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दुर्गा स्क्वॉड कैसे बदलेगा बंगाल में महिला सुरक्षा का हाल?

West Bengal Durga Squad
प्रभाकर मणि तिवारी
महिला सुरक्षा के लिहाज से बदतर राज्यों के मामले में पश्चिम बंगाल बीते कई वर्षों से देश के चार शीर्ष राज्यों में शुमार रहा है। लेकिन अब सरकार बदलने के बाद इस तस्वीर को बदलने की पहल शुरू हुई है। ALSO READ: मिस्र के रेगिस्तान में मिला सैंकड़ों साल पुराना शहर
 
पश्चिम बंगाल सरकार ने महिलाओं में सुरक्षा की भावना को मजबूत करने के लिए एक 'दुर्गा स्क्वॉड' के गठन का एलान किया है। इसके लिए करीब 16 हजार महिला पुलिस कांस्टेबलों को विशेष तौर पर प्रशिक्षित किया जाएगा। यह राज्य के विभिन्न हिस्सों में मोटरसाइकिल से गश्त लगाएंगी। उनके लिए फिलहाल 213 मोटरसाइकिलें मुहैया कराई गई हैं।
 
मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने इस स्क्वॉड के गठन के साथ ही राज्य के सभी पांच सौ थानों में चौबीसों घंटे चलने वाले महिला हेल्प डेस्क और साइबर क्राइम हेल्प डेस्क की स्थापना करने का एलान किया है। ALSO READ: नया रक्षा बैंक क्यों बनाना चाहता है नाटो का सदस्य कनाडा
 
इस मौके पर मुख्यमंत्री ने कहा, "महिलाओं के खिलाफ अपराध के मामले में सरकार जीरो टालरेंस यानी शून्य सहनशीलता की नीति पर चलेगी। तमाम थानों को बिना किसी हिचकिचाहट और राजनीतिक हस्तक्षेप के महिलाओं के खिलाफ किसी भी किस्म के अपराध के मामले में एफआईआर दर्ज करने का निर्देश दिया गया है। साइबर क्राइम की शिकार महिलाओं की बढ़ती संख्या को ध्यान में रखते हुए हर थाने में इसकी शिकायत दर्ज कराने के लिए अलग हेल्प डेस्क रहेगा।"
 
अधिकारी ने पुलिस को महिलाओं के खिलाफ अपराध की हर शिकायत दर्ज करने का निर्देश दिया है। उनका आरोप था कि राज्य की पूर्व सरकार के कार्यकाल में खासकर महिलाओं और बच्चों को खिलाफ अपराधों के आंकड़े बहुत कम कर दिखाए जाते थे। इसलिए एनसीआरबी के कड़ो में सही तस्वीर नहीं उभरती थी। लेकिन अब यहां एक भी मामला नहीं छिपाया जाएगा। सही आंकड़ा सामने आने की स्थिति में ही इस समस्या से निपटने की प्रभावी रणनीति बनाई जा सकती है।
 

महिलाओं के खिलाफ बढ़ते अपराध

नेशनल क्राइम रिकार्ड्स ब्यूरो (एनसीआरबी) की रिपोर्ट के मुताबिक, राज्य में महिलाओं के खिलाफ अपराध की दर तो ऊंची है। लेकिन ऐसे में मामलों में सजा मिलने की दर बहुत कम है। इसलिए महिला मुख्यमंत्री के सत्ता में होने के बावजूद महिलाओं की सुरक्षा पर सवाल उठते रहे हैं। ममता बनर्जी के मुख्यमंत्रित्व काल के आखिरी वर्षो में कोलकाता के आर.जी. कर मेडिकल कालेज अस्पताल में एक जूनियर डाक्टर के साथ रेप के बाद उसकी हत्या के बाद कोलकाता के ही एक ला कालेज में एक छात्रा के साथ गैंगरेप की घटना ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सुर्खियां बटोरी थी।
 
एनसीआरबी के आंकड़ों में बताया गया है कि वर्ष 2021 से 2023 के बीच महिलाओं के खिलाफ अपराध के मामले में बंगाल पूरे देश में चौथे स्थान पर था। लेकिन महिला कार्यकर्ताओं का दावा है कि यह तो उन आंकड़ों पर आधारित है जो पुलिस के पास पहुंचे थे। असली तस्वीर और भयावह है। ऊपर जिन दो बड़ी घटनाओं का जिक्र किया गया है, वो इसके बाद हुई थी।
 
यौन उत्पीड़न की शिकार महिलाओं के साथ काम करने वाले एक गैर-सरकारी संगठन से जुड़ी सोमा दास डीडब्ल्यू से कहती हैं, "सरकारी आंकड़ों से पूरा सच सामने नहीं आता। खासकर ग्रामीण इलाकों में ऐसे सैकड़ों मामले स्थानीय स्तर पर या कंगारू अदालतों के जरिए दबा दिए जाते हैं। पुलिस तक नहीं पहुंचने के कारण ऐसे मामले आंकड़ों में नहीं झलकते।"
 
राज्य पुलिस के एक वरिष्ठ अधिकारी भी नाम नहीं छापने की शर्त पर इसकी पुष्टि करते हैं। वो डीडब्ल्यू से कहते हैं, "ज्यादातर मामलों में यौन उत्पीड़न या रेप की शिकार महिला या उसके परिजन लोकलाज और कोर्ट-कचहरी का चक्कर लगाने के डर से पुलिस में औपचारिक शिकायत नहीं करते। ऐसे मामले सरकारी आंकड़ों में शामिल नहीं हो पाते।"
 
उनका कहना था कि एनसीआरबी के आंकड़ों से साफ है कि उसमें शामिल ज्यादातर मामले ग्रामीण इलाकों से ही सामने आए थे। लेकिन वो सिर्फ वही मामले हैं जो पुलिस तक पहुंचे थे।
 
