Infant Mortality Rate UP: इन्फेंट मोर्टलिटी रेट यानी शिशु मृत्यु दर। स्वास्थ्य क्षेत्र का यह शब्द सुनने में भले तकनीकी लगे, लेकिन इसका वास्तविक अर्थ बेहद भावनात्मक और संवेदनशील है। जन्म लेने वाले प्रति हजार बच्चों में कितने नवजात 28 दिन के भीतर दम तोड़ देते हैं, यही इसका पैमाना है। लेकिन सच यह है कि यह सिर्फ आंकड़ा नहीं होता। यह उन मां-बाप के सपनों की असमय मौत भी होती है, जिन्होंने अपने बच्चे के साथ भविष्य के हजारों सपने देखे होते हैं।
यही वजह है कि किसी भी देश की स्वास्थ्य व्यवस्था को मापने के लिए शिशु मृत्यु दर को सबसे संवेदनशील मानक माना जाता है। चुनौती इसलिए और बड़ी हो जाती है क्योंकि जन्म के पहले साल में मरने वाले बच्चों में करीब 70 प्रतिशत नवजात 28 दिन के भीतर ही दुनिया छोड़ देते हैं। ग्रामीण और पिछड़े इलाकों में यह स्थिति और अधिक गंभीर होती है।
मार्च 2017 में मुख्यमंत्री बनने के बाद योगी आदित्यनाथ ने स्वास्थ्य क्षेत्र को अपनी प्राथमिकताओं में शामिल किया। केंद्र सरकार की योजनाओं के प्रभावी क्रियान्वयन, स्वास्थ्य ढांचे के विस्तार और तकनीकी हस्तक्षेप के कारण उत्तर प्रदेश में शिशु मृत्यु दर में उल्लेखनीय कमी दर्ज की गई है।
इस बेहद संवेदनशील मुद्दे पर केंद्र और प्रदेश सरकार की साझा प्रतिबद्धता, तकनीकी नवाचार और स्वास्थ्य सेवाओं के विस्तार के जरिए लगातार प्रयास हो रहे हैं कि शिशु मृत्यु दर को न्यूनतम स्तर तक लाया जा सके। आंकड़े बताते हैं कि सरकार ने इस दिशा में महत्वपूर्ण काम किया है और भविष्य में और बेहतर परिणामों की उम्मीद भी जगाई है।
क्या कहते हैं आंकड़े
भारत अगर विकसित राष्ट्र बनने का सपना देख रहा है तो उसकी पहली शर्त स्वस्थ भारत है। लेकिन जिस देश में हर वर्ष हजारों नवजात जन्म के कुछ दिनों या महीनों के भीतर दम तोड़ देते हों, वहां विकास की गति स्वतः प्रभावित होती है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी लगातार “सशक्त और समर्थ भारत” की बात करते हैं। यह सपना तभी साकार होगा जब देश के हर नागरिक, विशेषकर माताओं और नवजातों को “गोल्डन टाइम” के भीतर गुणवत्तापूर्ण इलाज मिल सके।
राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण और सैंपल रजिस्ट्रेशन सिस्टम के आंकड़ों के मुताबिक पिछले एक दशक में भारत ने शिशु मृत्यु दर कम करने में उल्लेखनीय प्रगति की है। उत्तर प्रदेश, जो कभी देश में सर्वाधिक शिशु मृत्यु दर वाले राज्यों में गिना जाता था, अब तेजी से सुधार की दिशा में आगे बढ़ रहा है।
एक समय प्रदेश में प्रति हजार जीवित जन्म पर 60 से अधिक बच्चों की मौत दर्ज होती थी। अब यह आंकड़ा घटकर लगभग 38 के आसपास पहुंच चुका है। राष्ट्रीय औसत अभी करीब 25 है। इतनी बड़ी आबादी वाले राज्य में कुछ अंकों की गिरावट भी हजारों बच्चों की जिंदगी बचाने के बराबर मानी जाती है। हालांकि चुनौतियां अब भी कम नहीं हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में जागरूकता की कमी, कुपोषण, एनीमिया, समय पर इलाज न मिलना और स्वास्थ्य सुविधाओं की सीमित पहुंच अभी भी बड़ी बाधाएं हैं।
केंद्र और प्रदेश की योजनाओं के प्रभावी क्रियान्वयन से बदली तस्वीर
विशेषज्ञ मानते हैं कि उत्तर प्रदेश में सुधार के पीछे केंद्र और राज्य सरकार की योजनाओं का प्रभावी क्रियान्वयन बड़ी वजह है। प्रधानमंत्री सुरक्षित मातृत्व अभियान, जननी सुरक्षा योजना, आयुष्मान भारत, मिशन इंद्रधनुष और पोषण अभियान जैसी योजनाओं ने मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य को नई दिशा दी है।
