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अल-नीनो और कमजोर मानसून से देश के 315 जिलों में सूखे की आहट, कम बारिश ने बढ़ाई किसानों की चिंता
अब तक देश में 43 फीसदी कम बारिश, अल नीनो के चलते 92% तक कम बारिश का अनुमान
अल नीनो और देश के बड़े हिस्से में मानसून की धीमी रफ्तार ने किसानों की चिंता बढ़ा दी है। मानसून जो इस बार 4 दिन की देरी से केरल पहुंचा था, उसकी रफ्तार काफी धीमी है। मध्यप्रदेश जहां सामान्य तौर पर मानसून 15-16 जून को दस्तक दे देता है वहां पर 10 दिन के बाद भी मानसून की एंट्री नहीं हो पाई है। कमजोर मानसून और मानसून को लेकर अनिश्चितता ने किसानों के सामने बड़ी मुश्किलें खड़ी कर दी है। आईएमडी ने पहले ही देश में इस बार मानसून के कमजोर रहने और 92 फीसदी तक ही मानसून बारिश होने के अनुमान जताया है।
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कम बारिश से 315 जिले प्रभावित-देश में दक्षिण पश्चिम मानसून की धीमी रफ्तार और देश के 315 जिलों में मानसून कमजोर रहने की संभावना है। कृषि मंत्रालय और आईसीएआर ने मिलकर वैज्ञानिक डेटा के आधार पर देश के उन जिलों का आकलन किया, जहाँ कम वर्षा और सिंचाई की कमी का खतरा ज़्यादा है। इनमें से 111 जिले उच्च प्राथमिकता वाले हैं, जहाँ सिंचाई का दायरा 25 प्रतिशत से कम है। 76 जिले मध्यम प्राथमिकता वाले हैं, जहाँ 25–50 प्रतिशत तक सिंचाई की व्यवस्था है। 128 जिले निम्न प्राथमिकता वाले हैं, जहाँ डैम और अन्य साधनों से अपेक्षाकृत बेहतर सिंचाई उपलब्ध है। इन जिलों का बड़ा हिस्सा 12 राज्यों जैसे मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, गुजरात, उत्तर प्रदेश, राजस्थान, कर्नाटक, बिहार, झारखंड, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश और ओडिशा में है।
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कम बारिश से 315 जिले प्रभावित-देश में दक्षिण पश्चिम मानसून की धीमी रफ्तार और देश के 315 जिलों में मानसून कमजोर रहने की संभावना है। कृषि मंत्रालय और आईसीएआर ने मिलकर वैज्ञानिक डेटा के आधार पर देश के उन जिलों का आकलन किया, जहाँ कम वर्षा और सिंचाई की कमी का खतरा ज़्यादा है। इनमें से 111 जिले उच्च प्राथमिकता वाले हैं, जहाँ सिंचाई का दायरा 25 प्रतिशत से कम है। 76 जिले मध्यम प्राथमिकता वाले हैं, जहाँ 25–50 प्रतिशत तक सिंचाई की व्यवस्था है। 128 जिले निम्न प्राथमिकता वाले हैं, जहाँ डैम और अन्य साधनों से अपेक्षाकृत बेहतर सिंचाई उपलब्ध है। इन जिलों का बड़ा हिस्सा 12 राज्यों जैसे मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, गुजरात, उत्तर प्रदेश, राजस्थान, कर्नाटक, बिहार, झारखंड, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश और ओडिशा में है।
कमजोर मानसून का खेती-किसानी पर असर-देश में मानसून की रफ्तार काफी धीमी है और मानसून सामान्य से काफी लेट चल रहा है और अब तक लगभग 43 प्रतिशत कम बारिश दर्ज की गई है। मौसम विभाग के अनुमान के मुताबिक 2 जुलाई तक के सप्ताह में भी बारिश कमजोर रहने की संभावना है। मध्यप्रदेश में भी मानसून के 26 जुलाई तक पहुंचने का अनुमान है। मानसून के लेट होने का इसका सीधा असर खरीफ की फसलों पर पड़ रहा है, खासकर उन क्षेत्रों में, जहाँ खेती पूरी तरह मानसून पर निर्भर है। मानसून की शुरुआत का असर खेतों में साफ दिखाई देने लगा है,दलहन और कपास जैसी फसलों की बुवाई में गिरावट दर्ज की गई है।
कृषि वैज्ञानिक साधुराम शर्मा कहते हैं कि आगे की स्थिति पूरी तरह जुलाई और अगस्त में होने वाली बारिश पर निर्भर करेंगी। अगर बारिश का सिलसिला कमजोर बना रहा, तो बुवाई का दायरा और उत्पादन दोनों प्रभावित हो सकते हैं। वह कहते हैं कि कमजोर मानसून से कम अवधि में पकने वाली और कम पानी में बेहतर उत्पादन देने वाली फसलों की खेती करना एक बेहतर विकल्प है। इसके साथ किसानों को खेती में फसल विविधीकरण को अपनाना चाहिए, जिससे उनकी एक फसल पर निर्भरता कम हो। किसानों को इंटर‑क्रॉपिंग और मिश्रित खेती को प्रोत्साहन मिले, ताकि अगर एक फसल प्रभावित हो, तो दूसरी से आय बनी रहे। दलहन, मोटा अनाज (श्री अन्न) और तिलहन जैसी फसलों पर विशेष जोर दिया, जो सीमित नमी में भी बेहतर प्रदर्शन कर सकती हैं।
कृषि वैज्ञानिक साधुराम शर्मा कहते हैं कि बारिश की कम संभावना के अनुमान में किसानों को पूरी जमीन पर केवल धान जैसी पानी पर निर्भर फसल लगाने से बचना चाहिए, इसके बजाय कम पानी में तैयार होने वाली फसलों को शामिल करना बेहतर हो सकता है। मानसून के कमजोर होने से किसान बाजरा और ज्वार जैसी कम पानी वाली फसलों की खेती कर सकते है। वहीं मूंग और उड़द कम समय में तैयार होने वाली फैसले हैं, कम बारिश में भी अच्छा उत्पादन दे सकती है।
