केन-बेतवा संघर्ष का 11वां दिन: टूटती सांसें, सुलगते सवाल, मुआवजे और पुनर्वास पर कब जागेगा प्रशासन?
केन बेतवा विस्थापन आंदोलन में जानिए अब तक क्या- क्या हुआ?
छतरपुर (मध्य प्रदेश): विकास परियोजनाओं में विस्थापितों की अनदेखी और कथित भ्रष्टाचार के खिलाफ बुंदेलखंड की धरती पर आक्रोश की आग सुलग उठी है। केन-बेतवा लिंक, मझगांव, रूंज, नैगुवा और एनटीपीसी जैसी बड़ी परियोजनाओं में कथित अनियमितताओं को लेकर 'जय किसान संगठन' का 'चिता आंदोलन' अब और तेज हो गया है।
इस बीच, विस्थापितों के हक की आवाज बुलंद कर रहे सामाजिक कार्यकर्ता अमित भटनागर का आमरण अनशन आज 11वें दिन भी जारी है, जिससे शासन-प्रशासन की मुश्किलें बढ़ती दिख रही हैं। लेकिन प्रशासन जागने को तैयार नहीं है। वहीं नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार ने भी इस मुद्दे पर सवाल उठाए हैं।
500 बच्चे, महिलाएं व बुजुर्ग भूखे: आंदोलनकारियों के अनुसार अनशन के दौरान उनका स्वास्थ्य लगातार बिगड़ रहा है और अब तक करीब 6 किलो वजन कम हो चुका है। वहीं आंदोलन के समर्थन में बुधवार को भी आंदोलन स्थल पर चूल्हा नहीं जला, जिससे करीब 500 बच्चे, महिलाएं और बुजुर्ग भूखे रहे।
पुनर्वास की मांग की तेज हुई : आंदोलनकारी पिछले चार वर्षों से वे ग्राम सभाओं के आयोजन, पारदर्शी सर्वे, जनसुनवाई, आपत्तियों के निराकरण और उचित पुनर्वास की मांग कर रहे हैं, लेकिन उनकी समस्याओं का समाधान नहीं किया गया। विरोध कर रहे लोगों का आरोप है कि पात्र परिवारों को पर्याप्त मुआवजा नहीं मिला, जबकि कई अपात्र लोगों को अधिक राशि दी गई। साथ ही बिचौलियों के खातों में मुआवजा पहुंचने और पुनर्वास प्रक्रिया में भ्रष्टाचार के भी आरोप लगाए गए हैं।
परियोजना में कथित भ्रष्टाचार का आरोप : आंदोलनकारियों की प्रमुख मांगों में प्रत्येक विस्थापित परिवार को तीन एकड़ जमीन, कट-ऑफ डेट वर्ष 2026 तक बढ़ाना, परियोजना में कथित भ्रष्टाचार की उच्च स्तरीय जांच तथा केन-बेतवा लिंक परियोजना के लाभ-हानि पर सार्वजनिक चर्चा और कानून के अनुरूप कार्रवाई शामिल है।
उमंग सिंघार ने लगाए आरोप : मध्य प्रदेश विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार ने केन-बेतवा लिंक परियोजना को लेकर राज्य सरकार पर गंभीर आरोप लगाए हैं। भोपाल में पत्रकारों से चर्चा करते हुए उन्होंने दावा किया कि हाल ही में उन्होंने परियोजना प्रभावित क्षेत्रों का दौरा किया, जहां की स्थिति बेहद चिंताजनक है। उन्होंने कहा कि छतरपुर और पन्ना जिले के 14 गांवों के लोग लंबे समय से जमीन अधिग्रहण के विरोध में आंदोलन कर रहे हैं, लेकिन उनकी समस्याओं का समाधान करने के बजाय प्रशासन बल प्रयोग कर रहा है
लाठियां मारकर धरना स्थल से हटाया : उमंग सिंघार ने आरोप लगाया कि आंदोलन कर रहे महिलाओं और बुजुर्गों को लाठियां मारकर धरना स्थल से हटाया जा रहा है। उनका कहना है कि परियोजना के लिए जमीन अधिग्रहण की पूरी प्रक्रिया में गंभीर अनियमितताएं हुई हैं। उन्होंने दावा किया कि कई स्थानों पर बिना ग्रामसभा की वैधानिक अनुमति के किसानों की जमीन अधिग्रहित कर ली गई। जिन ग्रामसभा प्रस्तावों का हवाला दिया जा रहा है, उनमें वर्तमान सरपंच के हस्ताक्षर तक नहीं हैं, जिससे पूरी प्रक्रिया की वैधता पर सवाल खड़े होते हैं।
केन बेतवा विस्थापन आंदोलन : अब तक क्या क्या हुआ?
