बाढ़ की त्रासदी के बाद अब पंजाब में भयावह बीमारियों का खतरा, त्वचा और मानसिक रोग का बढ़ा ग्राफ
राज्य में अब पोस्ट ट्रॉमेटिक डिसऑर्डर के केसेस बढ़ेंगें, क्या है डॉक्टरों की सलाह
(कार्तिका सिंह, पंजाब-चंडीगढ़ से)
पंजाब में पहले बाढ़ की त्रासदी ने लोगों को अपना शिकार बनाया तो अब बाढ़ के बाद के खतरों से लोग दहशत में हैं। पंजाब में पानी का स्तर अब कुछ कम हुआ तो अब यहां तमाम बीमारियों का संकट सिर पर मंडराने लगा है। इन बीमारियों में त्वचा जैसे रोग हैं तो वहीं मानसिक बीमारियों का खतरा भी बढा है। एक तरफ लोग लगातार बारिश के बाद त्वचा संबंधी रोगों से ग्रस्त हो रहे हैं तो वहीं इस भयावह त्रासदी को अपनी आंखों से देखने और झेलने के बाद कई तरह के मानसिक रोग भी हो रहे हैं।
दरअसल, ये बाढ़ अपने साथ अनगिनत परेशानियां लेकर आई है। जान-माल का नुकसान, पशुओं की मौत, फसलों की बर्बादी घरों में पानी भरने से उनकी क्षति, छतों का टपकना, दीवारों का कमज़ोर हो कर जर्जर हो जाना और अब उस पर कई तरह की बीमारियों का खतरा। जानते हैं बाढ़ के बाद कैसा है पंजाब का स्वास्थ्य।
ट्रॉमेटिक स्ट्रेस डिसऑर्डर का खतरा : डॉ राजीव सहगल (साइकोलोजिस्ट) ने बताया कि बाढ़ की परिस्थिति में मानसिक तनाव भी एक गंभीर मुद्दा होता है, जिस पर अक्सर ध्यान नहीं दिया जाता। बाढ़ की आशंका भर से वे लोग जो बाढ़-प्रवण क्षेत्रों में रहते हैं, गहरे तनाव में आ जाते हैं। उन्हें फसलों, पशुओं और अपने जीवन के नुकसान की चिंता सताने लगती है। कुछ लोग अपनी सुरक्षा का इंतज़ाम कर पाते हैं, लेकिन आर्थिक रूप से कमजोर परिवार कुछ भी व्यवस्था नहीं कर पाते। जिनके पास दो या तीन मंज़िला मकान होते हैं, वे छतों पर चले जाते हैं, लेकिन गांवों में ज़्यादातर घर एक मंज़िला होते हैं और उनकी छतें भी अक्सर कमजोर होती हैं। ऐसे हालात में गरीब और ग्रामीण परिवारों के सामने बहुत बड़ी कठिनाइयां खड़ी हो जाती हैं। बच्चों की सुरक्षा को लेकर हर परिवार चिंतित रहता है, और यह चिंता लंबे समय तक असर डालती है।
क्या है PTSD डिसऑर्डर : इन में आमतौर पर होता है PTSD यानी पोस्ट ट्रॉमेटिक स्ट्रेस डिसऑर्डर एक मानसिक स्वास्थ्य समस्या है, जो तब होती है जब कोई व्यक्ति बहुत डरावनी, दर्दनाक या जानलेवा स्थिति से गुजरता है या उसका गवाह बनता है। यह स्थिति प्राकृतिक आपदाओं (जैसे बाढ़, भूकंप), सड़क हादसों, युद्ध, हिंसा, यौन शोषण या किसी गंभीर दुर्घटना के बाद हो सकती है। सरल शब्दों में कहें तो PTSD एक ऐसा मानसिक आघात है, जो किसी गहरी चोट पहुंचाने वाली घटना के बाद लंबे समय तक इंसान के मन और व्यवहार पर असर डालता है। बाढ़ जैसी प्राकृतिक आपदाओं के बाद कई लोग पोस्ट ट्रॉमेटिक स्ट्रेस डिसऑर्डर (PTSD) का शिकार हो जाते हैं। अचानक