बिहार पंचायत चुनाव में मारामारी, शादी और जाति बनी पैंतरा

DW| Last Updated: शुक्रवार, 29 अक्टूबर 2021 (12:40 IST)
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रिपोर्ट : मनीष कुमार, पटना

गांव की सरकार का हिस्सा बनने को लोग तरह-तरह के जतन कर रहे हैं। उत्साह ऐसा है कि लोग दूसरी शादी तक कर रहे हैं। आरक्षित सीटों पर चुनाव लड़ने के हिसाब से रिश्ते तय हो रहे हैं और लोग जीत भी रहे हैं। बिहार में पंचायत चुनाव के दौरान पदों को लेकर मारामारी मची हुई है। मुखिया से ज्यादा वार्ड सदस्य के लिए दौड़भाग मची है। लोग किसी सूरत चुनाव लड़ना और जीतना चाहते हैं। खुद नहीं तो अपनी पत्नी को चुनाव लड़वा रहे हैं। पत्नी नहीं लड़ सकती तो दूसरी शादी भी कर रहे हैं।

कुछ लोग तो इसके लिए अंतरजातीय विवाह भी कर रहे हैं और नवविवाहिता को मैदान में उतार रहे हैं। बांका की ककवारा पंचायत के सुनील यादव ने पत्नी रेणुदेवी के रहते पूजा रानी से शादी रचा ली। अति पिछड़ी जाति की महिला के लिए आरक्षित मुखिया सीट पर पूजा रानी को उतारा गया और वह चुनाव जीत भी गईं।

इसी तरह इसी जिले में भौतिकी की कोचिंग चलाने वाले सुल्तानपुर पंचायत निवासी नौरेज आलम ने गांव की ही हिना कौसर से निकाह कर उन्हें मुखिया पद का प्रत्याशी बना दिया। वहीं गया जिले के खिजरसराय प्रखंड के होरमा पंचायत में आदित्य कुमार उर्फ राहुल बिंदौल ने पहले तो जाति प्रमाण प्रमाण पत्र बनवाने के लिए काफी हाथ-पांव मारे।
यह सीट अति पिछड़ी जाति के लिए आरक्षित है। जब सर्टिफिकेट नहीं बना तो बिंदौल ने बगल के गांव नौडीहा की जाति प्रमाण पत्र धारक युवती सरिता कुमारी से बिना लगन के शादी कर ली और नई नवेली दुल्हन का नामांकन बतौर मुखिया प्रत्याशी करवा दिया।

सब फंड की माया

केंद्र के वित्त आयोग की तर्ज पर 1993 में देश के सभी राज्यों में राज्य वित्त आयोग की स्थापना की गई। इसके जिम्मे पंचायती राज संस्थाओं और नगर निकायों की आर्थिक स्थिति की समीक्षा करना और इन संस्थाओं की वित्तीय स्थिति सुधारने के लिए विभिन्न कदम उठाना तथा पंचायतों को अनुदान सहायता प्रदान करना है।
इसी के जरिए पंचायतों को सीधे राशि दी जाती है। पंचायतों के लिए आवंटित राशि सभी वार्डों में बराबर बांट दी जाती है, ताकि सभी वार्ड का समान रूप से विकसित हो सकें। एक पंचायत कई वार्डों में बंटी होती है। एक वरीय अधिकारी के अनुसार प्रत्येक ग्राम पंचायत को 5 साल में 5-6 करोड़ रुपए दिए जाते हैं। अर्थात करीब एक से सवा करोड़ की राशि पंचायतें सालाना गांवों की कई योजनाओं के मद में खर्च करती हैं।
इतनी बड़ी धनराशि मुखिया व वार्ड सदस्य के द्वारा खर्च की जाती है। महात्मा गांधी राष्ट्रीय रोजगार गारंटी योजना (मनरेगा) तथा प्रधानमंत्री ग्रामीण योजनाओं की राशि सीधे पंचायतों के खाते में ट्रांसफर की जाती हैं। इनके अतिरिक्त शिक्षा व सिंचाई, हर घर नल का जल व पक्की गली-नाली जैसी अन्य विकास योजनाओं के मद में राशि भुगतान के लिए चेक काटने का अधिकार भी गांव की सरकार को ही है।

जाहिर है, इन पदों के लिए मारामारी तो होगी ही। 5 साल पहले के पंचायत चुनाव तक योजनाओं की राशि खर्च करने का अधिकार मुखिया को था। तब वार्ड सदस्य के लिए इतनी मारामारी नहीं थी। वित्तीय व प्रशासनिक शक्ति मिल जाने के कारण वार्ड सदस्य के पद का आर्कषण बढ़ गया। इस बार के चुनाव में मुखिया से ज्यादा मारामारी वार्ड सदस्य के लिए है।
बह रही बदलाव की बयार

पंचायत सरकार के चुनाव के लिए इस बार प्रदेश में पहली बार ईवीएम का उपयोग किया जा रहा है। राज्य निर्वाचन आयोग के निर्देशों के अनुसार मुखिया, पंचायत समिति सदस्य, वार्ड सदस्य, जिला परिषद सदस्य के लिए ईवीएम से तथा सरपंच व पंच के लिए बैलेट पेपर से वोटिंग हो रही है।

