राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के शताब्दी वर्ष के अवसर पर भोपाल में आयोजित कार्यक्रम केवल औपचारिक आयोजन नहीं थे, बल्कि संघ की वैचारिक यात्रा, सामाजिक दृष्टि और भविष्य की रूपरेखा को समग्रता में सामने रखने वाले महत्वपूर्ण पड़ाव थे। प्रमुख जन गोष्ठी सामाजिक सद्भाव बैठक और युवा संवाद—इन तीनों मंचों से सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने समाज, समरसता और युवा शक्ति को जोड़ते हुए राष्ट्र निर्माण का एक स्पष्ट वैचारिक खाका प्रस्तुत किया।
प्रमुख जन गोष्ठी में सरसंघचालक ने जिस केंद्रीय विचार को रेखांकित किया, वह था हिन्दू पहचान । उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि मत, पंथ, संप्रदाय, भाषा और जाति की विविधता के बावजूद हिन्दू पहचान हम सबको जोड़ती है। यह पहचान किसी संकीर्ण धार्मिक परिभाषा तक सीमित नहीं है, बल्कि साझा संस्कृति, साझा पूर्वजों और साझा जीवन मूल्यों से उपजी हुई है। डॉ. भागवत ने समाज की मानसिक अवस्था को चार वर्गों में विभाजित करते हुए कहा कि जब समाज यह भूल जाता है कि वह हिन्दू है, तब विपत्तियाँ आती हैं। इतिहास इस तथ्य का साक्षी है।
उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि हिन्दू होना केवल पूजा-पद्धति नहीं, बल्कि एक स्वभाव और जीवन दृष्टि है। धर्म की भारतीय अवधारणा को समझाते हुए उन्होंने कहा कि धर्म का अर्थ *रिलीजन नहीं, बल्कि वह व्यवस्था है जो सबको साथ लेकर चलती है, सबका उत्थान करती है और समाज को संयम व सद्भाव से जोड़ती है। यही कारण है कि विविध मार्गों के बावजूद लक्ष्य एक रहता है—समरस और सशक्त समाज।
इसी वैचारिक धारा का विस्तार सामाजिक सदभाव बैठक में देखने को मिला। कुशाभाऊ ठाकरे सभागार में आयोजित इस बैठक में सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने कहा कि सामाजिक सद्भाव कोई नई अवधारणा नहीं है, बल्कि यह भारतीय समाज का स्वभाव रहा है। उन्होंने समाज शब्द की व्याख्या करते हुए कहा कि समाज वह समूह है, जो समान गंतव्य की ओर बढ़ता है। भारतीय समाज की कल्पना सदैव ऐसी रही है, जिसमें जीवन भौतिक और आध्यात्मिक—दोनों दृष्टियों से सुखी हो।
डॉ. भागवत ने इस अवसर पर अत्यंत महत्वपूर्ण बात कही कि कानून समाज को नियंत्रित कर सकता है, लेकिन समाज को जोड़कर रखने का कार्य केवल सदभावना कर सकती है। विविधता के बावजूद एकता को स्वीकार करना ही हिन्दू समाज की पहचान है। उन्होंने कहा कि हिन्दू कोई संज्ञा नहीं, बल्कि एक स्वभाव है—जो मत, पूजा-पद्धति या जीवनशैली के आधार पर टकराव नहीं करता।
उन्होंने समाज को तोड़ने के प्रयासों की ओर संकेत करते हुए कहा कि जनजातीय और अन्य वर्गों को यह कहकर अलग करने का प्रयास किया गया कि वे अलग हैं, जबकि सच्चाई यह है कि हजारों वर्षों से इस भूमि पर रहने वाले सभी लोगों का डीएनए एक है। सद्भाव केवल संकट के समय नहीं, बल्कि निरंतर संवाद, मिलन और परस्पर सहयोग से ही जीवित रहता है। समर्थ का दायित्व है कि वह दुर्बल की सहायता करे—यही सामाजिक सद्भाव की आत्मा है।
इस बैठक को संबोधित करते हुए प्रख्यात कथावाचक पंडित प्रदीप मिश्रा ने संघ और समाज के संबंध को आध्यात्मिक दृष्टि से व्याख्यायित किया। उन्होंने कहा कि संघ और शिव के भाव में अद्भुत समानता है। जैसे शिव ने सृष्टि के कल्याण के लिए विषपान किया, वैसे ही संघ प्रतिदिन आरोपों और विरोध का विष पीकर भी संयम और राष्ट्रहित के मार्ग पर चलता रहा है। उन्होंने कहा कि जन्म किसी भी जाति में हो, पहचान अंततः हिंदू, सनातनी और भारतीय की ही है।