यह राज्य महिलाओं की तस्करी के मामले में भी बदनाम रहा है। वर्ष 2016 में इस मामले में यह देश में पहले स्थान पर रहा था।  वर्ष 2023 में राज्य में ऐसे 3,579 मामले सामने आए थे जो पूरे देश में ऐसे मामलों का 44 फीसदी था। तब दूसरे स्थान पर रहे राजस्थान से 1,422 मामले सामने आए थे। वर्ष 2023 में ऐसे महज 29 मामले ही दर्ज किए गए। ALSO READ: सच्ची मुहब्बत के नाम पर कैसे दुनिया को ठग रहे हैं स्कैमर्स
 

आर.जी. कर की रेप एंड मर्डर घटना ने और बढ़ाया था डर

गैर-सरकारी संगठनों का दावा है कि इस तस्वीर में खास बदलाव नहीं आया है। सुंदरबन इलाके में तस्करी से बचाई गई महिलाओं के पुनर्वास के लिए काम करने वाले संगठन गोरान बोस ग्राम विकास केंद्र की शुभश्री सरकार डीडब्ल्यू से कहती हैं, "बीते 10-15 वर्षों में जमीनी स्थिति में कोई खास बदलाव नहीं आया है। हर महीने हम औसतन 20-22 लड़कियों को तस्करी से बचाते हैं। पहले भी यह संख्या इतनी ही थी।"
 
एक अन्य संगठन से जुड़े कौशिक मित्र डीडब्ल्यू से कहते हैं, "तस्करी के लिए महिलाओं को जाल में फंसाने का तरीका ही बदला है। अब उनको सोशल मीडिया के जरिए नए-नए प्रलोभन दिए जाते हैं। किसी को बेहतर नौकरी के सपने दिखाए जाते हैं तो किसी को बढ़िया लड़के से शादी के। एक बार जाल में फंसने के बाद चोरी-छिपे उनकी वीडियो बना कर ब्लैकमेल किया जाता है।"
 
खासकर, आर.जी. कर की घटना के बाद तो महिलाओं में असुरक्षा की भावना बहुत बढ़ गई है। सौम्यदीपा चटर्जी (बदला हुआ नाम) डीडब्ल्यू से कहती हैं, "मैं दफ्तर से रात को 11 बजे तक घर लौटती हूं। लेकिन अब घर पहुंचने तक दिल धड़कता रहता है कि कहीं कोई अनहोनी नहीं हो जाए। जब कामकाज की जगह ही सुरक्षित नहीं है तो रास्ते में कुछ भी हो सकता है।"
 
महिलाओं में बढ़ती असुरक्षा की भावना के कारण ही आरजी कर की घटना के बाद महीनों राज्यव्यापी प्रदर्शन हुए। इस घटना को राज्य में सत्ता बदलने की एक प्रमुख वजह माना जाता है।
 
एनसीआरबी की ताजा रिपोर्ट के मुताबिक,वर्ष 2023 में रेप के प्रयास के मामले में बंगाल राजस्थान के बाद दूसरे स्थान पर रहा। यहां ऐसे 825 मामले सामने आए थे।
 
सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, बंगाल में ऐसे मामलों में सजा की दर भी बहुत कम, महज 3.2 फीसदी है। इस मामले में 3.7 फीसदी के साथ कर्नाटक सबसे नीचे है। एनसीआरबी की रिपोर्ट के मुताबिक, बंगाल में हर साल महिलाओं के खिलाफ अपराध के 34 हजार से ज्यादा मामले दर्ज किए जाते हैं। यह अपराध दर 71.3 लाख प्रति लाख है जो 64.6 की राष्ट्रीय औसत से ज्यादा है। ALSO READ: क्या भविष्य में बचा रहेगा इंडिया गठबंधन?
 

कितना असर डाल सकती है 'दुर्गा स्क्वॉड'

महिला अधिकार कार्यकर्ताओं ने सरकार की इस पहल की सराहना की है। लेकिन उनका कहना है कि इसका क्या और कितना असर होगा, यह तो बाद में पता चलेगा। एक गैर-सरकारी संगठन से जुड़ी शुचिता सान्याल डीडब्ल्यू से कहती हैं, "कागज पर तो यह पहल ठीक लगती है। वैसे, पहले की सरकार भी महिला सुरक्षा पर बड़े-बड़े दावे करती रही थी। लेकिन जमीनी हकीकत उससे अलग थी। ऐसा नहीं होता तो राजधानी कोलकाता में सरकार की नाक के नीचे ही आरजी कर समेत कई बड़ी घटनाएं नहीं होती।"
 
उनका कहना था कि ऐसे मामलों में राजनीतिक हस्तक्षेप, पुलिस की उदासीनता और कंगारू अदालतों के दबाव के कारण ज्यादातर मामले दर्ज नहीं हो पाते। सरकार को ग्रामीण इलाकों में इस मानसिकता पर अंकुश लगाने के लिए जागरुकता अभियान भी चलाना होगा। उसी स्थिति में सरकार की ताजा पहल का असर नजर आएगा।
 
राज्य महिला आयोग की पूर्व अध्यक्ष लीना गांगुली भी इससे सहमत हैं। उन्होंने डीडब्ल्यू से कहा, "सिर्फ घोषणाओं से जमीनी हालात में बदलाव की उम्मीद करना बेमानी है। सरकार को इस पहल को जमीनी स्तर पर लागू करने और इस पर निगाह रखने का भी समुचित तंत्र विकसित करना होगा। उसी स्थिति में महिलाओं में मजबूती से जड़ें जमा चुकी असुरक्षा की भावना को दूर करने में कामयाबी मिलेगी।"
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