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El Nino Effect on Indian Monsoon 2026: अल नीनो का कहर, 41% बारिश की कमी और 5 राज्यों में सूखे का खतरा
प्रशांत महासागर में बन रही एक वैश्विक मौसमी घटना भारत के मानसून के लिए बड़ी चुनौती बनती दिखाई दे रही है। दक्षिण-पश्चिम मानसून की शुरुआती प्रगति के बाद कई क्षेत्रों में इसकी रफ्तार धीमी पड़ गई है, जिसके चलते देश के अनेक हिस्सों में सामान्य से काफी कम वर्षा दर्ज की गई है।
मौसम वैज्ञानिकों का मानना है कि यदि अल नीनो का प्रभाव अगले कुछ महीनों तक बना रहता है, तो न केवल मानसून कमजोर पड़ सकता है, बल्कि कृषि उत्पादन, जल संसाधनों और खाद्य कीमतों पर भी इसका व्यापक असर देखने को मिल सकता है। ALSO READ: Monsoon : मौसम के महादानव अल-नीनो को परास्त करेगा Indian Ocean Dipole, जानिए कैसे होगी झमाझम बारिश
क्या है अल नीनो और क्यों बढ़ जाती है चिंता?
'अल नीनो' (El Niño) प्रशांत महासागर में समुद्री सतह के तापमान में असामान्य वृद्धि की एक प्राकृतिक जलवायु घटना है। इसके कारण वैश्विक मौसम चक्र प्रभावित होता है और भारत में मानसून कमजोर पड़ने की आशंका बढ़ जाती है।
विशेषज्ञों के अनुसार, इस बार अल नीनो का प्रभाव जून से ही दिखाई देने लगा है। यदि इसकी तीव्रता बढ़ती है, तो मानसून सीजन के मध्य और अंतिम चरण में वर्षा की कमी और अधिक गंभीर हो सकती है।
किन राज्यों पर सबसे ज्यादा खतरा?
मौसम विशेषज्ञों का अनुमान है कि यदि अल नीनो लंबे समय तक सक्रिय रहा, तो देश के पांच प्रमुख कृषि राज्यों पर सबसे अधिक असर पड़ सकता है:
- महाराष्ट्र
- मध्य प्रदेश
- उत्तर प्रदेश
- बिहार
- उत्तरी कर्नाटक
इन राज्यों में खरीफ फसलों की बुआई और उत्पादन पर सीधा प्रभाव पड़ने की आशंका है।
शहरों में भी बढ़ रहा जल संकट
सूखे का खतरा केवल ग्रामीण क्षेत्रों तक सीमित नहीं है। देश के कई बड़े शहर पहले से ही जल संकट का सामना कर रहे हैं।
विशेषज्ञों का कहना है कि जल संचयन और वर्षा जल संरक्षण की दिशा में पर्याप्त प्रगति न होने के कारण कई महानगर मानसून पर अत्यधिक निर्भर हैं। यदि वर्षा सामान्य से कम रहती है, तो मुंबई, पुणे समेत कई शहरों में जलापूर्ति प्रभावित हो सकती है।
जल विशेषज्ञों का मानना है कि अब जल संरक्षण, रीसाइक्लिंग और वर्षा जल संग्रहण को जीवनशैली का हिस्सा बनाना समय की मांग है। ALSO READ: 5 चक्रव्यूह में फंसा मानसून, बारिश को तरसते 7 राज्यों में पारा 40°C के पार, जानें आपके शहर का हाल
क्या 2026-27 की गर्मियां रिकॉर्ड तोड़ सकती हैं?
मौसम वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी है कि अल नीनो के प्रभाव के चलते आगामी वर्षों में वैश्विक तापमान नए रिकॉर्ड बना सकता है।
कुछ विशेषज्ञों का अनुमान है कि भारत के कई हिस्सों में गर्मी की तीव्रता बढ़ सकती है और हीटवेव की घटनाएं अधिक गंभीर रूप ले सकती हैं। ऐसे हालात में कई क्षेत्रों में तापमान 50 डिग्री सेल्सियस के करीब पहुंचने की आशंका भी जताई जा रही है।
किसानों पर दोहरी मार
कम बारिश का सबसे बड़ा असर कृषि क्षेत्र पर पड़ता है।
केंद्रीय कृषि मंत्रालय के अनुसार, यदि वर्षा में उल्लेखनीय कमी बनी रहती है, तो खरीफ सीजन की प्रमुख फसलें प्रभावित हो सकती हैं, जिनमें शामिल हैं:
- धान
- तुअर और मूंग जैसी दालें
- सोयाबीन और मूंगफली जैसे तिलहन
- कपास
- बाजरा
- फल और सब्जियां
विशेषज्ञों का कहना है कि किसान अचानक फसल पैटर्न नहीं बदल सकते, क्योंकि खेती केवल तकनीकी नहीं बल्कि सामाजिक और आर्थिक व्यवस्था से भी जुड़ी होती है।
महंगाई पर भी पड़ सकता है असर
कृषि उत्पादन घटने का सीधा असर बाजार पर पड़ता है।
यदि उत्पादन कम हुआ और त्योहारी सीजन में मांग बढ़ी, तो खाद्य पदार्थों की कीमतों में तेजी देखने को मिल सकती है। दाल, तेल, सब्जियां और अन्य आवश्यक वस्तुएं महंगी हो सकती हैं, जिससे आम उपभोक्ता की जेब पर अतिरिक्त बोझ पड़ने की आशंका है।
राहत की खबर भी है
हालांकि स्थिति पूरी तरह निराशाजनक नहीं है। भारत के पास वर्तमान में पर्याप्त खाद्यान्न भंडार मौजूद है, जो किसी भी संभावित आपूर्ति संकट से निपटने में मदद कर सकता है। इसके अलावा :
- देश का सिंचित क्षेत्र पिछले दशक में बढ़ा है।
- मौसम पूर्वानुमान तकनीक पहले से अधिक सटीक हुई है।
- AI आधारित कृषि सलाह किसानों को समय रहते निर्णय लेने में मदद कर रही है।
- केंद्र और राज्य सरकारें लगातार निगरानी कर रही हैं।
विशेषज्ञों की सलाह: किसान क्या करें?
विशेषज्ञों ने किसानों को निम्नलिखित सुझाव दिए हैं:
✔ एक ही फसल पर पूरी निर्भरता से बचें।
✔ मिश्रित खेती अपनाएं।
✔ कम पानी वाली फसलों को प्राथमिकता दें।
✔ मौसम पूर्वानुमान के आधार पर बुआई की योजना बनाएं।
✔ सूखा प्रभावित क्षेत्रों में दोबारा बुआई का जोखिम सोच-समझकर लें।
उम्मीद की किरण: IOD बन सकता है गेमचेंजर
मौसम वैज्ञानिकों की नजर अब 'पॉजिटिव इंडियन ओशन डिपोल' (IOD) पर है। यदि मानसून के उत्तरार्ध में पॉजिटिव IOD सक्रिय होता है, तो यह अल नीनो के नकारात्मक प्रभाव को कुछ हद तक संतुलित कर सकता है और देश के कई हिस्सों में अतिरिक्त वर्षा का कारण बन सकता है।
फिलहाल देश की निगाहें आसमान पर टिकी हैं। आने वाले कुछ सप्ताह तय करेंगे कि अल नीनो भारत के लिए केवल एक मौसमी चुनौती साबित होगा या फिर यह खेती, पानी और महंगाई से जुड़ा बड़ा राष्ट्रीय संकट बन जाएगा।
