UN महासचिव ने AI कंपनियों से मांगा बिजली, पानी और जमीन का हिसाब
- ओंकार सिंह जनौटी
संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुटेरेश ने आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस कंपनियों से अपने कार्बन उत्सर्जन से जुड़ी जानकारी सार्वजनिक करने की अपील की है। उन्होंने कंपनियों से बिजली, पानी और जमीन के इस्तेमाल का हिसाब भी मांगा। लंदन क्लाइमेट एक्शन वीक को संबोधित करते हुए मंगलवार को यूएन महासचिव एंटोनियो गुटेरेश ने एआई एनवायरनमेंटल ट्रांसपेरेंसी इनिशिएटिव का प्रस्ताव रखा। उन्होंने कहा कि एआई कंपनियों को अपनी तकनीक के पर्यावरण पर पड़ रहे असर को मापना और सार्वजनिक करना चाहिए।
संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुटेरेश ने आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस कंपनियों से अपने कार्बन उत्सर्जन से जुड़ी जानकारी सार्वजनिक करने की अपील की है। उन्होंने कंपनियों से बिजली, पानी और जमीन के इस्तेमाल का हिसाब भी मांगा। लंदन क्लाइमेट एक्शन वीक को संबोधित करते हुए मंगलवार को यूएन महासचिव एंटोनियो गुटेरेश ने एआई एनवायरनमेंटल ट्रांसपेरेंसी इनिशिएटिव का प्रस्ताव रखा। उन्होंने कहा कि एआई कंपनियों को अपनी तकनीक के पर्यावरण पर पड़ रहे असर को मापना और सार्वजनिक करना चाहिए।
जलवायु परिवर्तन के भीषण होते असर के बीच एआई कंपनियों पर पर्यावरण को लेकर पारदर्शिता बढ़ाने का दबाव बढ़ रहा है। डाटा सेंटर वाले इलाकों में स्थानीय स्तर पर भी ऐसी मांगें उठने लगी हैं। उद्योग में एकसमान रिपोर्टिंग प्रणाली की जरूरत भी जताई जा रही है।
आंकड़ें जमा करने वाली कुछ वेबसाइटों के मुताबिक, इस वक्त दुनियाभर में करीब 12000 से ज्यादा डाटा सेंटर हैं। ये सेंटर पूरी दुनिया उपलब्ध बिजली में से 2 से 3 फीसदी खर्च कर रहे हैं। 20 जून से 28 जून 2026 तक चलने वाले लंदन क्लामेट एक्शन वीक में गुटेरेश ने कहा कि कंपनियां 2030 तक अपने संचालन को स्वच्छ ऊर्जा से चलाने का लक्ष्य तय करें। उन्होंने कहा, अब लागत छिपाई नहीं चलेगी। बोझ उन लोगों पर नहीं डाला जाना चाहिए जो इसे उठाने में सक्षम नहीं हैं।
कितनी बिजली फूंक रहे हैं डाटा सेंटर?
कई बड़ी टेक कंपनियों ने स्वच्छ ऊर्जा के इस्तेमाल का वादा कर चुकी है। कुछ कंपनियां इस दशक के अंत तक अपने संचालन को पूरी तरह से स्वच्छ ऊर्जा से चलाने की योजना बना रही हैं। एमेजॉन और गूगल जैसी कंपनियां इसके लिए सौर और परमाणु ऊर्जा पर भी जोर दे रही हैं लेकिन एआई की तीखी होड़ ने इन वादों को जटिल बना दिया है। कई छोटी कंपनियां ऐसे वादों से मीलों दूर रहती हैं।
अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (आईईए) के मुताबिक, दुनियाभर के डाटा सेंटरों में खर्च होने वाली बिजली का करीब 30 प्रतिशत हिस्सा कोयले से आता है। करीब 27 फीसदी बिजली, हवा, सौर और पनबिजली संयंत्रों से आती है। प्राकृतिक गैस की हिस्सेदारी 26 प्रतिशत और परमाणु ऊर्जा की 15 परसेंट है। अगले पांच साल में स्वच्छ ऊर्जा से इन जरूरतों का केवल आधा हिस्सा ही पूरा किया जा सकता है।
हालांकि गुटेरेश समेत कई विशेषज्ञ, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस को जलवायु समाधान के लिए उपयोगी भी करार देते हैं। एआई, ऊर्जा से जुड़ी किफायत बढ़ाने और प्रदूषण व उत्सर्जन घटाने में मदद कर सकता है।
क्या ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन के लिए भी जिम्मेदार है एआई?
लेकिन दूसरी ओर, आईए सिस्टमों के लिए लगातार बनते और फैलते डाटा सेंटरों का पर्यावरण पर असरबड़ा होता जा रहा है। जून 2026 में ही जारी यूएन की एक रिपोर्ट के मुताबिक, अब डाटा सेंटरों का असर, दुनिया के कुछ बड़े देशों के उत्सर्जन के बराबर हो चुका है। रिपोर्ट में यह भी कहा है कि अगले चार साल में सिर्फ एआई के कारण बिजली और पानी की खपत दोगुनी हो सकती है।
गुटेरेश ने कहा, इन चिंताओं के बावजूद, अक्सर स्थानीय समुदायों को यह नहीं बताया जाता कि उनके आसपास बन रहे ढांचों का पर्यावरण पर क्या असर पड़ रहा है। लंदन में अपने संबोधन में गुटेरेश ने एआई समेत कई जरूरी कदमों का जिक्र किया। यूएन महासचिव ने वैश्विक तापमान वृद्धि को 1.5 डिग्री सेल्सियस के भीतर रखने के वादे की याद भी दिलाई।
यह लक्ष्य वर्ष 2015 के पेरिस समझौते में तय किया गया था। हालांकि 2025 में पहली बार तीन साल के औसत तापमान ने इस सीमा को पार कर लिया। गुटेरेश ने कहा, हर प्रमुख उत्सर्जक को तेजी से कार्रवाई करनी होगी। हर देश को अपने वादों से आगे बढ़कर काम करना होगा।
किन मुश्किलों को हल कर रही है स्वच्छ ऊर्जा
तमाम चिंताओं के बीच 2025 में स्वच्छ ऊर्जा उत्पादन में बड़ी छलांग देखने को भी मिली। पहली बार दुनिया के कुल बिजली उत्पादन में स्वच्छ ऊर्जा की हिस्सेदारी एक तिहाई से अधिक पहुंच गई। वहीं कोयले की हिस्सेदारी घटकर एक तिहाई से नीचे आ गई। चीन स्वच्छ ऊर्जा परिवर्तन में आगे बना हुआ है। यूरोप में भी जीवाश्म ईंधन आधारित ऊर्जा उत्पादन में गिरावट आ रही है।
दूसरी तरफ अमेरिका में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के नेतृत्व में जीवाश्म ईंधन के उत्पादन व उसकी खपत को बढ़ावा मिला है। दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था वाले अमेरिका में नवीकरणीय ऊर्जा और इको फ्रेंडली नीतियों के समर्थन में कटौती की जा रही है।

