- पेड़ों की अंधाधुंध कटाई और अर्बनाइजेशन ने मचाई तबाही
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फॉरेस्ट एलिमेंट वाले पेड़ खत्म हो गए, आगे होंगे विस्फोटक परिणाम
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केंद्रीय भूजल रिपोर्ट में सबसे खराब स्थिति में इंदौर का वॉटर लेवल
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10 साल में कैसे बदला इंदौर का तापमान और मौसम हुआ
इंदौर सुबह की धूप और शाम की ठंडी हवाओं के लिए जाना जाता था। कभी शब ए मालवा की सबसे बड़ी गवाही इंदौर ही देता था। लोगों को अब भी यहां की हल्की गर्म दुपहरें, ठंडी शामें और ठुठरती रातें याद हैं। लेकिन पिछले कुछ साल में इंदौर के मौसम की कहानी 360 डिग्री बदल गई है। अब कूलर और एसी भी दम तोड़ चुके हैं। आसमान अंगारे बरसा रहा है, धरती आग उगल रही। सड़कें पिघल रही हैं। देश के सबसे स्वच्छ शहर में पानी के लिए त्राहिमाम है। हर गली- मोहल्ले में बूंद- बूंद पानी के लिए मची दौड़ अपनी कहानी खुद बयां कर रही है। पानी के लिए लोग सड़कों पर हैं। गली-मोहल्ले पानी के खाली ड्रम, बाल्टी और मटकों से पटे पड़े हैं।
स्वच्छता का छक्का लगाने वाला इंदौर विकास की अंधी दौड़ में अपने 'ग्रीन कवर' (हरियाली) को तकरीबन खो चुका है। शहर का तापमान रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया है। विशेषज्ञों का कहना है कि यह पिछले 20-25 सालों के अनियोजित विकास, अंधाधुंध शहरीकरण और पर्यावरण की बर्बादी का नतीजा है। यह तो सिर्फ एक बानगी है, आने वाला समय इससे भी ज्यादा भयावह और विस्फोटक होगा।
हजारों पेड़ों की बलि ले ली गई : पहले इंदौर क्षैतिज (Horizontal) फैला हुआ था, जहां घरों के आसपास खुले आंगन, बगीचे और ओटले होते थे। पिछले दो दशकों में इंदौर 'वर्टिकल' (Vertical) हुआ है— यानी बहुमंजिला इमारतें, गगनचुंबी मॉल्स और कंक्रीट के टाउनशिप बन गए। अब सीमेंट की सड़कों और सीमेंट के पेवर ब्लॉक्स मिट्टी को पूरी तरह से खा गए। सैकड़ों प्रोजेक्ट के लिए हजारों पेड़ों की बलि ले ली गई, कटाई का काम अभी जारी है। नतीजा सामने है, सुलगती धरती और पानी के संकट के साथ छाह का कहीं एक टुकड़ा नजर नहीं आता। लोग घड़ीभर के खड़े रहने के लिए एक अदद पेड़ ढूंढते हैं, लेकिन कहीं नजर नहीं आता।
10 साल में कैसे बदला तापमान : 10-15 साल पहले तक इंदौर में गर्मियों के दौरान अधिकतम तापमान 39 डिग्री से 41 डिग्री सेल्सियस के बीच रहना सामान्य माना जाता था। लेकिन पिछले दशक में विशेष रूप से 2016 के बाद से, पारा लगातार 44 डिग्री से 45 डिग्री तक छूने लगा है। (जैसे मई 2024 में इंदौर का तापमान 44.5 रिकॉर्ड किया गया, जिसने पिछले कई सालों के रिकॉर्ड तोड़ दिए)। पिछले 10 सालों में यह भी देखा गया है कि इंदौर में कड़ाके की ठंड के दिन कम हो गए हैं। नवंबर और फरवरी के महीने अब उतने ठंडे नहीं रहे जितने पहले हुआ करते थे।