पंडित मिश्रा ने धर्मांतरण को केवल वर्तमान नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों को प्रभावित करने वाला गंभीर षड्यंत्र बताया और समाज को इसके प्रति सजग रहने का आह्वान किया। ग्रीन महाशिवरात्रि जैसे अभियानों का उल्लेख करते हुए उन्होंने सामाजिक समरसता के व्यावहारिक उदाहरण सामने रखे और कहा कि राष्ट्र निर्माण में सभी को एकजुट होकर आगे बढ़ना होगा।
सामाजिक सद्भाव बैठक का एक महत्वपूर्ण पक्ष विभिन्न समाजों द्वारा प्रस्तुत किए गए कार्य प्रतिवेदन रहे। तेली साहू समाज, जैन मिलन, यादव महासभा, मीणा समाज, माहेश्वरी समाज, कायस्थ महासभा, जाटव समाज सहित अनेक सामाजिक संगठनों ने शिक्षा, स्वास्थ्य, पर्यावरण संरक्षण, महिला सशक्तिकरण, रोजगार और सांस्कृतिक संरक्षण के क्षेत्र में किए जा रहे कार्यों की जानकारी दी। यह स्पष्ट संदेश था कि समाज की सज्जन शक्ति जीवंत है और राष्ट्र निर्माण में सक्रिय भूमिका निभा रही है।
इसी वैचारिक यात्रा का तीसरा और भविष्य की दृष्टि से सबसे महत्वपूर्ण पड़ाव रहा *युवा संवाद। सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने युवाओं से संवाद करते हुए कहा कि भारत का युवा जाग गया है और वह अपने देश को समर्थ बनाना चाहता है। उन्होंने स्पष्ट किया कि कोई भी देश केवल नेता, नीति या व्यवस्था से नहीं, बल्कि सम्पूर्ण समाज के योगदान से महान बनता है। संघ का प्रत्येक स्वयंसेवक इसी भाव के साथ कार्य करता है कि भारत को परम वैभव पर पहुंचाना है।
डॉ. भागवत ने युवाओं से अहंकार और स्वार्थ छोड़कर गुणों को धारण करने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि संघ की शाखा व्यक्ति निर्माण की ऐसी पद्धति है, जो अच्छी आदतें विकसित करती है और देशभक्ति को जीवन का हिस्सा बनाती है। भयमुक्त होकर जीने, स्वयं से पहले देश को रखने और अपने विकास को राष्ट्र व परिवार की प्रगति से जोड़कर देखने का संदेश उन्होंने युवाओं को दिया।
युवा संवाद में पूछे गए प्रश्नों के उत्तर देते हुए सरसंघचालक ने करियर, सुरक्षा, संघर्ष और तकनीक जैसे समकालीन विषयों पर भी स्पष्ट दृष्टि रखी। उन्होंने कहा कि सुरक्षा की कोई गारंटी नहीं होती, लेकिन बिना भय के जीवन जीना ही मनुष्य को आगे बढ़ाता है। एआई जैसे विषयों पर उन्होंने कहा कि तकनीक को नियंत्रित करना होगा, न कि उसके अधीन होना होगा। तकनीक का उपयोग देशहित में करने वाले युवाओं का निर्माण ही भविष्य की आवश्यकता है।
इस अवसर पर अखिल भारतीय सह बौद्धिक प्रमुख श्री दीपक विस्पुते ने संघ की 100 वर्षों की यात्रा पर प्रकाश डालते हुए कहा कि संघ उत्सव नहीं मना रहा, बल्कि लोगों के दिलों तक पहुंचने का प्रयास कर रहा है—डोर टू डोर, मेन टू मेन और हार्ट टू हार्ट। भोपाल करुणा धाम के प्रमुख श्री सुदेश शांडिल्य जी महाराज ने युवाओं को सामर्थ्यवान बनने का संदेश देते हुए कहा कि समर्थ वही है, जिसकी नीयत में दोष नहीं हो।
भोपाल में आयोजित ये तीनों कार्यक्रम एक ही सूत्र में बंधे दिखाई दिए—हिन्दू पहचान, सामाजिक सद्भाव और युवा शक्ति। यह स्पष्ट हुआ कि संघ का शताब्दी वर्ष केवल अतीत का उत्सव नहीं, बल्कि समाज को संगठित, समरस और गुणसम्पन्न बनाकर भविष्य की दिशा तय करने का प्रयास है। संदेश साफ है—एक समाज, एक राष्ट्र की यात्रा में हर व्यक्ति की भूमिका महत्वपूर्ण है।
(लेखक राजनैतिक विश्लेषक है)