lock down special : खोल लीजिए यादों की अनमोल पोटली


कभी ध्यान से सुनना, नन्हें शिशु के पैरों में बंधी छन-छन करती पायलों की स्वर लहरी, सारे संगीत फीके हैं उसके आगे। नववधू की चूड़ियों की खन-खन, सारे सुर बौने हैं उसके आगे, नन्हें बच्चों की खिलखिलाहट सारे वाद्य मौन हैं उनके आगे। और ऐसे ही कई सारे सुखों को बांध रखते हैं हम अपने घर के किसी कोने में।

जो अपने आप में संजोया एक आनंद सागर होता है। बहता है यादों का मीठा झरना अनवरत उनमें। पर उस आनंद से वंचित और प्यासे रहते हैं हम। उस मीठे पानी के रहते भी दौड़ते रहते हैं बस अतीत से पीछा छुड़ाते, अनिश्चित वर्तमान में, अनजाने भविष्य की ओर। आज ऐसी ही अमृत अतीत का पिटारा खोले बैठे हैं हम।

कोरोना भले ही कोसने योग्य हो पर हम तो ठहरे भारतीय जो आपदा को अवसर, विपदा में वरदान ढूंढ लेते हैं। बस इसी के कारण हुए लॉक डाउन ने हमें भी यह सुनहरा मौका दिया और निकाल लिए यादों के सुनहरे क्षण जो बंद थे उन पीतल व मोटे टीन के बक्सों व कोठियों में। जो लाये थे हम अपने कच्चे मकान से अपने जिनके कारण मकान घर हुआ करता था। अपने पक्के से घरों में हमारे मन भी शायद उसी तरह कठोर और पक्के हो जाते हैं। आगे-आगे भागने की जिद में।
वो बक्से, कोठियां बेहद खूबसूरत रहे होंगे। पीतल के कुंदो-कीलों से सजावट तो यही कहती है भले ही रख-रखाव के अभाव में अब काले से हो गए। उस कोने में आज मैंने यादों का सागर बहा दिया है। यादें दिलों में अगरबत्तियों सी सुलगती रहतीं हैं, जो महकतीं भी हैं पर जी को जलातीं भी हैं। उन बक्सों में रखीं हैं पूरी सदी। अपनी सास की लाल रंग की चमकीली बूटेदार ‘घाटड़ी’ जो वो अपने माथे पर हाथ भर घूंघट डाले ओढ़ कर इस घर में दुल्हन बन कर आईं थीं।

ससुर जी की कशीदे वाली सुंदर टोपी, उनके साथ उलझे पड़े हैं दो सुनहरे लड़ी वाले मोती लगे मोर। जो उनके विवाह पर बांधे गए, ऐसा ही बताया था मां ने। वो भी तो ले कर बैठ जाती थी ऐसे ही फुरसत में। उस समय फुरसत निकालनी नहीं पड़ती थी। उन्ही के साथ हमारी भी शादी की चीजें ऐसी ही अबेर रखीं थीं उन्होंने।

गोद भराई के कपड़ों से ले कर रस्मों रिवाज के नारियल भी उन्होंने सम्हाल रखे थे। कुछ रेशमी नन्हें कपड़े जो घर के बच्चों को छठी पूजने में पहनाए जाते थे। हमारे बाबा ससुर की ‘पगड़ी’जिसे वे हमेशा अपने माथे पर बांधे रखते थे, उसमें से आज भी उनके ‘विद्या वारिधि’ होने की तेजस्विता का अहसास होता है। कुछ ‘ब्लेक एंड व्हाइट’ अस्पष्ट सी तस्वीरे। जिनमें लोगों को अंदाजे से पहचानना पड़ता।

कुछ छोटी-छोटी सी पेटियां जिनमे वे अपने पैसे सम्हाला करते थे। घुट्टी पिलाने का कुछ सामान, पत्थर का छोटा सा घिस्सा, चन्दन के टुकड़ों के साथ निकला एक नक्काशीदार वेलवेट का, इत्र-फुलेल की सुंदर सी नन्ही शीशियों से भरा बक्सा। जिसमें आज भी मदहोश कर देने की खुशबू थी। मां बताती थीं की ‘वो’आ रहे हैं इन्ही खुशबूओं से जान जातीं थीं। उनमें कुछ पत्र भी थे जिनके कागज पीले हो, खिर रहे थे, पर उनमें लिखे प्रेम अक्षरों का प्रेम सांसे ले रहा है आज भी।