जान-माल का नुकसान, घर उजड़ जाना, प्रियजनों की मौत या कई दिनों तक डर और असुरक्षा में जीना– ये सब दिमाग पर गहरा असर डालते हैं। PTSD से पीड़ित लोग बार-बार बाढ़ के दृश्य याद करते हैं, डरावने सपने देखते हैं, थोड़ी सी बारिश या पानी देखकर भी घबरा जाते हैं और लगातार तनाव या बेचैनी में रहते हैं। बच्चों और बुज़ुर्गों में यह स्थिति और गंभीर हो सकती है। उन्होंने कहा कि पंजाब के लोगों का होंसला और मनोबल बहुत ऊंचा है। पर अगर किसी भी चिंता की वजह से मनोबल डोलता है, तो समय रहते काउंसलिंग, मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ की मदद और परिवार व समाज का सहयोग उन्हें इस आघात से बाहर आने में बहुत सहारा देता है। बहुत से पारिवारिक सदस्य बिछड़ जाते हैं। बहुत से पालतू जानवर भी बिछड़ जाते हैं।
चिंता, तनाव, नींद की समस्या : इसमें व्यक्ति बार-बार उस घटना की यादों से परेशान होता है, बुरे सपने आते हैं, हल्की सी आवाज़ या स्थिति पर भी घबरा जाता है, और घटना से जुड़े स्थानों या चीज़ों से बचने लगता है। लगातार चिंता, तनाव, नींद की समस्या और चिड़चिड़ापन भी इसके लक्षण हो सकते हैं। कल्पना भी इसी तरह की आशंकाओं से भरी होने लगती हैं।
क्या सावधानी रखें : इसलिए यह जरूरी है कि जितना संभव हो अपना ध्यान रखें। सरकार से ऐसी स्थिति में आवश्यक स्वास्थ्य सुविधाओं मुहैय्या कराये। इसके लिए कंट्रोल रूम के नंबर दिए गए हैं। उन पर संपर्क करें, नज़दीकी डिस्पेंसरी, प्राइमरी हेल्थ सेंटर या सिविल अस्पताल से जुड़ें और सरकारी स्वास्थ्य केंद्रों से मदद लें।
कैसे बचें त्वचा रोगों से : डॉ. अपूर्वा शर्मा (त्वचा रोग विशेषज्ञ, पीजीआई, चंडीगढ़) ने बताया कि हाथों को ग्लव्स और पैरों को गम-बूट्स पहन कर रखें। एक बार गीले होने के बाद जल्द से जल्द सूखे कपडे पहन लें। बाढ़ के पानी में गीले होने के बाद कपड़ों में फंगस जमा होने के खतरे ज़्यादा होते है। इसलिए इन कपड़ों को उबलते गरम पानी में धोने के बाद अच्छे से धुप में सूखने के बाद ही इस्तेमाल करें। बहुत लम्बे समय तक पानी वाली जगह पर न रहें। जितना हो सके, सूखी जगह पर रहने का प्रयास करें। पैरों में ज़्यादा समय तक पानी में रहने की वजह से उंगलियों में कैंडिडा यीस्ट नामक फंगल इन्फेक्शन बहुत ही आम है, उसमें आप की उंगलियों के बीच की स्किन गलने लगती है। उस से बचाव के लिए, ड्राई एरिया में आने के बाद एक ओपन फुटवियर पहन लीजिये ताकि, जो पैरों की उंगलियों के बीच में से हवा पास हो सके, इस से इन्फेक्शन आगे नहीं पनपेगा। इसके साथ रिंगवर्म (दाद) भी इस तरह के हालातों में तेज़ी से फैलते हैं। इस से बचाव के लिए सरसों के तेल या नारियल तेल का उपयोग कर सकते हैं, लेकिन फंगल इन्फेक्शन का इलाज दवा से करना बेहद ज़रूरी है। उसके इलावा बैक्टेरियल इन्फेक्शन, टांगों के बालों में पस्स का बनना, इस से बचने के लिए भी, एक्सपोज्ड एरिया, जैसे कि हाथों, बांहों, पैरों, टांगों पर इन्सेक्ट बाईट होने पर, या डफर जैसे निशान दिखने पर तो आपको इन्सेक्ट बाईट हाइपरसेंसिटिविटी नामक इन्फेक्शन हो सकती है, तो तुरंत किसी डॉक्टर या डर्मेटोलॉजिस्ट से कंसल्ट करें।