घटती हरियाली, बढ़ता पारा : इंदौर के तापमान के पीछे ग्लोबल वार्मिंग तो एक वैश्विक कारण है ही, लेकिन इंदौर का लोकल क्लाइमेट यहां के अनियोजित कंक्रीट निर्माण के कारण बिगड़ा है। मेट्रो, फ्लाइओवर, ब्रिज, सुपर कोरिडर, बीआरटीएस और दो दो बायपास ने शहर के पर्यावरण की जान ले ली। हालात यह हो गए कि छाह तो दूर अब जिंदगी को बचाए रखने के लिए पानी तक का संकट आ खड़ा हो गया है
ग्रीन कवर में भारी गिरावट : सैटेलाइट डेटा और पर्यावरणविदों की रिपोर्ट्स के अनुसार पिछले दो दशकों में इंदौर के मुख्य शहरी क्षेत्र का ग्रीन कवर लगभग 12% से घटकर 4% से भी कम रह गया है। रिपोर्ट के मुताबिक किसी भी शहर में 33% ग्रीन कवर होना चाहिए।
तापमान का नया रिकॉर्ड : पिछले कुछ सालों में इंदौर का तापमान 44°C से 45°C के पार जाने लगा है, जो पहले कभी कभार ही होता था। रात का न्यूनतम तापमान भी अब 28°C से ऊपर दर्ज किया जा रहा है। सबसे अच्छे कूलर और एसी भी इस तबाही के आगे दम तोड़ चुके हैं।
पेड़ों की अंधाधुंध कटाई : बीआरटीएस (BRTS), सुपर कॉरिडोर, इंदौर मेट्रो प्रोजेक्ट, और फ्लाईओवर्स के निर्माण के लिए पिछले 10 वर्षों में हजारों पुराने और छायादार पेड़ (बरगद, पीपल, नीम) काटे गए हैं। प्रशासन ने इनके बदले नए पौधे लगाने का दावा किया, लेकिन उनका सर्वाइवल रेट (जीवित रहने की दर) बेहद कम रहा। या फिर न के बराबर।
अर्बन हीट आइलैंड' की चपेट में इंदौर : शहरी विकास ने इंदौर में एक नई समस्या को जन्म दिया है, जिसे वैज्ञानिक भाषा में 'अर्बन हीट आइलैंड इफेक्ट' कहते हैं।
क्या होता है अर्बन हीट आइलैंड : जब किसी शहर के रिहायशी या कमर्शियल इलाकों में पेड़-पौधों और मिट्टी को हटाकर कंक्रीट की सड़कें, बहुमंजिला इमारतें और सीमेंट के रोड बना दिए जाते हैं, तो ये सतहें दिनभर सूरज की गर्मी को सोखती हैं और रात में उसे वापस छोड़ती हैं। इससे वह इलाका आसपास के ग्रामीण इलाकों से 3 से 5 डिग्री सेल्सियस तक ज्यादा गर्म हो जाता है।
इंदौर के हॉटस्पॉट्स : इंदौर का राजवाड़ा (सेंट्रल कोतवाली), विजय नगर, भंवरकुआं, और लसूडिया जैसे घने और व्यावसायिक इलाके अब 'हीट आइलैंड' बन चुके हैं। यहां कंक्रीट का घनत्व सबसे ज्यादा है और हरियाली ना के बराबर है।
क्या 'मियावाकी' और 'रिलोकेशन' सिर्फ कागजी दावे हैं?
प्रशासन ने पेड़ों की कटाई के विकल्प के तौर पर दो तरीके अपनाए:
ट्री रिलोकेशन (पेड़ों को दूसरी जगह शिफ्ट करना) : मेट्रो रूट से हटाए गए कई विशाल पेड़ों को सुपर कॉरिडोर या अन्य जगह शिफ्ट किया गया, लेकिन विशेषज्ञों के अनुसार, देखरेख के अभाव में इनमें से 60% से अधिक पेड़ सूख गए।
मियावाकी तकनीक (घने जंगल उगाना) : शहर में कुछ जगहों पर जापानी मियावाकी पद्धति से छोटे जंगल उगाए गए हैं। यह तकनीक ऑक्सीजन देने और प्रदूषण रोकने में तो अच्छी है, लेकिन यह उन विशालकाय पारंपरिक पेड़ों का विकल्प नहीं हो सकती जो बड़े इलाके को छाया देते थे और जमीन के वाटर लेवल को बनाए रखते थे।
पक्के निर्माण से थमा वाटर रिचार्ज : इंदौर के अधिकांश हिस्सों में पेवर ब्लॉक और कंक्रीट की सड़कें बनने से बारिश का पानी जमीन के अंदर नहीं जा पा रहा है। नतीजा यह है कि शहर का भूजल स्तर (Ground Water Level) तेजी से नीचे जा रहा है।