काली फ्रेम का चश्मा। जिसमें से आज भी उनकी आंखें हमें निहार रहीं हैं। हाथ में लेकर चलने वाली छड़ी जिसे वे कुबड़ी कहा करते थे हाथों के निशान हैं उन पर उनके। लगता है आज भी हमारा हाथ पकडे हुए हैं। उनके हाथों से लिखे श्लोक-पुस्तिका, मां के भजनों की डायरी। दोनों में उनकी तन्मयता झलकती है। बढती उम्र की निराशा कभी उन्हें परेशान नहीं कर पाई। उनमे रखे रूपये, बच्चों की चिट्ठियां, कार्ड, ड्राइंग क्या नहीं सम्हाल रखे थे उन्होंने। हम आज अटाले कह कर फेंक देते हैं जबकि यही जीने के असल सहारे होते हैं।
उमर की राह मे रास्ते बदल जाते हैं, वक़्त की आंधी मे इंसान बदल जाते हैं। ऐसा ही तो हमारे साथ भी हुआ है। निर्जीव भौतिकता के साथ रहते रहते सजीव यादों को भी भूल बैठे। भूल ही गई थी वो ‘कथली’ जो मेरी नानी ने मेरी बेटी के लिए अपने हाथों से जब सिल कर दी थी तब उनकी उम्र सत्तर साल की थी। आज मुझे वो अलादीन के जादुई कालीन सी लग रही है जो मुझे ले उड़ चली है अपने बचपन में और खड़ी हूं उस मंच पर जहां शायद छः साल की मैं नाच रही हूं।
अपनी ही एक जसोदा रूपी ‘जीजी’ के स्कूल में जहां वो टीचर थीं। खूब तारीफों के बीच मेरी जीजी मुझे अपनी गोद में उठाये गर्व और प्यार से घूम रहीं है। घर आने पर मेरी नानी ने मुझे दिए थे वो बारह पीतल के खूबसूरत घुंघरू इनाम में। बक्से से वो मेरी ओर देख नानी व जीजी के बारे में गुफ्तगू कर रहे हैं। एक काजल की चांदी की डब्बी भी है। जो दी थी मेरे बाबूजी ने। चिड़िया के आकार की उस डिब्बी के पेट में काजल रखा होता था।

माला फेरने की रेशमी गोमुखी, तुलसी माला, जिसको अनगिनत बार परिवार की कुशलता के लिए ईश-स्मरण में प्रार्थना स्वरूप फेरा गया होगा।

पैरों की खड़ाऊ हाथ में आते ही कान एक खास आवाज़ से सजग हो जाते हैं।

हर बच्चे से जुडी कोई न कोई चीज इसमें मौजूद है। यादें भी समंदर के किनारों पर आती लहरों की तरह हैं, जो न खुद सूखती हैं न किनारों को सूखने देती है…आखें भीगने लगीं हैं न जाने क्यों? पुराने पञ्चांग और बच्चों की खुद के हाथ से बनाई जन्म कुण्डलियां जो अब केवल रिसर्च का विषय रह गईं हैं। इनकी डायरियों में लिखे घर खर्च। बच्चों से जुडी बातें, कभी ख़ुशी कभी गम के दस्तावेज लगते हैं।

पीतल की छोटी-छोटी डिब्बियों में रखे कंकू-चावल जो हर घर आए मेहमान को लगाये जाते थे। हाथों से बुने हुए स्वेटर भी रखे हैं इस पोटली में। बच्चों के लिए बड़े जतन और शौक से बुने हुए, खास नरम ऊन ला कर बनाये हुए। साथ ही सुंदर कढ़ाई किये हुए ओढावन व बिछावन जो रंगीन डोरों की डिजाईन से नरम, पुरानी सूती साड़ियों के बने हुए हैं।
यादें अच्छी हो तो मुस्कुराहट लाती हैं, और यादें बुरी हो तो आंखें नम कर जाती हैं। यादों की तो कोई केटेगिरी नहीं होती। हम ही उन्हें अच्छी-बुरी बनाते हैं। मेरे बक्से में रखीं बच्चों की पायल, करधनी, पोंची और बाबूजी का दिया एक नन्हा सा स्वर्ण-सूर्य जिसे उन्होंने काले डोरे में बांध कर दिया था। हमेशा उन सभी बड़ों की याद दिलाती हैं जिन्होंने बड़े प्यार और आशीर्वाद के साथ दिया था।

लफ़्ज, अल्फ़ाज, कागज़ और किताब यहां तक कि हर बारह वर्ष में एक बार आने वाली कोकिला व्रत पूजन की
कोयलें भी उस बक्से में कूकती हुईं सी सुनाइ दे रहीं हैं। कहां कहां नही रखा है इन यादों का हिसाब। लगता है जैसे लॉक डाउन के वीराने में चुपके से बहार आ गई।