क्या है ईएनटी विशेषज्ञों की सलाह : डॉक्टर की अनुपस्थिति में आप इन्फेक्टेड एरिया पर सरसों के तेल या नारियल तेल का इस्तेमाल कर सकते हैं। डॉ. अरुण मित्रा (ईएनटी विशेषज्ञ, को-प्रेजिडेंट, आईडीपीडी), बताते हैं जब चारों ओर पानी जमा रहता है तो उसमें सांप, बिच्छू और अन्य ज़हरीले जीव भी घूमते रहते हैं, जिनका खतरा बना रहता है। इनसे बचाव करना बेहद जरूरी है। यदि संभव हो तो घर में किसी सूखी जगह पर डंडा रखें, ताकि अगर कोई सांप अंदर आ जाए तो उससे बचाव किया जा सके। पीने के लिए साफ पानी न मिलना बाढ़ में सबसे बड़ी समस्या है। सरकारी आपूर्ति होने के बावजूद यह खतरा रहता है कि गंदा पानी टूटी-फूटी पाइपों से सप्लाई वाले पानी में मिल जाए। इसके कारण दस्त, पेचिश, हैजा, पीलिया और लीवर में पस जैसी गंभीर बीमारियां हो सकती हैं। इसलिए पानी पीने से पहले क्लोरीन की गोलियां– जिन्हें सरकार से मांगा जा सकता है– उसमें डालें। दो-तीन गोलियां डालने के बाद थोड़ी देर में पानी के कीटाणु मर जाते हैं और क्लोरीन की गंध भी समाप्त हो जाती है। दस्त या पेचिश की स्थिति में नमक-चीनी का घोल (ORS) अधिक से अधिक पिएं। अगर बुखार हो तो तेज बुखार की स्थिति में बार-बार स्नान करें। जितनी देर तक पानी जमा रहता है, उतनी ही तेजी से उसमें मच्छर और मक्खियां पनपती हैं। मक्खियां गंदगी पर बैठकर यदि आपकी रोटी पर बैठ जाएं तो पेट की बीमारियां जैसे पेचिश, हैजा हो सकती हैं। मच्छरों के कारण मलेरिया तुरंत फैल सकता है। वहीं, साफ पानी में जमा होने पर डेंगू और चिकनगुनिया के मच्छर पनपते हैं और उनके काटने से डेंगू बुखार या चिकनगुनिया हो सकता है। यदि गंदा पानी नाक, मुंह या गले में चला जाए तो संक्रमण हो सकता है, खांसी और बलगम बन सकती है। तेज बुखार होने पर बार-बार स्नान करें और खांसी की स्थिति में मुंह को ढककर रखें ताकि संक्रमण दूसरों तक न फैले। गंदे पानी के आंखों में जाने से आंखों की सूजन हो जाती है, आंखें पक जाती हैं, दर्द करने लगती हैं और तेज रोशनी में जाना कठिन हो जाता है।
Edited By: Navin Rangiyal
पंजाब में पहले बाढ़ की त्रासदी ने लोगों को अपना शिकार बनाया तो अब बाढ़ के बाद के खतरों से लोग दहशत में हैं। पंजाब में पानी का स्तर अब कुछ कम हुआ तो अब यहां तमाम बीमारियों का संकट सिर पर मंडराने लगा है। इन बीमारियों में त्वचा जैसे रोग हैं तो वहीं मानसिक बीमारियों का खतरा भी बढा है। एक तरफ लोग लगातार बारिश के बाद त्वचा संबंधी रोगों से ग्रस्त हो रहे हैं तो वहीं इस भयावह त्रासदी को अपनी आंखों से देखने और झेलने के बाद कई तरह के मानसिक रोग भी हो रहे हैं।