एसी (AC) की बढ़ती संख्या : तापमान बढ़ने से शहर में एयर कंडीशनर (AC) का इस्तेमाल तेजी से बढ़ा है। एसी से निकलने वाली गर्म गैसें बाहरी वातावरण को और ज्यादा गर्म कर रही हैं, जिससे एक 'विशियस साइकिल' (दुष्चक्र) बन गया है।
सूखे बोरिंग की संख्या : इंदौर नगर निगम के कुल 6,500 सरकारी बोरिंग में से 3,538 बोरिंग पूरी तरह से सूख चुके हैं। इसका मतलब है कि शहर के 50% से अधिक (लगभग 54%) सरकारी ट्यूबवेल इस गर्मी में दम तोड़ चुके हैं। यह स्थिति शहर के उन 30% इलाकों के लिए सबसे बड़ी मुसीबत बन गई है, जहां अभी तक नर्मदा जल की पाइपलाइन नहीं पहुंची है और लोग पूरी तरह बोरिंग के पानी पर निर्भर थे।
सबसे खराब स्थिति में इंदौर का भूजल स्तर : केंद्रीय भूजल बोर्ड (CGWB) की ताजा रिपोर्ट के मुताबिक मध्य प्रदेश के सभी 51 जिलों में इंदौर का भूजल स्तर सबसे खराब स्थिति में पहुंच गया है। शहर का लगभग 73% इलाका 'अति-दोहित' (Over-Exploited) घोषित किया जा चुका है। जो पानी पहले महज 60 से 100 फीट की गहराई पर मिल जाता था, आज शहर के कई इलाकों (जैसे विजय नगर, भंवरकुआं) में 600 से 1000 फीट नीचे तक बोरिंग करने पर भी पानी नहीं मिल रहा है।
अनियंत्रित और अवैध बोरिंग की होड़ : इंदौर में पानी की मांग और सप्लाई के बीच बड़ा अंतर है। नर्मदा प्रोजेक्ट के बावजूद शहर की एक बड़ी आबादी पानी के लिए निजी ट्यूबवेल पर निर्भर है। प्रशासन की पाबंदियों के बाद भी शहर में रोजाना चोरी-छिपे कई नए बोरिंग खोदे जा रहे हैं। जब एक ही सीमित दायरे में सैकड़ों गहरे बोरिंग हो जाते हैं, तो जमीन के अंदर का जल भंडार (Aquifer) खाली हो जाता है। बता दें कि इंदौर ने देश को सिखाया है कि कचरा कैसे साफ किया जाता है। अब समय आ गया है कि इंदौर देश को यह भी सिखाए कि कंक्रीट के विकास के बीच अपनी हरियाली और 'शब-ए-मालवा' को कैसे जिंदा रखा जाता है। वरना, स्वच्छता का यह सिरमौर शहर भविष्य में भीषण गर्मी और कंक्रीट के मलबे में हांफता और रेंगता नजर आएगा।
फॉरेस्ट एलिमेंट वाले पेड़
खत्म हो गए :
होल्कर साइंस कॉलेज में
पर्यावरण के प्रोफेसर डॉ संजय व्यास ने बताया कि 20 साल से हम इंदौर के साथ जो गड़बड़ कर रहे है ये उसी का नतीजा है। पेवर्स लगा रहे हैं, पेड़ काट दिए। पहले राला मंडल की ग्रीनरी हीट को रोक देती थी। अब वो भी कम हो गई। पहले पेडों कॉम्बीनेशन अच्छा था। अब हमने
फॉरेस्ट एलिमेंट वाले पेड़ यानी जो घने पेड़ होते हैं उसकी जगह हमने ओरनामेंटल प्लांट लगा दिए। पीपल, नीम, बरगद कहीं नजर नहीं आते। पानी को सहेज कर रखने वाले प्लांट खत्म हो गए हैं। ऐसे में तापमान और पानी का संकट तो आना ही था। इससे बचने के लिए हमें फॉरेस्ट एलिमेंट, वॉटर हार्वेस्टिंग और प्लांटेशन को सहेजना होगा।
रिर्चार्जिंग कम और कंस्ट्रक्शन ज्यादा : स्कूल ऑफ एनर्जी एंड एन्वॉयमेंटल स्टडीज में प्रोफेसर डॉ रूबीना चौधरी ने बताया कि हीट वेव बढ़ने के बाद से हमारी मिट्टी में मॉइस्चराइज नहीं बचा। अर्बनाइजेशन में हमने मिट्टी की जगह सारी खत्म कर के कंक्रीट बना दिया है। वॉटर रिर्चार्जिंग नहीं है, लेकिन सीमेंटेड डेवलेपमेंट ज्यादा हो रहा है। कंस्ट्रक्शन पार्ट बहुत हो गया है, ऐसे में ये स्ट्रक्चर हमारे क्लाइमेट को गर्म कर रहा है। हर घर में वॉटर रिचार्जिंग अनिवार्य होना चाहिए। पेड़ पौधे अभी लगाना होगा, तब कहीं आने वाले समय में यह फायदा पहुंचाएगा। अभी यह एक अलार्मिंग सिचुएशन है, इसके बारे में हमें सोचना होगा।
