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Last Updated :इंदौर , गुरुवार, 14 मई 2026 (23:22 IST)

धार भोजशाला विवाद पर आएगा कोर्ट का फैसला, मंदिर या कमाल मौला मस्जिद, निर्णय पर टिकी सबकी नजर

Dhar Bhojshala dispute
मध्यप्रदेश के धार जिले के बहुचर्चित और संवेदनशील भोजशाला-कमाल मौला मस्जिद विवाद मामले में एक महत्वपूर्ण फैसला आने वाला है। मध्यप्रदेश हाईकोर्ट इस लंबे समय से चले आ रहे विवाद पर 15 मई 2026 को अपना अहम फैसला सुनाएगा, इस पर पूरे प्रदेश की निगाहें टिकी हैं। 12 मई को इंदौर हाईकोर्ट ने आखिरी सुनवाई करके फैसला सुरक्षित रखा था। हाईकोर्ट की जारी कॉज लिस्ट में मामले को 'फॉर डिलीवरी ऑफ जजमेंट' यानी निर्णय सुनाए जाने के लिए सूचीबद्ध किया। 15 मई को इंदौर हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच फैसला सुना सकती है। 
 
धार की भोजशाला को हिन्दू समुदाय वाग्देवी (देवी सरस्वती) का मंदिर मानता है, जबकि मुस्लिम पक्ष इस स्मारक को कमाल मौला मस्जिद बताता है। हिन्दू पक्ष को उम्मीद है कि उसे नियमित पूजा की अनुमति मिलेगी। सुनवाई के दौरान हिन्दू, मुस्लिम और जैन समुदायों के याचिकाकर्ताओं ने विस्तृत दलीलें पेश कीं और स्मारक में अपने-अपने समुदाय के लोगों के लिए उपासना का विशेष अधिकार मांगा। 

लंबी सुनवाई के बाद आ सकता है फैसला

पांच याचिकाओं और तीन इंटरवेंशन को सुनने के बाद इंदौर हाईकोर्ट डबल बैंच ने फैसला सुरक्षित रखा था।  इस लंबी सुनवाई के दौरान भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) की सर्वे रिपोर्ट, ऐतिहासिक दस्तावेजों और दोनों पक्षों की दलीलों पर विस्तार से बहस हुई। सुनवाई पूरी होने के बाद न्यायालय ने अपना फैसला सुरक्षित रख लिया था, जो अब इस शुक्रवार को सुनाया जाएगा। फैसले को लेकर धार शहर सहित पूरे मध्यप्रदेश में उत्सुकता के साथ-साथ संवेदनशीलता का माहौल बना हुआ है। राजनीतिक और सामाजिक गलियारों में भी इस निर्णय को लेकर चर्चाएं तेज हैं। इसे भोजशाला विवाद के इतिहास में एक निर्णायक दिन माना जा रहा है।

98 दिनों तक वैज्ञानिक सर्वेक्षण

इस  प्रकरण में वर्ष 2024 में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग ने भोजशाला परिसर का 98 दिन तक वैज्ञानिक सर्वेक्षण किया था। इसके बाद 23 जनवरी 2026 को वसंत पंचमी पर सुप्रीम कोर्ट ने दिनभर निर्बाध पूजा-अर्चना की अनुमति दी थी। 6 अप्रैल 2026 से हाईकोर्ट में नियमित सुनवाई शुरू हुई, जो 12 मई तक चली।
 

कब सुना जाएगा मामला 

यह मामला माननीय न्यायमूर्ति विजय कुमार शुक्ला और माननीय न्यायमूर्ति आलोक अवस्थी की खंडपीठ के समक्ष शुक्रवार सुबह 10 बजे से सुना जाएगा। मामले में हिन्दू फ्रंट फॉर जस्टिस, अंतर सिंह एवं अन्य पक्षकारों के साथ मौलाना कमालुद्दीन वेलफेयर सोसायटी धार की ओर से दायर याचिकाएं शामिल हैं।