दरअसल, ये बाढ़ अपने साथ अनगिनत परेशानियां लेकर आई है। जान-माल का नुकसान, पशुओं की मौत, फसलों की बर्बादी घरों में पानी भरने से उनकी क्षति, छतों का टपकना, दीवारों का कमज़ोर हो कर जर्जर हो जाना और अब उस पर कई तरह की बीमारियों का खतरा। जानते हैं बाढ़ के बाद कैसा है पंजाब का स्वास्थ्य।
ट्रॉमेटिक स्ट्रेस डिसऑर्डर का खतरा : डॉ राजीव सहगल (साइकोलोजिस्ट) ने बताया कि बाढ़ की परिस्थिति में मानसिक तनाव भी एक गंभीर मुद्दा होता है, जिस पर अक्सर ध्यान नहीं दिया जाता। बाढ़ की आशंका भर से वे लोग जो बाढ़-प्रवण क्षेत्रों में रहते हैं, गहरे तनाव में आ जाते हैं। उन्हें फसलों, पशुओं और अपने जीवन के नुकसान की चिंता सताने लगती है। कुछ लोग अपनी सुरक्षा का इंतज़ाम कर पाते हैं, लेकिन आर्थिक रूप से कमजोर परिवार कुछ भी व्यवस्था नहीं कर पाते। जिनके पास दो या तीन मंज़िला मकान होते हैं, वे छतों पर चले जाते हैं, लेकिन गांवों में ज़्यादातर घर एक मंज़िला होते हैं और उनकी छतें भी अक्सर कमजोर होती हैं। ऐसे हालात में गरीब और ग्रामीण परिवारों के सामने बहुत बड़ी कठिनाइयां खड़ी हो जाती हैं। बच्चों की सुरक्षा को लेकर हर परिवार चिंतित रहता है, और यह चिंता लंबे समय तक असर डालती है।
क्या है PTSD डिसऑर्डर : इन में आमतौर पर होता है PTSD यानी पोस्ट ट्रॉमेटिक स्ट्रेस डिसऑर्डर एक मानसिक स्वास्थ्य समस्या है, जो तब होती है जब कोई व्यक्ति बहुत डरावनी, दर्दनाक या जानलेवा स्थिति से गुजरता है या उसका गवाह बनता है। यह स्थिति प्राकृतिक आपदाओं (जैसे बाढ़, भूकंप), सड़क हादसों, युद्ध, हिंसा, यौन शोषण या किसी गंभीर दुर्घटना के बाद हो सकती है। सरल शब्दों में कहें तो PTSD एक ऐसा मानसिक आघात है, जो किसी गहरी चोट पहुंचाने वाली घटना के बाद लंबे समय तक इंसान के मन और व्यवहार पर असर डालता है। बाढ़ जैसी प्राकृतिक आपदाओं के बाद कई लोग पोस्ट ट्रॉमेटिक स्ट्रेस डिसऑर्डर (PTSD) का शिकार हो जाते हैं। अचानक जान-माल का नुकसान, घर उजड़ जाना, प्रियजनों की मौत या कई दिनों तक डर और असुरक्षा में जीना– ये सब दिमाग पर गहरा असर डालते हैं। PTSD से पीड़ित लोग बार-बार बाढ़ के दृश्य याद करते हैं, डरावने सपने देखते हैं, थोड़ी सी बारिश या पानी देखकर भी घबरा जाते हैं और लगातार तनाव या बेचैनी में रहते हैं। बच्चों और बुज़ुर्गों में यह स्थिति और गंभीर हो सकती है। उन्होंने कहा कि पंजाब के लोगों का होंसला और मनोबल बहुत ऊंचा है। पर अगर किसी भी चिंता की वजह से मनोबल डोलता है, तो समय रहते काउंसलिंग, मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ की मदद और परिवार व समाज का सहयोग उन्हें इस आघात से बाहर आने में बहुत सहारा देता है। बहुत से पारिवारिक सदस्य बिछड़ जाते हैं। बहुत से पालतू जानवर भी बिछड़ जाते हैं।