असंतोष और शिकायतें (4 वर्ष पहले से): प्रभावित ग्रामीण पिछले चार सालों से पारदर्शी भूमि सर्वेक्षण, ग्राम सभाओं के आयोजन, सार्वजनिक सुनवाई और आपत्तियों के सही निपटारे की मांग कर रहे थे। उनका आरोप था कि पात्र परिवारों को कम मुआवजा मिला या छोड़ दिया गया, जबकि अपात्रों और बिचौलियों ने मोटी रकमें ऐंठ लीं।
प्रशासनिक आश्वासन और विफलता: प्रशासन द्वारा बार-बार सूची में सुधार करने और मुआवजा देने के वादे किए गए। प्रशासन ने दावा किया कि 638 छूटे हुए परिवारों को सूची में जोड़ा गया है, लेकिन ग्रामीणों का कहना था कि 'मैनारी' जैसे कई गांवों के नाम अब भी पूरी तरह गायब हैं।
गिरफ्तारियां और झड़पें (फरवरी 2026): आंदोलन की अगुवाई कर रहे सामाजिक कार्यकर्ता और आम आदमी पार्टी (AAP) के नेता अमित भटनागर को पुलिस ने शांति भंग की आशंका में गिरफ्तार कर लिया। इस गिरफ्तारी के बाद बिजावर तहसील में ग्रामीणों का गुस्सा भड़क उठा। प्रदर्शन हिंसक हुआ, पथराव की घटनाएं हुईं और तत्कालीन एसडीएम व अन्य अधिकारी अंदर ही फंस गए, जिसके बाद पुलिस ने कई मामले दर्ज किए।
पदयात्रा और पीएम को खून से पत्र (मार्च 2026): जेल से रिहा होने के बाद आंदोलन ने फिर जोर पकड़ा। 23 मार्च से पन्ना से छतरपुर के गांवों तक 'न्याय अधिकार पदयात्रा' निकाली गई। 28 मार्च को आंदोलनकारियों ने अपने खून से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिखकर अपनी आपत्तियां दर्ज कराईं।
चिता आंदोलन (अप्रैल और जुलाई 2026): आंदोलनकारियों ने "न्याय दो या मार दो" का नारा दिया। 'चिता आंदोलन' के तहत विस्थापित ग्रामीण और विशेषकर आदिवासी महिलाएं प्रतीक के तौर पर बनाई गई चिताओं पर लेट गईं। उनका कहना था कि ज़मीन और जंगल छिन जाने के बाद वे जीते जी मर चुके हैं।
जल सत्याग्रह और सूली आंदोलन (जुलाई 2026): चिता आंदोलन के बाद ग्रामीणों ने जल सत्याग्रह शुरू किया, जहां महिलाएं और पुरुष घंटो बराना नदी के ठंडे पानी में खड़े रहे। इसके तुरंत बाद आंदोलन 'सूली आंदोलन' (फांसी सत्याग्रह) में बदल गया, जिसमें ग्रामीणों ने अपने गले में फांसी के फंदे डाले और प्रतीकात्मक फांसी के तख्तों पर खड़े होकर प्रदर्शन किया।
11 दिनों का आमरण अनशन (ताजा स्थिति): विस्थापितों की मांगों को लेकर अमित भटनागर और पूना नाम की एक आदिवासी महिला अनिश्चितकालीन आमरण अनशन पर बैठ गए। लगातार 11 दिनों तक भूखे रहने के कारण अमित भटनागर का वजन करीब 6 किलो तक घट चुका है और उनकी तबीयत बेहद नाजुक हो गई है। आंदोलन के समर्थन में प्रदर्शन स्थल पर एक दिन खाना तक नहीं पकाया गया। राजनीतिक मोड़: आंदोलन के लगातार खींचने पर मध्य प्रदेश विधानसभा के नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार सहित कई विपक्षी नेताओं ने आंदोलन स्थल का दौरा किया और सरकार पर विस्थापित आदिवासियों की उपेक्षा करने का आरोप लगाया।
