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डिलीवरी बॉय और 'MBA ड्रॉपआउट' से WhatsApp की कमान संभालने तक: CRED के Kunal Shah की ये कहानी आपको रोने और फिर सैल्यूट करने पर मजबूर कर देगी

Kunal Shah
"दर्शनशास्त्र (Philosophy) की पढ़ाई इसलिए चुनी, क्योंकि उसकी क्लास सुबह 8 से 10 बजे खत्म हो जाती थी... ताकि बाकी का पूरा दिन मजदूरी और डेटा एंट्री के काम में लगाया जा सके।"

यह किसी फिल्मी स्क्रिप्ट की लाइन नहीं, बल्कि भारत के सबसे प्रभावशाली फिनटेक (Fintech) लीडर्स में से एक, कुणाल शाह के जीवन का वो कड़वा सच है जिससे बहुत कम लोग वाकिफ हैं। हाल ही में मेटा (Meta) द्वारा CRED में 900 मिलियन डॉलर (लगभग ₹7,500 करोड़) के भारी-भरकम निवेश और कुणाल शाह को WhatsApp के वैश्विक विकास (Global Growth) की जिम्मेदारी सौंपने की खबरों के बीच, दुनिया आज उनकी सफलता को देख रही है। लेकिन इस अरबों डॉलर के साम्राज्य की नींव कामयाबी की चमक से नहीं, बल्कि मजबूरी के पसीने से रखी गई थी।

15 साल की उम्र: जब खिलौनों की जगह कंधों पर आया 'कर्ज का बोझ'
कहानी की शुरुआत होती है मुंबई के एक आम गुजराती परिवार से। जब कुणाल महज 15 साल के थे, तब उनके पिता का फार्मास्युटिकल बिजनेस पूरी तरह ठप हो गया। परिवार रातों-रात दिवालियापन (Bankruptcy) की कगार पर आ खड़ा हुआ।

जिस उम्र में बच्चे बोर्ड परीक्षा की तैयारी करते हैं या करियर के सपने बुनते हैं, उस उम्र में कुणाल मुंबई की लोकल ट्रेनों और तंग गलियों में पैकेट डिलीवर कर रहे थे। परिवार को जिंदा रखने के लिए उन्होंने हर वो काम किया जो सामने आया—चाहे वो डेटा एंट्री ऑपरेटर की नौकरी हो, साइबर कैफे चलाना हो या डिजाइनिंग के छोटे-मोटे फ्रीलांस प्रोजेक्ट्स।

मानवीय दृष्टिकोण (Human Angle): कुणाल शाह अक्सर इंटरव्यूज में बताते हैं कि गरीबी आपको दो चीजें देती है—या तो आप विक्टिम कार्ड (शिकायत करना) खेलने लगते हैं, या फिर आपमें 'सर्वाइवल इंस्टिंक्ट' (हर हाल में जीतने की चाह) जाग जाती है। कुणाल ने दूसरा रास्ता चुना।

फिलॉसफी की डिग्री और 'MBA ड्रॉपआउट' का टैग
मुंबई के विल्सन कॉलेज से बैचलर ऑफ फिलॉसफी (BA) करने के पीछे कुणाल का कोई शौक नहीं था। उन्होंने यह विषय सिर्फ इसलिए चुना क्योंकि इसकी क्लासेस सुबह 8 से 10 बजे के स्लॉट में होती थीं। सुबह 10 बजे कॉलेज का गेट छोड़ते ही उनका असली दिन शुरू होता था, जहाँ वह रात तक पैसे कमाने के लिए अलग-अलग काम करते थे।

इसके बाद उन्होंने नरसी मोंजी इंस्टीट्यूट ऑफ मैनेजमेंट स्टडीज (NMIMS) से MBA में दाखिला तो लिया, लेकिन कुछ ही समय में उन्हें समझ आ गया कि किताबों में लिखी थ्योरी असल जिंदगी के बिजनेस से बहुत अलग है। उन्होंने कोर्स बीच में ही छोड़ दिया। वह 'डिग्री' के पीछे भागने वाले छात्र नहीं, बल्कि 'सीखने' और 'बनाने' (Building) वाले इंसान बन चुके थे।

FreeCharge से CRED तक: असफलताओं से सीखा 'क्रेडिट' का गणित
कुणाल की पहली बड़ी सफलता 2010 में आई, जब उन्होंने संदीप टंडन के साथ मिलकर FreeCharge की शुरुआत की। यह वह दौर था जब ऑनलाइन रिचार्ज का चलन भारत में नया-नया था। 2015 में उन्होंने इसे Snapdeal को 400 मिलियन डॉलर में बेच दिया, जो उस समय का सबसे बड़ा इंटरनेट कूपन सौदा था।
लेकिन कुणाल यहीं नहीं रुके। भारतीय समाज में 'भरोसे' और 'वित्तीय अनुशासन' की कमी को देखते हुए उन्होंने 2018 में CRED की स्थापना की। एक ऐसा प्लेटफॉर्म जो समय पर क्रेडिट कार्ड बिल चुकाने वाले 'प्रीमियम' ग्राहकों को रिवॉर्ड देता है। आज CRED भारत के सबसे यूनीक और प्रीमियम स्टार्टअप्स में से एक है।

मेटा का भरोसा और WhatsApp का नया दौर
आज कहानी एक पूरा चक्र (Full Circle) काट चुकी है। मार्क जुकरबर्ग की कंपनी मेटा (Meta) ने न सिर्फ CRED में 900 मिलियन डॉलर का निवेश किया है, बल्कि कुणाल शाह की रणनीतिक सोच को देखते हुए उन्हें WhatsApp के भविष्य को आकार देने की बड़ी जिम्मेदारी दी है।

जिस लड़के ने कभी दूसरों के घर पैकेट डिलीवर किए थे, वह आज दुनिया के सबसे बड़े मैसेजिंग और पेमेंट इकोसिस्टम (WhatsApp Pay) की ग्लोबल ग्रोथ का नेतृत्व करने जा रहा है।

क्या सीख सकते हैं हम कुणाल शाह से?
कठिनाई ही सबसे बड़ी यूनिवर्सिटी है:
कुणाल शाह का मानना है कि जो लोग सीधे एसी कमरों से निकलकर बिजनेस स्कूल जाते हैं, वे जमीन की सच्चाई नहीं समझ पाते। उनके डिलीवरी के काम ने उन्हें इंसानी व्यवहार (Consumer Behavior) को गहराई से समझना सिखाया।

सिस्टम को क्वेश्चन करें: दर्शनशास्त्र (Philosophy) की पढ़ाई ने उन्हें हर चीज के पीछे 'क्यों' (Why) पूछना सिखाया, जिसने आगे चलकर उन्हें बड़े बिजनेस मॉडल बनाने में मदद की।

ड्रॉपआउट होना बहाना नहीं है: कुणाल शाह कॉलेज ड्रॉपआउट जरूर हैं, लेकिन वह 'लर्निंग ड्रॉपआउट' नहीं हैं। वह आज भी भारतीय स्टार्टअप इकोसिस्टम में सबसे ज्यादा पढ़ने और सीखने वाले आंत्रप्रेन्योर माने जाते हैं।
कुणाल की कहानी साबित करती है कि आपकी शुरुआत कैसी थी, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। अगर आपमें लगातार 'हसल' (संघर्ष) करने का जज्बा है, तो एक दिन दुनिया आपके बनाए रास्ते पर चलने को मजबूर हो जाती है।
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