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नेपाल: बालेन शाह के खिलाफ जेन-जी में क्यों है उबाल

protest against balen shah in nepal
मनीष कुमार
नेपाली राजधानी काठमांडू की सड़कों पर फिर से कुछ वैसा ही उबाल दिखा, जो बालेन शाह के प्रधानमंत्री बनने के पहले दिखा था। 'जेन-जी' वोटरों के सहारे हाल ही में बनी सरकार को पहली बड़ी चुनौती का सामना करना पड़ रहा है। ALSO READ: बर्लिन हमले का संदिग्ध पुलिस मुठभेड़ में मारा गया
 
जिस नेपाली युवा बालेन शाह को अंतरराष्ट्रीय 'टाइम मैगजीन' ने 2023 के शीर्ष सौ उभरते नेताओं में शामिल किया था, इतनी जल्दी कुछ लोग उनकी तुलना जर्मनी के तानाशाह हिटलर से कर रहे हैं। नेपाल में इसी 10 जुलाई को आत्मदाह करने वाले 25 वर्षीय युवक गणेश नेपाली का चेहरा बालेन शाह सरकार के खिलाफ विरोध व असंतोष का प्रतीक बन गया है।
 
शाह की सरकार पर लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं को कमजोर करने, विवादित अध्यादेश लाने और कूटनीतिक मोर्चों पर अनुभवहीनता से देश की किरकिरी कराने जैसे आरोप लगाए जा रहे हैं। वहीं, नेपाल के गृहमंत्री ने सुधन गुरुंग ने गणेश की मौत को लेकर विपक्ष पर राजनीति करने का आरोप लगाया है।
 

सिस्टम से नाराज होकर दी जान

ताजा विरोध की चिंगारी 25 वर्षीय गणेश नेपाली नामक एक युवक द्वारा आत्मदाह करने के बाद भड़क उठी। एक रिपोर्ट के अनुसार, गणेश एक राइड शेयरिंग ऐप के लिए मोटरसाइकिल चला कर अपने परिवार का भरण-पोषण करता था। उसकी बाइक ही रोजी-रोटी का एकमात्र साधन थी। बीते 10 जुलाई को काठमांडू में पासपोर्ट ऑफिस के बाहर कथित तौर पर रास्ता अवरुद्ध करने के आरोप में पुलिस ने उसकी मोटरबाइक के पहियों पर व्हील लॉक लगा दिया। गणेश ने इसका विरोध किया और इसे लेकर पुलिस से उसकी तीखी झड़प भी हुई। लेकिन, कोई रास्ता नहीं निकलता देख पुलिस की कार्रवाई से हताश होकर गणेश ने अपनी ही बाइक से पेट्रोल निकाल खुद पर छिड़क कर आग लगा ली। 60 प्रतिशत तक जल चुके गणेश की एक दिन बाद अस्पताल में मौत हो गई। इस दर्दनाक घटना के विरोध में रविवार, 12 जुलाई को लोग काठमांडू की सड़कों पर उतर गए और तोड़फोड़ की। वहीं, इस घटना के बाद पहले से चल रहे विरोध प्रदर्शनों को और हवा मिल गई।
 
हालात बेकाबू होता देख सरकार ने डैमेज कंट्रोल की कोशिश शुरू की। सरकार ने गणेश की मौत मामले की जांच के लिए पूर्व न्यायाधीश के नेतृत्व में जांच समिति का गठन करने, उनकी पत्नी को सरकारी नौकरी, बेटी की शिक्षा का खर्च उठाने तथा दोषी पुलिसकर्मियों को निलंबित करने की घोषणा की। गृहमंत्री गुरुंग ने स्वयं गणेश के घर जाकर उनकी गर्भवती पत्नी एकमाया को नागरिकता प्रमाण पत्र सौंपा। ताकि, उन्हें सरकारी योजनाओं का लाभ मिल सके। सुनसरी निवासी छात्रा रोमिला कहती  हैं, "राइडर गणेश की मौत किसी की व्यक्तिगत पीड़ा नहीं, बल्कि पुलिस-प्रशासन की व्यवस्था व संवेदनशीलता तथा विस्थापित लोगों की समस्याओं का प्रतीक बन गई है।"  ALSO READ: जंगल की आग के सामने लाचार होते फ्रांस और स्पेन
 