विस्थापितों की मुख्य मांगें : भूमि अधिग्रहण, पुनर्वास और पुनर्व्यवस्थापन अधिनियम 2013 का पूरी तरह पालन हो। प्रत्येक विस्थापित परिवार को कम से कम 3 एकड़ कृषि भूमि दी जाए। पुनर्वास के लिए पात्रता की कट-ऑफ तारीख को बढ़ाकर 2026 किया जाए। केन-बेतवा लिंक परियोजना के सामाजिक-आर्थिक लाभों और नुकसानों पर एक खुली सार्वजनिक बहस (Public Debate) कराई जाए।
सीएम यादव को पत्र लिखेंगे सिंघार : नेता प्रतिपक्ष ने कहा कि वह पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कराने के लिए मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव को पत्र लिखेंगे। उनका कहना है कि यदि निष्पक्ष जांच कराई जाती है तो जमीन अधिग्रहण, मुआवजा वितरण और परियोजना की प्रक्रिया में हुई कथित अनियमितताओं की सच्चाई सामने आ जाएगी।
500 बच्चे, महिलाएं व बुजुर्ग भूखे: आंदोलनकारियों के अनुसार अनशन के दौरान उनका स्वास्थ्य लगातार बिगड़ रहा है और अब तक करीब 6 किलो वजन कम हो चुका है। वहीं आंदोलन के समर्थन में बुधवार को भी आंदोलन स्थल पर चूल्हा नहीं जला, जिससे करीब 500 बच्चे, महिलाएं और बुजुर्ग भूखे रहे।
पुनर्वास की मांग की तेज हुई : आंदोलनकारी पिछले चार वर्षों से वे ग्राम सभाओं के आयोजन, पारदर्शी सर्वे, जनसुनवाई, आपत्तियों के निराकरण और उचित पुनर्वास की मांग कर रहे हैं, लेकिन उनकी समस्याओं का समाधान नहीं किया गया। विरोध कर रहे लोगों का आरोप है कि पात्र परिवारों को पर्याप्त मुआवजा नहीं मिला, जबकि कई अपात्र लोगों को अधिक राशि दी गई। साथ ही बिचौलियों के खातों में मुआवजा पहुंचने और पुनर्वास प्रक्रिया में भ्रष्टाचार के भी आरोप लगाए गए हैं।
उमंग सिंघार ने लगाए आरोप : मध्य प्रदेश विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार ने केन-बेतवा लिंक परियोजना को लेकर राज्य सरकार पर गंभीर आरोप लगाए हैं। भोपाल में पत्रकारों से चर्चा करते हुए उन्होंने दावा किया कि हाल ही में उन्होंने परियोजना प्रभावित क्षेत्रों का दौरा किया, जहां की स्थिति बेहद चिंताजनक है। उन्होंने कहा कि छतरपुर और पन्ना जिले के 14 गांवों के लोग लंबे समय से जमीन अधिग्रहण के विरोध में आंदोलन कर रहे हैं, लेकिन उनकी समस्याओं का समाधान करने के बजाय प्रशासन बल प्रयोग कर रहा है
लाठियां मारकर धरना स्थल से हटाया : उमंग सिंघार ने आरोप लगाया कि आंदोलन कर रहे महिलाओं और बुजुर्गों को लाठियां मारकर धरना स्थल से हटाया जा रहा है। उनका कहना है कि परियोजना के लिए जमीन अधिग्रहण की पूरी प्रक्रिया में गंभीर अनियमितताएं हुई हैं। उन्होंने दावा किया कि कई स्थानों पर बिना ग्रामसभा की वैधानिक अनुमति के किसानों की जमीन अधिग्रहित कर ली गई। जिन ग्रामसभा प्रस्तावों का हवाला दिया जा रहा है, उनमें वर्तमान सरपंच के हस्ताक्षर तक नहीं हैं, जिससे पूरी प्रक्रिया की वैधता पर सवाल खड़े होते हैं।
केन बेतवा विस्थापन आंदोलन : अब तक क्या क्या हुआ?
