लापरवाह सिस्टम की सड़ांध में डूबी मां की मौत को बलिदान नहीं कहना चाहिए, उसकी मौत का प्रतिशोध लेना चाहिए
एक तस्वीर छद्म दुनिया में तैर रही है। मां मर गई। डूबकर मर गई। उसके साथ उसका बच्चा भी मर गया। छाती से चिपका हुआ। कहा जा रहा है मां ने अपने बच्चे को अपनी छाती से अलग नहीं किया, जब तक वो खुद और उसके बच्चे की सांसों में पूरी तरह से नदी का पानी नहीं भर गया। वैसे तो कई मौतें हुईं हैं। लेकिन यह तस्वीर इस हादसे का प्रतीक बन गई है। हालांकि ये तस्वीर असल है या एआई से बनाई गई है यह अब तक साफ नहीं है।
लोग इस तस्वीर को वायरल कर रहे हैं। कविता बनाकर। किंतु हमने मौत को और उसकी वजह को नहीं देखा। सिस्टम की लापरवाही और उसकी सड़ांध को नहीं देखा। हमने मां की मौत में कविता के बिम्ब तलाशे। हमने मां की महिमा गाई। उसकी ममता और उसकी भावुकता तलाशी। उसकी मौत को मां होने की ताकत बताया। मां की ममता। उसकी ताकत। उसके ममत्व का मेटाफर रचा। कुछ शब्द टटोले और कविता बना दी। पोस्टर बना डाले। कविता कहने का सुख हासिल कर लिया। ऐसे हादसों में जब कोई मां मर जाए। कोई बच्चा मर जाए तो कविता नहीं लिखी जाती। बेवजह और बे-वक्त होने वाली ऐसी मौतों का बदला लिया जाना चाहिए। ऐसे हादसों पर हम रूदाली बन जाते हैं— जबकि ऐसी मौतों पर प्रतिशोध लिए जाने चाहिए।
इरादतन के आगे गैर लिखने से मारा गया आदमी जिंदा नहीं हो जाता। हत्या इरादे के साथ की गई हो या गैर-इरादतन। वो हत्या ही है— और 9 लोग मारे जा चुके हैं। एक बच्चा और उसकी मां भी शामिल हैं। बावजूद इसके कि हत्या का इरादा नहीं था— मारे जा चुके लोग लौटकर वापस नहीं आएंगे।
चाहे इंदौर में जहरीला पानी पीकर कोई मरे या जबलपुर में पानी में डूबकर मरे। वो बच्चा जो अभी कोख से छाती तक ही पहुंचा था। कोख और छाती में ज्यादा फर्क और ज्यादा दूरी नहीं होती है। अभी उसकी जिंदगी शुरू ही नहीं हुई थी। उसकी मौत पर कविता बना डाली। जबकि सिस्टम की छाती पर बैठकर सवाल पूछे जाने चाहिए थे। 5 बच्चे अभी भी लापता हैं। क्या उम्मीद करें कि वो बच्चे बरगी डेम में जिंदा होंगे?
किन्तु हम हर हादसे के बाद रिश्तों में ममत्व, करुणा और त्याग की भावनाओं के शिकार हो जाते हैं। हमने सदियों से मां को बलिदान की तरह देखा— मां के नहीं रहने पर उस क्षति को नहीं देखा। उस लापरवाही को, उस खालीपन को नहीं देखा। सिस्टम की उस सड़ांध को नहीं देखा, जिसने हमसे हमारी मां को छीन लिया। मासूम बच्चों को छीन लिया। उस नुकसान को नहीं देखा। उस खालीपन को नहीं देखा। इस क्षति की भरपाई कविता नहीं है। इस क्षति की भरपाई प्रतिशोध है। इस सिस्टम से प्रतिशोध। इस सिस्टम के सुरक्षित रखने वाले रहनुमाओं से प्रतिशोध।
हर हादसे के बाद ये रहनुमा आएंगे। हर मौत के बाद आएंगे। आते रहें हैं— और आते रहेंगे। मुआयना करेंगे। मुआवजा देंगे। फिर जांच बैठाएंगे। आवाज़ में थोड़ा दुख, थोड़ी खरज लाएंगे। थोड़ी रुलाई लाएंगे। कैमरे पर बाइट देंगे। रुमाल निकालेंगे। चले जाएंगे। इनका काम ही यही है। इनके पास पचहत्तर काम हैं। आपके पास एक ही मां है। एक ही बाप और एक ही औलाद। एक हादसे के बाद आपकी जिंदगी खत्म हो जाती है। लेकिन इनकी राजनीति कभी खत्म नहीं होती।