बदतर और विस्फोटक हो जाएंगे हालात : पर्यावरणविद डॉ डीके वाघेला ने बताया कि इंदौर में तालाबों और भूमिगत जल स्तर में लगातार गिरावट शहरीकरण, अनियोजित व अनियंत्रित निर्माण और जल स्रोतों पर अतिक्रमण का परिणाम है। सत् प्रयासों के बाद भी वर्षा जल का पर्याप्त संचयन नहीं होने, कंक्रीटकरण बढ़ने तथा तालाबों के प्राकृतिक कैचमेंट क्षेत्र नष्ट होने से भूजल पुनर्भरण प्रभावित हुआ है। अत्यधिक बोरवेल खनन और जनसंख्या वृद्धि ने स्थिति को और भी गंभीर बना दिया है। कई तालाब, गंदे नालों और कचरे के कारण जमा हुई गाद के कारण अपनी जलधारण क्षमता खो रहे हैं। इस समस्या के निवारण के लिए तालाबों का वैज्ञानिक पुनर्जीवन, कैचमेंट क्षेत्रों की सुरक्षा और हर स्तर पर वर्षा जल संचयन को अनिवार्य बनाना आवश्यक है। हर कॉलोनी व संस्थान में जगह-जगह पर रेन वाटर हार्वेस्टिंग प्रणाली प्रभावी रूप से लागू की जाए। भूजल दोहन पर नियंत्रण तथा जल संरक्षण के प्रति जनजागरूकता बढ़ाना भी जरूरी है। प्राचीन व्यवस्था की तरह कान्ह व सरस्वती नदियों में जगह जगह पानी रोकना होगा। यदि प्रशासन, उद्योग और प्रत्येक नागरिक मिलकर जल प्रबंधन की दीर्घकालिक योजना अपनाएं, तो इंदौर का जल स्तर पुन: सुधर सकता है। शहर में जारी सभी निर्माण कार्य तत्काल प्रभाव से आगामी एक माह के लिए स्थगित किए जाना चाहिए, क्योंकि अत्यधिक भूजल दोहन के कारण अधिकांश बोरवेल सूख चुके हैं। यदि यही स्थिति रही तो हालात बद से बदतर और विस्फोटक हो सकते हैं।
ये है इंदौर में पड़ों की कटाई की हकीकत
इंदौर में हरियाली का प्रतिशत : देश के स्वच्छतम शहर इंदौर में केवल 9-10% हरियाली बची है। वर्ष 2023 के प्रारम्भ में ग्रीन सिटी इंडेक्स भी 09 बताया बताया गया है। हरियाली में दीर्घजीवी होने से पेड़ों का अलग महत्व है। शहरी क्षेत्र में इनकी संख्या लगभग 10 लाख रह गई है। जिनमें पर्यावरण संतुलन बनाए रखने वाले पुराने पेड़ डेढ़ से 2 लाख हैं। इस स्थिति में भी पेड़ों की वैध-अवैध कटाई जारी है। पेड़ों की छंटाई व स्थानांतरण की अनुमति लेकर भी लगभग 10,000 पेड़ विगत वर्षों में समाप्त होने की सूचना है। मध्य क्षेत्र में पेड़ों की कटाई मुख्य रूप से मेट्रो प्रोजेक्ट और स्मार्ट सिटी परियोजनाओं से जुड़ी रही है। इसके अलावा विकास कार्यों, फ्लाई ओवर, सड़क चौड़ीकरण और हाईवे निर्माण के कारण भी विगत 5 साल में ढाई लाख से ज्यादा पेड़ कटे हैं।
मेट्रो प्रोजेक्ट : जून 2025 में रीगल चौराहे/रानीसराय से एयरपोर्ट के बीच भूमिगत लाइन हेतु 1,240 पेड़ों को हटाने की अनुमति इंदौर नगर निगम ने दी थी, जिसमें से 228 पेड़ काटे जाने थे और 1,012 का ट्रांसप्लांटेशन प्रस्तावित था। एमजी रोड पर नगर निगम कार्यालय व बड़ा गणपति के मध्य लगभग 200 पेड़ काटे जा चुके हैं।