क्या थे हिन्दू पक्ष के तर्क 

हिन्दू समाज को उनके पक्ष में फैसला आने की उम्मीद है। 6 से 9 अप्रैल तक हिन्दू पक्ष की ओर से विष्णु शंकर जैन, विनय जोशी और मुख्य याचिकाकर्ता आशीष गोयल ने भोजशाला को मंदिर बताते हुए अपने तर्क रखे। याचिकाकर्ता पक्ष ने कोर्ट में कई ऐतिहासिक और पुरातात्विक साक्ष्य भी पेश किए। इनमें ASI सर्वेक्षणों और ऐतिहासिक अभिलेखों में मंदिर स्थापत्य के अवशेष, स्तंभ, शिलालेख और देवी सरस्वती से जुड़े प्रतीकों का उल्लेख शामिल रहा।
याचिकाकर्ताओं ने दावा किया कि ब्रिटिशकालीन गजेटियर और इतिहासकारों के दस्तावेजों में भोजशाला को मां सरस्वती के मंदिर और विद्या केंद्र के रूप में वर्णित किया गया है। साथ ही परिसर में संस्कृत और प्राचीन नागरी लिपि के शिलालेख मिलने तथा लंबे समय से वसंत पंचमी सहित अन्य अवसरों पर पूजा-अर्चना की परंपरा होने का भी हवाला दिया गया। याचिकाकर्ता पक्ष का यह भी कहना था कि परिसर के कई संरचनात्मक तत्व इस्लामी स्थापत्य से पूर्व के हैं, जो मंदिर स्वरूप की ओर संकेत करते हैं। मुख्य याचिका के साथ चार अन्य याचिकाएं और एक अपील भी क्लब की गई थीं। 

क्या हैं हिन्दू पक्ष की मांग 

हिंदू समाज को संविधान के अनुच्छेद 25 के तहत नियमित पूजा-अर्चना का अधिकार दिया जाए। भोजशाला परिसर में मुस्लिम समाज की धार्मिक गतिविधियों पर रोक लगाई जाए। केंद्र सरकार भोजशाला के संचालन और प्रबंधन के लिए ट्रस्ट का गठन करे। मां सरस्वती की प्रतिमा की निर्बाध पूजा-अर्चना सुनिश्चित की जाए। भोजशाला परिसर में नमाज पर रोक लगाई जाए। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग के 7 अप्रैल 2003 के आदेश को निरस्त किया जाए। ब्रिटिश म्यूजियम में रखी मां वाग्देवी की प्रतिमा वापस लाकर भोजशाला में स्थापित की जाए।
 

मुस्लिम पक्ष ने सर्वे रिपोर्ट का किया विरोध

विपक्ष की ओर से यह तर्क भी दिया गया कि परिसर लंबे समय से मुस्लिम समुदाय द्वारा कमाल मौला मस्जिद के रूप में उपयोग में रहा है। वर्तमान व्यवस्था सामाजिक संतुलन बनाए रखने के लिए स्थापित की गई थी। कुछ पक्षों ने कहा कि ऐतिहासिक दस्तावेजों की व्याख्या को लेकर मतभेद संभव हैं और वर्तमान धार्मिक व्यवस्था में बदलाव से सामाजिक तनाव उत्पन्न हो सकता है। सुनवाई में मुस्लिम पक्ष की ओर से सीनियर एडवोकेट शोभा मेनन और सुप्रीम कोर्ट के एडवोकेट सलमान खुर्शीद ने वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए पक्ष रखा जबकि एडवोकेट तौसिफ वारसी कोर्ट में मौजूद रहे। सुनवाई के दौरान राज्य सरकार और ASI की ओर से प्रस्तुत तर्कों और सर्वे रिपोर्ट का विरोध किया गया।

