प्रभाकर मणि तिवारी
पश्चिम बंगाल में इसी सप्ताह निपाह वायरस से संक्रमण के दो मामले सामने आए हैं। दोनों संक्रमित कोलकाता से सटे उत्तर 24-परगना जिले के एक निजी अस्पताल में नर्स हैं। इनमें से महिला नर्स हाल में नदिया जिले में एक निजी समारोह में शामिल हुई थीं। प्राप्त जानकारी के अनुसार, समारोह से लौटकर ड्यूटी जॉइन करने के बाद उनसे एक पुरुष नर्स में भी संक्रमण फैल गया।
लक्षण सामने आने के बाद उन दोनों को बारासात के उसी अस्पताल में दाखिल कराया गया है। महिला नर्स कोमा में चली गई हैं और पुरुष नर्स की हालत भी गंभीर है। उन्हें वेंटिलेटर पर रखा गया है।
केंद्र सरकार ने हरसंभव मदद का भरोसा दिया
बुधवार, 14 जनवरी को कोलकाता में संक्रामक बीमारियों के अस्पताल में दो और संदिग्ध मरीजों को लाया गया है। जांच के लिए उनका ब्लड सैंपल नदिया जिले के कल्याणी स्थित एम्स के अलावा पुणे के नेशनल इंस्टिट्यूट आफ वायरोलॉजी को भी भेजा गया है।
राज्य सरकार ने संक्रमण को फैलने से रोकने के लिए युद्धस्तर पर तैयारियां शुरू कर दी हैं। प्रदेश में मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के पास स्वास्थ्य मंत्रालय भी है। उन्होंने एक उच्च-स्तरीय बैठक में परिस्थिति की समीक्षा करते हुए इससे निपटने की रणनीति पर विचार किया।
कोलकाता स्थित संक्रामक बीमारियों के अस्पताल में करीब 80 नए बिस्तरों के अलावा एक पूरी मंजिल पर आइसोलेशन वार्ड बनाया गया है। राज्य के स्वास्थ्य सचिव नारायण स्वरूप निगम ने डीडब्ल्यू को बताया, "दोनों संक्रमित नर्सों के संपर्क में आने वाले लोगों की शिनाख्त की जा रही है। अब तक करीब 120 लोगों को पहचान कर उनको घर में ही आइसोलेशन में रखा गया है। बाकी की पहचान का प्रयास किया जा रहा है।"
केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री जेपी नड्डा ने मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को पत्र बेज कर इस मुद्दे पर हरसंभव मदद का भरोसा दिया है। केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय की एक टीम भी बंगाल पहुंची है। संक्रमण पर अंकुश लगाने और इसे फैलने से रोकने के लिए विभिन्न संस्थाओं के विशेषज्ञों को लेकर एक 'नेशनल जॉइंट आउटब्रेक रिस्पॉन्स टीम' का गठन किया गया है।
क्या है निपाह वायरस?
विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के मुताबिक, निपाह वायरस का संक्रमण 'जूनॉटिक' है। यानी, यह ऐसी बीमारी है जो जानवरों से इंसानों में फैलती है। साथ ही, संक्रमित खाने या सीधे व्यक्ति से व्यक्ति में भी संक्रमित हो सकती है।
संक्रमित हुए लोगों में कई तरह की बीमारियां हो सकती हैं। जैसे कि, सांस लेने में गंभीर परेशानी या इनसेफेलाइटिस (दिमागी बुखार)। यह भी मुमकिन है कि संक्रमण के लक्षण प्रत्यक्ष ना दिखें। यह जानवरों को भी गंभीर रूप से बीमार कर सकता है, जिससे मवेशीपालकों को आर्थिक नुकसान उठाना पड़ सकता है।
संक्रमित लोगों के भीतर उभरने वाले शुरुआती लक्षणों में बुखार, सिर दर्द, उल्टी, गला खराब होना और मांसपेशियों में दर्द शामिल हैं।
लक्षणों के अगले स्तर में चक्कर आना, थकान-सुस्ती और न्यूरोलॉजिकल परेशानियों के संकेत भी शामिल हो सकते हैं, जो कि गंभीर दिमागी बुखार का लक्षण हो सकता है। न्यूमोनिया और सांस की दिक्कत जैसी परेशानियां भी हो सकती हैं। डब्ल्यूएचओ के अनुसार, इनसेफेलाइटिस और सीजर्स गंभीर मामलों में होते हैं, इनमें मरीज 24 से 48 घंटे के बीच कोमा में भी जा सकता है।
कब सामने आया था पहला आउटब्रेक?