रानीसराय : रानीसराय के 225 पेड़ों पर हजारों तोतों का आवास होने से यहां माननीय मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय, खंडपीठ, इंदौर ने कटाई पर आगामी आदेश तक अंतरिम रोक लगा दी है। इसके पूर्व मेट्रो के लिए सुपर कॉरिडोर एवं एमआर 10 पर भी 1000 से अधिक पेड़ काटे गए हैं।
अन्य प्रोजेक्ट : स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट के लिए लगभग 2000 पेड़ काटे गए थे। फ्लाई ओवर निर्माण (भंवरकुआं, खजराना, फूटी कोठी, मूसाखेड़ी, सत्य साईं चौराहा) में करीब 1300 पेड़ काटे गए। बीआरटीएस निर्माण के समय भी करीब 3000 पेड़ काटे गए थे।
प्रस्तावित प्रोजेक्ट : हुकुमचंद मिल- 3000+, नवीन रेलवे स्टेशन व एमवाय-157, मास्टर प्लान की 15 सड़कें- 1200, एमओजी लाइन- 2000, बायपास व रिंग रोड - 5176 पेड़।
शहर के आसपास के प्रोजेक्ट : इंदौर-उज्जैन सिक्स लेन रोड: 3,472+ पेड़, महू-सनावद रेल लाइन का गेज परिवर्तन- 1.34 लाख पेड़, इंदौर-खंडवा हाईवे- 1.25 लाख पेड़।
वन सर्वेक्षण की रिपोर्ट : भारतीय वन सर्वेक्षण की रिपोर्ट के अनुसार के इंदौर जिले में 2021 की तुलना में 2023 में 13 वर्ग किलोमीटर वन क्षेत्र घटा है।
कई चेतावनी के बाद भी नहीं सुनवाई : पिछले दो वर्षों में हरियाली बचाने के लिए शहरवासियों ने विभिन्न स्थानों पर रैलियां, मानव श्रृंखला, हस्ताक्षर अभियान आदि के माध्यम से विरोध प्रदर्शन भी हो रहे हैं। रानीसराय क्षेत्र में एक माह तक अनवरत धरना भी दिया गया है। 26 नवंबर 2025 को माननीय मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय, जबलपुर ने पूरे राज्य में पेड़ों की कटाई, छंटाई और ट्रांसप्लांटेशन पर आगामी आदेश तक प्रतिबंध लगा दिया है। यह आदेश अवैध कटाई की शिकायतों के बाद जारी किया गया। इंदौर में वृक्ष अधिकारी की नियुक्ति का मामला भी न्यायालय में चल रहा है। उसके बाद भी पेड़ों की अवैध कटाई जारी है
तीन चरण फिर भी प्याया इंदौर : बता दें कि इंदौर में पानी के लिए अब तक नर्मदा के तीन चरण आ चुके हैं। लेकिन बावजूद इसके साल 2026 में भी इंदौर प्यासा है। जानते हैं कब कब इंदौर को कितना एमएलडी पानी नर्मदा के तीनों चरण से मिला।
तब से अब तक क्या क्या हुआ?
पहला चरण : पहला चरण वर्ष 1978 में शुरू हुआ, जिसमें 90 एमएलडी (मिलियन लीटर प्रतिदिन) पानी इंदौर लाया गया।
दूसरा चरण : दूसरा चरण वर्ष 1990 में शुरू हुआ और इसमें भी 90 एमएलडी पानी जोड़ा गया।
तीसरा चरण : बढ़ती आबादी को देखते हुए तीसरे चरण की जरूरत महसूस हुई। वर्ष 2014 में शुरू हुए तीसरे चरण के तहत 360 एमएलडी पानी शहर को मिलने लगा।
75 लाख आबादी के हिसाब से होगा प्लान : चरण लगभग 25 लाख आबादी की जरूरतों को ध्यान में रखकर तैयार किया गया था, लेकिन बाद में 29 गांव नगर निगम सीमा में शामिल कर लिए गए। वहां भी नर्मदा लाइन बिछाने की जिम्मेदारी निगम पर आ गई। अब शहर की आबादी 35 लाख से अधिक हो चुकी है। इसी को देखते हुए नगर निगम अब चौथे चरण की योजना लगभग 75 लाख आबादी की जरूरतों के अनुसार बना रहा है। इस परियोजना पर लगभग 2200 करोड़ रुपए खर्च किए जाएंगे।