आखिर क्या है भोजशाला विवाद 

भोजशाला मध्य प्रदेश में इंदौर से कुछ ही दूरी पर स्‍थित धार जिले में है, जो एक विवादित स्मारक है। इस स्‍मारक को मुस्लिम पक्ष कमाल मौला मस्जिद कहता है। जबकि हिंदू पक्ष का दावा है कि यहां पहले वाग्‍देवी (मां सरस्वती) का मंदिर था। जिसे तोड़कर मस्जिद बना दिया गया। भोजशाला केंद्र सरकार के अधीन ASI का संरक्षित स्मारक है। आर्केलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया के अप्रैल 2003 के एक आदेश के मुताबिक यहां हर मंगलवार को हिन्दू पूजा करते हैं, जबकि हर शुक्रवार को मुसलमान यहां नमाज अदा करते हैं। हाईकोर्ट इंदौर के आदेश के मुताबिक यहां मंगलवार को हिंदू पूजा करते हैं, जबकि शुक्रवार को मुस्‍लिमों को नमाज अदा करने की अनुमति मिली हुई है। हिन्दू भोजशाला में मां सरस्‍वती का मंदिर होने का दावा करते हैं, जबकि मुस्‍लिम कहते हैं कि यहां कमाल मौला की मस्‍जिद है।
 

आजादी के बाद बढ़ता गया विवाद 

आजादी के बाद भोजशाला में पूजा और नमाज को लेकर विवाद बढ़ने लगा। विवाद कानूनी लड़ाई में बदल गया। इसी दौरान 1995 में हुई घटना से बात और बिगड़ गई। जिसके बाद प्रशासन ने मंगलवार को हिंदुओं को पूजा और शुक्रवार को मुस्लिम समाज को नमाज पढ़ने की अनुमति दे दी। फिर 1997 में प्रशासन ने भोजशाला में आम नागरिकों के प्रवेश पर प्रतिबंध लगा दिया। इस दौरान हिंदुओं को वर्ष में एक बार बसंत पंचमी पर पूजा करने की अनुमति दी गई। मुसलमानों को प्रति शुक्रवार दोपहर 1 से 3 बजे तक नमाज पढ़ने की अनुमति दी गई। 6 फरवरी 1998 को पुरातत्व विभाग ने भोजशाला में आगामी आदेश तक प्रवेश पर प्रतिबंध लगा दिया, लेकिन मुसलमानों को नमाज की अनुमति जारी रही। इस आदेश से विवाद और गहरा गया था।

ज्ञानवापी के बाद भोजशाला का सर्वे 

विवाद के बाद उत्‍तर प्रदेश के ज्ञानवापी मंदिर की तर्ज पर धार के भोजशाला में भी सर्वे शुरू हुआ है। मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक 1401 ईस्वी में दिलावर खान गौरी ने भोजशाला के एक हिस्से में और 1514 ईस्वी में महमूद शाह खिलजी ने दूसरे हिस्से में मस्जिद बनवाया था। 19वीं शताब्दी में खुदाई के दौरान मां सरस्वती देवी की प्रतिमा मिली थी। जिस प्रतिमा को अंग्रेज अपने साथ ले गए जो अभी लंदन संग्रहालय में है। इस प्रतिमा को वापस भारत लाने के लिए भी विवाद चल रहा है।

क्या है इतिहास के पन्नों में

भोजशाला मंदिर को राजा भोज ने बनवाया था। राजा भोज परमार वंश के सबसे महान राजा माने जाते थे, जिन्होंने 1000 से 1055 ईस्वी तक राज किया। इस दौरान उन्होंने साल 1034 में एक महाविद्यालय की स्थापना की, जिसे बाद में भोजशाला नाम से जाना गया। दूर-दूर से छात्र यहां पढ़ने आया करते थे। इसी कॉलेज में देवी सरस्वती का मंदिर भी था। हिंदू धर्म में सरस्वती को ज्ञान की देवी माना जाता है। कहा जाता है कि मंदिर बहुत भव्य था। सरस्वती मंदिर का उल्लेख शाही कवि मदन ने अपने नाटक में भी किया था। नाटक को कोकरपुरमंजरी कहा जाता है और यह अर्जुनवर्मा देव (1299-10 से 1215-18 ई.) के सम्मान में है जिन्हें मदन ने ही पढ़ाया था। Edited by : Sudhir Sharma
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