अब तक के घोषित चुनाव परिणाम बता रहे कि प्रदेश में बदलाव की बयार बह रही है। पुराने चेहरों की जगह नए चेहरों ने ली, महिलाओं की भागीदारी बढ़ी तथा कई राजनीतिक घराने के उम्मीदवारों को पराजय का मुंह देखना पड़ा। लगभग हरेक जिले में करीब 80 प्रतिशत नए लोग सभी पदों पर चुनाव जीतने में कामयाब रहे।
मुंगेर जिले के तारापुर प्रखंड की मानिकपुर पंचायत से पंचायती राज मंत्री सम्राट चौधरी की भाभी मीना देवी मुखिया का चुनाव हार गईं, वहीं डिप्टी सीएम रेणु देवी के भाई रवि कुमार भी जिला परिषद के चुनाव में पराजित हो गए। राजस्व मंत्री रामसूरत राय के बड़े भाई भरत राय भी मुजफ्फरपुर जिले के बोचहां प्रखंड अंतर्गत गरहा पंचायत में मुखिया का चुनाव हार गए।

झारखंड के कद्दावर नेता सरयू राय की बहू व बक्सर के इटाढ़ी प्रखंड की हरपुर जलवांसी पंचायत की निवर्तमान मुखिया बिंदु देवी को भी करारी शिकस्त का सामना करना पड़ा। इस बार चुनाव प्रचार में सोशल मीडिया की खासी धमक महसूस की जा रही है।
भ्रष्टाचार का बोलबाला

पत्रकार ए.एन. पांडेय कहते हैं कि बीते दो वर्षों के दौरान भ्रष्टाचार के खिलाफ विजिलेंस की कार्रवाई से यह साफ हो गया है कि स्थानीय निकायों में किस हद तक भ्रष्टाचार व्याप्त है। पद का दुरुपयोग कर अवैध कमाई करने में पंचायत के प्रतिनिधिगण तथा इससे जुड़े अधिकारी-कर्मचारी सबसे आगे हैं। योजनानुसार सबों का हिस्सा तय है। सरकार की सात निश्चय योजनाओं की रफ्तार व उसका हाल तो जगजाहिर है।
सामाजिक कार्यकर्ता रुखसार कहती हैं कि सोलर लाइट प्रकरण में शायद ही कोई मुखिया कार्रवाई की जद में न हों। तमाम उपाय भले ही किए गए हों, किंतु आज भी स्थिति कमोबेश वही है। शायद इसलिए ही शेखपुरा जिले की महसार पंचायत के मुखिया विजय कुमार सिंह ने तो भ्रष्टाचार व योजनाओं की स्थिति देखकर चुनाव नहीं लड़ने का ही फैसला किया।

क्या है इतिहास?

भारत में ग्राम स्वराज की परिकल्पना को साकार करने के तहत गांवों को सशक्त बनाने के उद्देश्य से पंचायती राज की स्थापना की गई। देश में पंचायती राज व्यवस्था की नींव सर्वप्रथम राजस्थान के नागौर जिले में राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के जन्मदिन के मौके पर पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने रखी थी।
1992 में 73वें संविधान संशोधन के माध्यम से सत्ता में निहित शक्तियों का विकेंद्रीकरण करते हुए पंचायती राज संस्थाओं को संवैधानिक दर्जा दिया गया तथा स्थानीय निकायों को आर्थिक विकास तथा सामाजिक न्याय की शक्ति प्रदान की गई। बिहार में 2006 में पुराने अधिनियम को निरस्त करते हुए बिहार पंचायती राज अधिनियम लागू किया गया जिसमें नीतीश कुमार की सरकार ने सभी स्तर पर महिलाओं को 50 प्रतिशत आरक्षण तथा अत्यंत पिछड़ा वर्ग को 20 फीसद आरक्षण का प्रावधान किया।
त्रिस्तरीय पंचायती राज व्यवस्था में गांव के स्तर पर ग्राम पंचायत, मध्यवर्ती स्तर पर पंचायत समिति तथा जिला स्तर पर जिला परिषद आता है। इसके तहत मुखिया, वार्ड सदस्य, पंचायत समिति सदस्य, जिला परिषद सदस्य, सरपंच तथा पंच समेत कुल 6 पदों के लिए मुख्य रूप से चुनाव होता है। सरकार ने 2017 में बिहार वार्ड सभा तथा वार्ड क्रियान्वयन एवं प्रबंधन समिति कार्य संचालन नियमावली, 2017 को लागू किया जिसके कारण पंचायती राज संस्था में वार्ड सदस्य की भूमिका अचानक बढ़ गई।
पंचायती राज मंत्री सम्राट चौधरी कहते हैं कि बीते कुछ वर्षों में ग्रामीण स्तर पर योजनाओं के कार्यान्वयन तथा उनकी मॉनीटरिंग के लिए वार्ड सदस्यों को काफी शक्तियां दी गई हैं। इसके अलावा उन्हें मानदेय व भत्ता भी दिया जाता है।

गांवों के समुचित विकास और पारदर्शिता के लिए पंचायतों में शक्ति संतुलन व समन्वय पर भी जोर दिया गया है। इससे भ्रष्टाचार पर भी अंकुश लग सकेगा तथा पंचायतें और मजबूत होंगी। ऐसी ही कवायद के तहत उप विकास आयुक्त (डीडीसी) तथा प्रखंड विकास पदाधिकारी (बीडीओ) को पंचायतों के काम से अलग किया जा चुका है। इसी के तहत मुखिया व सरपंच के अधिकार तथा कार्य बदल दिए गए हैं। गांव की सत्ता के इन दोनों पदधारकों के दायित्वों का नए सिरे से निर्धारण किया गया है। मुखिया के पास ग्राम पंचायत की विकास योजनाओं को बनाने के साथ-साथ उन प्रस्तावों को लागू कराने की जिम्मेदारी भी होगी तथा उन्हें तय किए गए टैक्स, चंदे व अन्य शुल्कों की वसूली का उपाय भी करना होगा।(फ़ाइल चित्र)



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