प्रदेश सरकार ने जिला अस्पतालों, मेडिकल कॉलेजों और सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों को मजबूत करने पर विशेष जोर दिया। नवजात शिशु गहन चिकित्सा इकाइयों, न्यूबॉर्न स्टेबलाइजेशन यूनिट और मातृ-शिशु स्वास्थ्य विंग की संख्या बढ़ाई गई। गांव स्तर तक आशा और एएनएम कार्यकर्ताओं के जरिए गर्भवती महिलाओं और नवजातों की निगरानी व्यवस्था को भी मजबूत किया गया।
सबसे महत्वपूर्ण पहल “गोल्डन ऑवर” को लेकर हुई। जन्म के बाद शुरुआती एक घंटे और बीमारी की स्थिति में शुरुआती कुछ घंटों को नवजात के लिए सबसे महत्वपूर्ण माना जाता है। विशेषज्ञों के अनुसार समय पर ऑक्सीजन, संक्रमण नियंत्रण, टीकाकरण और पोषण उपलब्ध हो जाए तो नवजात मौतों के बड़े हिस्से को रोका जा सकता है।
इसी सोच के तहत प्रदेश में 102 और 108 एम्बुलेंस सेवाओं का तेजी से विस्तार किया गया। कई जिलों में माताओं और नवजातों के लिए विशेष रेफरल ट्रांसपोर्ट सिस्टम विकसित किए गए ताकि गंभीर स्थिति में मरीज को जल्द बड़े अस्पताल तक पहुंचाया जा सके।
तकनीक और डिजिटल हेल्थ बनेगी नई ताकत
विशेषज्ञ मानते हैं कि आने वाले समय में डिजिटल हेल्थ टेक्नोलॉजी शिशु मृत्यु दर कम करने में बड़ी भूमिका निभा सकती है। टेलीमेडिसिन, मोबाइल हेल्थ यूनिट और कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित मॉनिटरिंग सिस्टम के जरिए दूरदराज क्षेत्रों तक विशेषज्ञ सलाह पहुंचाई जा सकती है। यदि हर जिले में अत्याधुनिक मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य केंद्र विकसित किए जाएं और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों को वास्तविक अर्थों में “पहला इलाज केंद्र” बनाया जाए तो शिशु मृत्यु दर में और तेजी से कमी लाई जा सकती है। उत्तर प्रदेश सरकार इस क्षेत्र में बेहतर करने का लगातार प्रयास कर रही है।
शिशु की मौत सिर्फ आंकड़ा नहीं, बेहद भावनात्मक मामला
दरअसल, शिशु मृत्यु दर केवल स्वास्थ्य का आंकड़ा नहीं है। यह किसी भी समाज की संवेदनशीलता और विकास का आईना भी है। जिस देश के बच्चे सुरक्षित होंगे, वही देश आर्थिक और सामाजिक रूप से मजबूत होगा।
उत्तर प्रदेश ने पिछले वर्षों में सकारात्मक प्रगति जरूर की है, लेकिन लक्ष्य अभी दूर है। सरकार का प्रयास है कि हर मां और हर नवजात को “गोल्डन टाइम” में सस्ती, प्रभावी और गुणवत्तापूर्ण चिकित्सा सुविधा मिल सके। क्योंकि सरकार की नजर में हर पैदा होने वाला बच्चा देश का भविष्य है और इस भविष्य का असमय अंत नहीं होना चाहिए। प्रदेश सरकार ने जिस प्रतिबद्धता के साथ शिशु मृत्यु दर कम करने की दिशा में अभियान चलाया, उससे स्वास्थ्य क्षेत्र में व्यापक सुधार की उम्मीद भी मजबूत हुई है।
देश की करीब 140 करोड़ आबादी में उत्तर प्रदेश की हिस्सेदारी लगभग एक-छठा है। यह देश का सबसे युवा राज्य भी माना जाता है। यहां प्रजनन आयु वर्ग की आबादी अधिक होने के कारण जन्म लेने वाले बच्चों की संख्या भी सबसे ज्यादा है। इसलिए प्रदेश के स्वास्थ्य आंकड़ों में मामूली सुधार या गिरावट का असर सीधे राष्ट्रीय औसत पर पड़ता है।
ऐसे में शिशु मृत्यु दर को कम करना उत्तर प्रदेश सरकार के लिए सिर्फ स्वास्थ्य नीति नहीं, बल्कि एक व्यापक सामाजिक संकल्प बन गया है। एक ऐसा संकल्प, जो स्वस्थ भारत के जरिए “सशक्त और समर्थ भारत” के सपने से सीधे जुड़ता है।
Edited by: Vrijendra Singh Jhala