निपाह वायरस से संक्रमण के मामले पहली बार साल 1999 में मलेशिया में सामने आए थे। सिंगापुर भी इससे प्रभावित हुआ था। उस समय इंसानों में संक्रमण के ज्यादातर मामले बीमार सुअरों से सीधे संपर्क में आने से हुए थे। उस समय करीब 300 लोग इसकी चपेट में आए थे। उनमें 100 से ज्यादा लोगों की मौत हो गई थी।
निपाह वायरस के मामले ज्यादातर भारत, बांग्लादेश, मलेशिया, सिंगापुर और फिलीपींस में सामने आए हैं। स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि यह संक्रमण हल्का भी हो सकता है और बेहद गंभीर भी, लेकिन इससे संक्रमित होने वालों की मृत्यु दर 75 प्रतिशत तक बताई जाती है।
कोलकाता में संक्रामक बीमारियों के विशेषज्ञ डॉ. जयदेव राय ने डीडब्ल्यू से बातचीत में आशंका जताई, "दिसंबर-जनवरी के महीने में दूसरे राज्यों से प्रवासी मजदूरों का बड़ा तबका राज्य में लौटता है। इससे भी संक्रमण फैलने की आशंका है। इसके अलावा सर्दी के मौसम में ग्रामीण इलाकों में खजूर के रस का सेवन आम है। वह भी इस संक्रमण के फैलने की वजह हो सकता है।"
कैसे करें बचाव?
बीते सात-आठ वर्षों के दौरान केरल के विभिन्न जिलों में इस संक्रमण के कारण 20 से ज्यादा लोगों की मौत हो चुकी है। फिलहाल इससे बचाव के लिए कोई टीका नहीं है। केरल ने इस संक्रमण से निपटने के लिए कई प्रोटोकॉल तय किए थे। इनमें संक्रमित व्यक्ति के संपर्क में आने वाले लोगों का पता लगाकर उनकी निगरानी के साथ ही कोझिकोड मेडिकल कॉलेज समेत कई सरकारी अस्पतालों में आइसोलेशन वॉर्ड बनाना शामिल था।
संक्रमण तेज होने के बाद प्रदेश सरकार ने संक्रमित इलाकों में एहतियातन स्कूल-कॉलेज और सार्वजनिक परिवहन बंद कर दिए थे, ताकि इसका प्रसार नहीं हो सके। सरकार ने आम लोगों से कटे फल नहीं खाने और एन 95 मास्क पहनने को भी कहा था।
स्वास्थ्य विशेषज्ञ डॉ. श्रावणी मजूमदार डीडब्ल्यू से बताती हैं, "इस संक्रमण की कोई दवा या इलाज नहीं होने की वजह से सावधानी और बचाव ही इससे बचने का एकमात्र उपाय है। इसके तहत संक्रमित इलाकों में लोगों को पेड़ से गिरे या कटे फलों के साथ ही खजूर के रस का सेवन भी नहीं करना चाहिए। संक्रमित लोगों या जानवरों से दूरी बरतना जरूरी है। कोरोना के दौर की तरह इस संक्रमण से भी बचने के लिए साबुन से हाथ धोते रहना जरूरी है।"
एक अन्य स्वास्थ्य विशेषज्ञ डॉ. शुभम साहा डीडब्ल्यू से कहते हैं, "निपाह से संक्रमित व्यक्ति में शुरुआती दौर में कोई गंभीर लक्षण नहीं नजर आते। लेकिन, यह वायरस शरीर में तेजी से फैलता है और मरीज जल्दी ही कोमा में जा सकता है। फेफड़ों में संक्रमण के कारण मरीज की मौत भी हो सकती है। इसलिए संक्रमित इलाकों या संक्रमित व्यक्तियों के संपर्क में आने वाले लोगों को हल्के बुखार और सिरदर्द जैसे लक्षणों को भी गंभीरता से लेना चाहिए।"
डा. शुभम साहा ने आगाह किया, "इस वायरस से बचाव के लिए आम लोगों का जागरूक होना जरूरी है। खाने-पीने की चीजों में सावधानी बरतनी होगी।"
डॉ. जयदेव राय बताते हैं कि कोई टीका या इलाज नहीं होने की वजह से संक्रमितों पर परीक्षण के तौर पर कुछ एंटीबायोटिक दवाएं इस्तेमाल की जा रही हैं, लेकिन अब तक वो खास असरदार नहीं साबित हुई हैं। राज्य सरकार ने भी आम लोगों से आतंकित ना होने और सावधानी बरतने की सलाह दी है।