चिंता, तनाव, नींद की समस्या : इसमें व्यक्ति बार-बार उस घटना की यादों से परेशान होता है, बुरे सपने आते हैं, हल्की सी आवाज़ या स्थिति पर भी घबरा जाता है, और घटना से जुड़े स्थानों या चीज़ों से बचने लगता है। लगातार चिंता, तनाव, नींद की समस्या और चिड़चिड़ापन भी इसके लक्षण हो सकते हैं। कल्पना भी इसी तरह की आशंकाओं से भरी होने लगती हैं।
क्या है ईएनटी विशेषज्ञों की सलाह : डॉक्टर की अनुपस्थिति में आप इन्फेक्टेड एरिया पर सरसों के तेल या नारियल तेल का इस्तेमाल कर सकते हैं। डॉ. अरुण मित्रा (ईएनटी विशेषज्ञ, को-प्रेजिडेंट, आईडीपीडी), बताते हैं जब चारों ओर पानी जमा रहता है तो उसमें सांप, बिच्छू और अन्य ज़हरीले जीव भी घूमते रहते हैं, जिनका खतरा बना रहता है। इनसे बचाव करना बेहद जरूरी है। यदि संभव हो तो घर में किसी सूखी जगह पर डंडा रखें, ताकि अगर कोई सांप अंदर आ जाए तो उससे बचाव किया जा सके। पीने के लिए साफ पानी न मिलना बाढ़ में सबसे बड़ी समस्या है। सरकारी आपूर्ति होने के बावजूद यह खतरा रहता है कि गंदा पानी टूटी-फूटी पाइपों से सप्लाई वाले पानी में मिल जाए। इसके कारण दस्त, पेचिश, हैजा, पीलिया और लीवर में पस जैसी गंभीर बीमारियां हो सकती हैं। इसलिए पानी पीने से पहले क्लोरीन की गोलियां– जिन्हें सरकार से मांगा जा सकता है– उसमें डालें। दो-तीन गोलियां डालने के बाद थोड़ी देर में पानी के कीटाणु मर जाते हैं और क्लोरीन की गंध भी समाप्त हो जाती है। दस्त या पेचिश की स्थिति में नमक-चीनी का घोल (ORS) अधिक से अधिक पिएं। अगर बुखार हो तो तेज बुखार की स्थिति में बार-बार स्नान करें। जितनी देर तक पानी जमा रहता है, उतनी ही तेजी से उसमें मच्छर और मक्खियां पनपती हैं। मक्खियां गंदगी पर बैठकर यदि आपकी रोटी पर बैठ जाएं तो पेट की बीमारियां जैसे पेचिश, हैजा हो सकती हैं। मच्छरों के कारण मलेरिया तुरंत फैल सकता है। वहीं, साफ पानी में जमा होने पर डेंगू और चिकनगुनिया के मच्छर पनपते हैं और उनके काटने से डेंगू बुखार या चिकनगुनिया हो सकता है। यदि गंदा पानी नाक, मुंह या गले में चला जाए तो संक्रमण हो सकता है, खांसी और बलगम बन सकती है। तेज बुखार होने पर बार-बार स्नान करें और खांसी की स्थिति में मुंह को ढककर रखें ताकि संक्रमण दूसरों तक न फैले। गंदे पानी के आंखों में जाने से आंखों की सूजन हो जाती है, आंखें पक जाती हैं, दर्द करने लगती हैं और तेज रोशनी में जाना कठिन हो जाता है।
Edited By: Navin Rangiyal

