हाईपॉवर कमेटी गठित की जाएगी। यह समिति खनन के पर्यावरण असर, परिभाषा की सीमाओं और संरक्षण की निरंतरता जैसे मुद्दों की जांच करेगी। कोर्ट ने मामले की अगली सुनवाई की तारीख 21 जनवरी 2026 तय की है। तब तक यथास्थिति बनी रहेगी और सभी अहम पहलुओं पर विस्तार से विचार किया जाएगा।
गौरतलब है कि अरावली पर्वत श्रृंखला उत्तर भारत की पर्यावरणीय जीवनरेखा मानी जाती है। यह दिल्ली-एनसीआर को रेगिस्तानीकरण से बचाने में मदद करती है। यह भूजल का बड़ा स्रोत है। जैव विविधता का महत्वपूर्ण केंद्र है। यह पर्वतमाला प्रदूषण नियंत्रण और जलवायु संतुलन में बड़ी भूमिका निभाती है।
यदि अरावली के बड़े हिस्से को केवल 100 मीटर ऊंचाई की शर्त के आधार पर उसके दायरे से बाहर कर दिया जाता, तो खनन और निर्माण गतिविधियों के लिए विशाल इलाकों को खुली छूट मिल सकती थी। इससे पर्यावरणीय संतुलन पर गंभीर खतरा पैदा होने की आशंका थी।
edited by : Nrapendra Gupta