बच्चे बड़े ध्यान से सब देख-सुन रहे हैं। बक्से का खजाना किसी जादूगर के ‘वाटर ऑफ इण्डिया’ की तरह हो चला था। उनके हाव-भाव बदलते जा रहे थे। मुझे आश्चर्य से देख रहे थे। मैं कितनी नन्हीं हो चली थी। अपने किचेन-सेट और गुडियों की धूल झटक रही हूं। पुराने पड़े लाल पत्थरों के आटा चक्की के पाट साफ कर उनका लकड़ी का हत्था ढूंढ रही हूं।।।

मिल गया है मुझे एक संगमरमर का खरड। जिसमें चूरण व दवाएं घोंटी जातीं थीं। ओहो!! लकड़ी की तीन पहिये की गाड़ी जिसे ले कर घर के हर बच्चे ने चलना सिखा। अरे।।। ये पीतल व लोहे के मोटे तारों वाली साइकल कुर्सी भी तो है जिस पर दादाजी हेंडल पर लगा, नरम सा कपड़ा बिछा, बच्चों को खूब दूर बज्जी ले जाया करते थे घुम्मी कराने। चिज्जी दिलाने। ये पलना, जिसमें हर बच्चे ने अपने दादा-दादी से सुंदर आरतियां, भजन, श्लोक और लोरियां सुनीं।

चुपके से निकल कर आते ही जा रहे हैं नये पत्ते, यादों के इन दरख्तों में पतझड़ जो नही होते। इस अनंत लोक में हर बात याद है। ढ़ोलक के शेप की इस कोठी में रखे हैं फावड़े, कुदाली, तगारी, वायर, कीलों का ढेर, हथौड़ी, नल सुधरने व कारपेंटरी के साथ-साथ कारीगर,बिजली सुधारने का सामान। सब मुखाग्र याद रहता था कहां क्या रखा है। अधिकतर काम हाथों से ही किया जाता था। किसी सुधारक का इन्तजार नहीं होता था।

यहां तक कि मोटे धागों के बंडल भी सम्हाले हुए उसमें हैं। सुंदर चिकने बड़े पत्थर भी जतन से रखते थे। दरवाजे की ओट लगाने के काम जो आते थे। कितने मितव्ययी पर राजसी हुआ करते थे ये हमारे बड़े। विलासिता से परे, आवश्यकता को बूझते हुए। दर्द में भी ये लब मुस्कुरा उठे हैं, ये बीते लम्हे याद करते हुए। उठा लिया है मैंने मां के हाथ से बुना वो क्रोशिये का थाल पोश जो पूजा करने जाते समय थाली पर डला फुंदों से झालर के साथ झूलता था हवा में। हाथों का कंकू-हल्दी चन्दन महक रहा है।
ये यादें भी न बचपन के खिलौनों सी होतीं हैं जब भी इनसे जुड़ी बातें, चीजें, बक्से खोलो बस खेलते रहने को ही जी चाहता है। देवघर से लेकर रसोई घर तक। उठने से ले कर सोने तक। ऐसी कौन सी चीज है जिसमें यादे न हों। हर लम्हा यादों में बदलता है। यही तो नियति है। ऐसा नहीं होता तो क्यों लाखों की संख्या में भूखे-प्यासे मौत से जूझते लोग आज अपने घर-आंगन, अपनी मिटटी, अपनी जड़ों की तरफ दौड़ लगा रहे हैं।

वो याद ही तो हैं जो उन्हें ‘आ अब लौट चलें, लौट के आजा मेरे मीत’ की तर्ज पर उन्हें अपनी ओर खिंच रहीं हैं।।।बुला रहीं हैं।।।।।और मेरे, पास ये एक सुंदर बक्से में खूब सूरत से रेशमी रूमाल में रखी एक मुठ्ठी मेरे उस कच्चे मकान, पर पक्के घर की मिट्टी रखी है जो हर साल रखती हूं दीपावली की पूजा के पाट पर। मां लक्ष्मी के श्री चरणों में। क्योंकि यही है असल पूंजी।

इसी से बने, इसी में मिल जायेंगे। छुपें हैं इसमें पीढ़ियों के आशीर्वाद, प्रेम, तपस्या और त्याग। जिसकी बदौलत आज हम हैं। यादों का क्या है इन्हें ना शिकवा किसी का ना फ़रियाद किसी की, एहसास मिटा और मिटी इसकी उम्मीदें भी, सब मिटा पर ना मिटी यादें कभी भी।।।जिन्दा हैं ये कभी रामायण बन कर, कभी महाभारत बन कर।।। काव्य बन कर, शास्त्र बन कर।।।कहतीं है ये कहानी भी घर, समाज और देशों की इतिहास बन कर।।।।


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