महबूबा मुफ्ती के पेलेट गन वाले बयान पर बवाल, फिर छिड़ी कश्मीर की पुरानी बहस, जानिए पूरा विवाद
Mehbooba Mufti : जम्मू कश्मीर की पूर्व मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती की उन टिप्पणियों ने, जिनमें उन्होंने कथित तौर पर कुछ परिस्थितियों में कश्मीर में पेलेट-फायरिंग शाटगन के इस्तेमाल का बचाव किया है, पिछले 15 वर्षों में इस क्षेत्र में इस्तेमाल किए गए सबसे विवादास्पद भीड़ नियंत्रण उपायों में से एक पर लंबे समय से चल रही बहस को फिर से हवा दे दी है।
दरअसल पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी (पीडीपी) की अध्यक्षा महबूबा मुफ्ती उस समय आलोचनाओं के घेरे में आ गईं, जब उन्होंने नई दिल्ली के जंतर-मंतर पर एक विरोध प्रदर्शन के दौरान कहा कि राष्ट्रीय राजधानी में प्रदर्शनकारियों के खिलाफ पेलेट गन का कोई स्थान नहीं है, लेकिन कश्मीर में यह समझ में आता है क्योंकि वहां सुरक्षाबलों को आतंकवाद का सामना करना पड़ता है।
इन टिप्पणियों पर सत्ताधारी नेशनल कॉन्फ्रेंस (नेकां) ने तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की और माफी की मांग करते हुए कहा कि ये टिप्पणियां उस हथियार को उचित ठहराती प्रतीत होती हैं जिसके कारण हजारों लोग घायल हुए और सैकड़ों लोगों की आंखों में जीवनभर के लिए गंभीर चोटें आईं।
इस विवाद ने एक बार फिर इस बात पर ध्यान केंद्रित किया है कि पेलेट गन क्यों पेश की गईं, कश्मीर में भीड़ नियंत्रण के लिए वे किस प्रकार एक महत्वपूर्ण साधन बन गईं और वे आज भी लोगों की राय को क्यों विभाजित करती हैं?
वर्ष 2009-10 की अवधि के दौरान केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल (सीआरपीएफ) ने पत्थरबाजी की घटनाओं में सैकड़ों कर्मियों के घायल होने की सूचना दी और इस घटना को आतंकवाद और सीमा पार से आने वाले धन से जुड़ी एक उभरती हुई सुरक्षा चुनौती के रूप में वर्णित किया, इन आरोपों को पाकिस्तान ने नकार दिया है।
फिर 2016 के हिंसक प्रदर्शनों के दौरान पेलेट गन अभूतपूर्व जांच के दायरे में आ गईं, जब महबूबा मुफ्ती पीडीपी-भाजपा गठबंधन सरकार की प्रमुख थीं। तब हिजबुल मुजाहिदीन कमांडर बुरहान वानी की 8 जुलाई 2016 को हुई मौत ने घाटी में महीनों तक चले विरोध प्रदर्शनों को जन्म दिया। प्रदर्शनकारियों और पुलिस एवं अर्धसैनिक बलों के बीच झड़पों के दौरान सुरक्षा बलों ने बार-बार पेलेट गन का इस्तेमाल किया।
संसद और पूर्व जम्मू कश्मीर विधानसभा में प्रस्तुत सरकारी आंकड़ों से पता चला कि 2016 के प्रदर्शनों के दौरान 1200 से अधिक लोग आंखों में चोट लगने से घायल हुए, जबकि कई हजार लोगों के शरीर के अन्य हिस्सों में छर्रे लगने से चोटें आईं।
डॉक्टरों ने मरीजों की इस भारी संख्या को आंखों में चोट लगने की अब तक की सबसे बड़ी सामूहिक घटना बताया, जिसके चलते उन्होंने कई महीनों में सैकड़ों आपातकालीन सर्जरी कीं। मानवाधिकार संगठनों ने एमनेस्टी इंटरनेशनल और ह्यूमन राइट्स वाच ने पेलेट गन के इस्तेमाल की आलोचना करते हुए कहा कि इस हथियार के व्यापक प्रसार के कारण यह स्वाभाविक रूप से अंधाधुंध हमला करने वाला बन जाता है।
कश्मीर पर अपनी 2018 की रिपोर्ट में संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार उच्चायुक्त कार्यालय ने भारत से गंभीर चोटों के कारण छर्रे दागने वाली शाटगनों के उपयोग की समीक्षा करने का आग्रह किया था।