आखिर क्यों नाराज हो रहे युवा

गणेश नेपाली की खुदकुशी ही विरोध की एकमात्र वजह नहीं है। दरअसल, सरकार के खिलाफ विरोध की आग कई और मुद्दों को लेकर पहले से सुलग रही थी। बालेन सरकार के कई फैसलों जैसे, ट्रेड यूनियनों और छात्र संघ को भंग करना, संसद को दरकिनार कर अध्यादेश लाना, अतिक्रमण हटाओ अभियान चलाकर लोगों को बेदखल करना, पुलिस की बर्बरता, सरकार का विरोध करने वालों की गिरफ्तारी और संसद में सरकार के विरोधाभासी बयान से लोग पहले से ही नाराज चल रहे थे।
 
जनकपुर निवासी सामाजिक कार्यकर्ता धीरेन पाठक कहते हैं, "दरअसल युवाओं को रोजी-रोजगार चाहिए, किसानों को समय पर खाद-पानी। घोषणाओं और दावों से कुछ नहीं होता। लोकप्रिय होना अलग बात है और काम करना अलग। अगर सरकार के फैसलों पर सवाल उठने लगे तो कहीं न कहीं कुछ गड़बड़ जरूर है।"
 
ठेके पर नियुक्त लगभग 50 हजार कर्मचारी भी हड़ताल कर रहे हैं। शाह सरकार पर लोकतांत्रिक प्रक्रिया से मुंह चुराने का आरोप तब लगा, जब 30 अप्रैल से शुरू होने वाला संसद का सत्र टाल कर 11 मई कर दिया गया और इस दौरान आठ अध्यादेश लागू कर दिए गए। संवैधानिक परिषद से जुड़े अध्यादेशों तथा प्रधानमंत्री को वीटो जैसी शक्ति देने की कोशिश पर भी पुरजोर विवाद हुआ।
 
न्यायिक नियुक्तियों में वरिष्ठता के क्रम को नजरअंदाज किए जाने की भी खूब आलोचना हुई। वहीं, सरकार ने एक अध्यादेश के जरिए करीब 1,600 लोगों की नौकरियां खत्म कर दीं। चीन, भारत और अमेरिका के साथ विदेश नीति को लेकर भी विपक्ष बालेन सरकार पर अनुभवहीनता के आरोप लगा रहा है। विपक्ष यह भी आरोप लगा रहा कि बोर्डिंग स्कूलों और नर्सिंग होम के प्रति सरकार सख्त दृष्टिकोण भी बुरा असर डालेगा। क्योंकि, शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाएं केवल सरकारी सहायता के भरोसे नहीं चल सकती, इसके लिए निजी क्षेत्र का सहयोग जरूरी है। ALSO READ: स्विस बैंक की पोल पट्टी खोलने वाले जर्मन वकील पर मुकदमा
 

बेदखली से भड़की नाराजगी

एक रिपोर्ट के अनुसार अप्रैल में सरकार ने काठमांडू सहित देश के विभिन्न हिस्सों में अतिक्रमण के नाम पर भूमिहीन लोगों की झुग्गियों तथा अन्य अस्थायी निर्माण को हटाकर करीब 2,600 परिवारों को बेदखल कर दिया था। इनमें से करीब तीन सौ से अधिक परिवार काठमांडू के विभिन्न हिस्सों में बनाए गए अस्थायी आवास केंद्रों में रहने लगे, लेकिन सरकार ने दो जुलाई को इन आवास केंद्रों को भी छह जुलाई तक खाली करने का आदेश जारी कर दिया। इस बीच काठमांडू के कीर्तिपुर स्थित एक आवास केंद्र में बाढ़ का पानी भर गया। यहां रह रहे करीब 150 झुग्गीवासी को सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाया गया।
 
मधेश प्रदेश के रौतहट निवासी सोरंग थापा कहते हैं, "नदी किनारे बसी इन अवैध बस्तियों को बालेंद्र उसी समय से हटाना चाहते थे, जब वे काठमांडू के मेयर हुआ करते थे। इन्हें पुलिस व सेना का सहारा लेकर हटा तो दिया गया, लेकिन इनके पुनर्वास का कोई उपाय नहीं किया गया। इन्होंने अपनी जगह तो खो ही दी, कमाई का जरिया भी चला गया।"
 
राजनीतिक समीक्षक एके चौधरी कहते हैं, "युवाओं की बड़ी जीत के प्रतीक बने बालेन को अपना काला चश्मा उतार कर हकीकत का सामना करना चाहिए। जनता को दिए गए आश्वासनों को हकीकत में बदलने की प्रतिबद्धता उन्हें दिखानी ही होगी।"
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