उनके लिए आपके अपनों की मौत सिर्फ एक औपचारिक उद्घाटन है। जैसे किसी सड़क का रिबन काटा। जैसे किसी रेल को हरी झंडी दिखाई। जैसे किसी पुल का शुभारंभ किया। इनके कामों की सूची लंबी है। इन्हें पेड़ काटना है। जंगल काटना है। सड़कें खोदना है। खातों में फ्रीबीज डालना है। पश्चिम बंगाल का चुनाव जीतना है। सिंहस्थ की तैयारी करना है। 2029 जितना है। हम घर जाएंगे। कुछ दिन रोएंगे और दफ्तर लौट जाएंगे। फिर किसी हादसे का इंतजार करते हुए। फिर कुछ लोग डूबेंगे। कुचले जाएंगे। फिर जांच शुरू होगी और जांचें चलती रहेगी। जैसे हादसे चलते रहते हैं।
लोग इस तस्वीर को वायरल कर रहे हैं। कविता बनाकर। किंतु हमने मौत को और उसकी वजह को नहीं देखा। सिस्टम की लापरवाही और उसकी सड़ांध को नहीं देखा। हमने मां की मौत में कविता के बिम्ब तलाशे। हमने मां की महिमा गाई। उसकी ममता और उसकी भावुकता तलाशी। उसकी मौत को मां होने की ताकत बताया। मां की ममता। उसकी ताकत। उसके ममत्व का मेटाफर रचा। कुछ शब्द टटोले और कविता बना दी। पोस्टर बना डाले। कविता कहने का सुख हासिल कर लिया। ऐसे हादसों में जब कोई मां मर जाए। कोई बच्चा मर जाए तो कविता नहीं लिखी जाती। बेवजह और बे-वक्त होने वाली ऐसी मौतों का बदला लिया जाना चाहिए। ऐसे हादसों पर हम रूदाली बन जाते हैं— जबकि ऐसी मौतों पर प्रतिशोध लिए जाने चाहिए।
इरादतन के आगे गैर लिखने से मारा गया आदमी जिंदा नहीं हो जाता। हत्या इरादे के साथ की गई हो या गैर-इरादतन। वो हत्या ही है— और 9 लोग मारे जा चुके हैं। एक बच्चा और उसकी मां भी शामिल हैं। बावजूद इसके कि हत्या का इरादा नहीं था— मारे जा चुके लोग लौटकर वापस नहीं आएंगे।
किन्तु हम हर हादसे के बाद रिश्तों में ममत्व, करुणा और त्याग की भावनाओं के शिकार हो जाते हैं। हमने सदियों से मां को बलिदान की तरह देखा— मां के नहीं रहने पर उस क्षति को नहीं देखा। उस लापरवाही को, उस खालीपन को नहीं देखा। सिस्टम की उस सड़ांध को नहीं देखा, जिसने हमसे हमारी मां को छीन लिया। मासूम बच्चों को छीन लिया। उस नुकसान को नहीं देखा। उस खालीपन को नहीं देखा। इस क्षति की भरपाई कविता नहीं है। इस क्षति की भरपाई प्रतिशोध है। इस सिस्टम से प्रतिशोध। इस सिस्टम के सुरक्षित रखने वाले रहनुमाओं से प्रतिशोध।
हर हादसे के बाद ये रहनुमा आएंगे। हर मौत के बाद आएंगे। आते रहें हैं— और आते रहेंगे। मुआयना करेंगे। मुआवजा देंगे। फिर जांच बैठाएंगे। आवाज़ में थोड़ा दुख, थोड़ी खरज लाएंगे। थोड़ी रुलाई लाएंगे। कैमरे पर बाइट देंगे। रुमाल निकालेंगे। चले जाएंगे। इनका काम ही यही है। इनके पास पचहत्तर काम हैं। आपके पास एक ही मां है। एक ही बाप और एक ही औलाद। एक हादसे के बाद आपकी जिंदगी खत्म हो जाती है। लेकिन इनकी राजनीति कभी खत्म नहीं होती।
उनके लिए आपके अपनों की मौत सिर्फ एक औपचारिक उद्घाटन है। जैसे किसी सड़क का रिबन काटा। जैसे किसी रेल को हरी झंडी दिखाई। जैसे किसी पुल का शुभारंभ किया। इनके कामों की सूची लंबी है। इन्हें पेड़ काटना है। जंगल काटना है। सड़कें खोदना है। खातों में फ्रीबीज डालना है। पश्चिम बंगाल का चुनाव जीतना है। सिंहस्थ की तैयारी करना है। 2029 जितना है। हम घर जाएंगे। कुछ दिन रोएंगे और दफ्तर लौट जाएंगे। फिर किसी हादसे का इंतजार करते हुए। फिर कुछ लोग डूबेंगे। कुचले जाएंगे। फिर जांच शुरू होगी और जांचें चलती रहेगी। जैसे हादसे चलते रहते हैं।