असंतोष और शिकायतें (4 वर्ष पहले से): प्रभावित ग्रामीण पिछले चार सालों से पारदर्शी भूमि सर्वेक्षण, ग्राम सभाओं के आयोजन, सार्वजनिक सुनवाई और आपत्तियों के सही निपटारे की मांग कर रहे थे। उनका आरोप था कि पात्र परिवारों को कम मुआवजा मिला या छोड़ दिया गया, जबकि अपात्रों और बिचौलियों ने मोटी रकमें ऐंठ लीं।
गिरफ्तारियां और झड़पें (फरवरी 2026): आंदोलन की अगुवाई कर रहे सामाजिक कार्यकर्ता और आम आदमी पार्टी (AAP) के नेता अमित भटनागर को पुलिस ने शांति भंग की आशंका में गिरफ्तार कर लिया। इस गिरफ्तारी के बाद बिजावर तहसील में ग्रामीणों का गुस्सा भड़क उठा। प्रदर्शन हिंसक हुआ, पथराव की घटनाएं हुईं और तत्कालीन एसडीएम व अन्य अधिकारी अंदर ही फंस गए, जिसके बाद पुलिस ने कई मामले दर्ज किए।
पदयात्रा और पीएम को खून से पत्र (मार्च 2026): जेल से रिहा होने के बाद आंदोलन ने फिर जोर पकड़ा। 23 मार्च से पन्ना से छतरपुर के गांवों तक 'न्याय अधिकार पदयात्रा' निकाली गई। 28 मार्च को आंदोलनकारियों ने अपने खून से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिखकर अपनी आपत्तियां दर्ज कराईं।
जल सत्याग्रह और सूली आंदोलन (जुलाई 2026): चिता आंदोलन के बाद ग्रामीणों ने जल सत्याग्रह शुरू किया, जहां महिलाएं और पुरुष घंटो बराना नदी के ठंडे पानी में खड़े रहे। इसके तुरंत बाद आंदोलन 'सूली आंदोलन' (फांसी सत्याग्रह) में बदल गया, जिसमें ग्रामीणों ने अपने गले में फांसी के फंदे डाले और प्रतीकात्मक फांसी के तख्तों पर खड़े होकर प्रदर्शन किया।
11 दिनों का आमरण अनशन (ताजा स्थिति): विस्थापितों की मांगों को लेकर अमित भटनागर और पूना नाम की एक आदिवासी महिला अनिश्चितकालीन आमरण अनशन पर बैठ गए। लगातार 11 दिनों तक भूखे रहने के कारण अमित भटनागर का वजन करीब 6 किलो तक घट चुका है और उनकी तबीयत बेहद नाजुक हो गई है। आंदोलन के समर्थन में प्रदर्शन स्थल पर एक दिन खाना तक नहीं पकाया गया। राजनीतिक मोड़: आंदोलन के लगातार खींचने पर मध्य प्रदेश विधानसभा के नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार सहित कई विपक्षी नेताओं ने आंदोलन स्थल का दौरा किया और सरकार पर विस्थापित आदिवासियों की उपेक्षा करने का आरोप लगाया।
सीएम यादव को पत्र लिखेंगे सिंघार : नेता प्रतिपक्ष ने कहा कि वह पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कराने के लिए मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव को पत्र लिखेंगे। उनका कहना है कि यदि निष्पक्ष जांच कराई जाती है तो जमीन अधिग्रहण, मुआवजा वितरण और परियोजना की प्रक्रिया में हुई कथित अनियमितताओं की सच्चाई सामने आ जाएगी।

