1. सामयिक
  2. डॉयचे वेले
  3. डॉयचे वेले समाचार
  4. iran-war-jet-fuel-price-hike-air-travel-crisis-hormuz-blockade
Written By DW
Last Updated : मंगलवार, 19 मई 2026 (09:18 IST)

ईयू में जेट फ्यूल की कमी का खतरा, उड़ानें हो सकती हैं रद्द

ईरान में चल रहे अमेरिका और इजराइल के युद्ध के चलते जेट ईंधन महंगा हो गया है। कई एयरलाइंस खर्च बचाने के लिए उड़ानें कैंसिल करने को मजबूर हो रही हैं।

aviation turbine fuel
शिवांगी सक्सेना
ईरान में अमेरिका और इजराइल का युद्ध शुरू होने के बाद से होर्मुज जलडमरूमध्य बाधित पड़ा है। तनाव की वजह से यहां तेल की आवाजाही प्रभावित हुई है। दुनियाभर में जेट ईंधन (एविएशन फ्यूल) महंगा हो गया है। इसकी कीमतें दोगुने से ज्यादा बढ़ गई हैं। जेट ईंधन की कीमत पहले 85-90 डॉलर प्रति बैरल थी। यह बढ़कर 150-200 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई है। विमानन कंपनियों ने कटौती करना शुरू कर दिया है। हवाई यात्रा के टिकट महंगे हो रहे हैं। लुफ्थांसा, एयर कनाडा और एयर फ्रांस (केएलएम) जैसी कई बड़ी एयरलाइंस तो कई उड़ानों को भी रद्द कर रही हैं।
 
इस बीच यूरोपीय संघ के ऊर्जा आयुक्त डैन यॉर्गेंसन ने बुधवार को पत्रकारों से बातचीत में बताया कि फिलहाल जेट ईंधन की आपूर्ति पर कोई तात्कालिक खतरा नहीं है। लेकिन भविष्य में इसकी कमी की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता। जेट ईंधन की कमी युद्ध और होर्मुज जलडमरूमध्य की आगे की स्थिति पर निर्भर करती है। यह भी देखना अहम होगा कि एयरलाइंस क्या फैसला लेती हैं।
 
दुनिया भर का करीब 20 फीसदी तेल और गैस होर्मुज जलडमरूमध्य मार्ग से गुजरता है। डैन यॉर्गेंसन कहते हैं, "फिलहाल जेट ईंधन की कमी जैसी स्थिति नहीं बनी है। लेकिन यूरोपीय संघ का कार्यकारी निकाय सदस्य देशों के साथ इस स्थिति से निपटने के तरीकों पर बातचीत शुरू करेगा।"
 

बंद भी हो सकती है हवाई यात्रा

ईरान युद्ध की वजह से फरवरी के आखिर से कई बाजारों में जेट ईंधन की कीमतों में बड़ा उछाल आया है। एयरलाइंस पर इसका सबसे ज्यादा असर पड़ रहा है। ईंधन का खर्च उनकी कुल संचालन लागत का बड़ा हिस्सा होता है। पिछले महीने अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी के प्रमुख फातिह बिरोल ने एसोसिएटेड प्रेस को दिए इंटरव्यू में बताया कि यूरोप के पास जेट ईंधन का भंडार शायद केवल करीब छह हफ्तों के लिए ही बचा है। उन्होंने आशंका जताई कि अगर ईरान युद्ध की वजह से तेल की सप्लाई बंद रही, तो जल्द ही उड़ानें रद्द करनी पड़ सकती हैं।
 
डैन यॉर्गेंसन के मुताबिक ईरान युद्ध शुरू होने के बाद से ईयू ने उतनी ही मात्रा में ईंधन खरीदने के लिए 35 अरब यूरो (करीब 41 अरब डॉलर) ज्यादा खर्च करने पड़े हैं। यानी यूरोप को जल्द ही पेट्रोल, डीजल और गैस जैसे जीवाश्म ईंधनों पर अपनी निर्भरता कम करनी होगी और दूसरे ऊर्जा स्रोतों की ओर बढ़ना होगा।
 
डैन यॉर्गेंसन ने कहा, "असल में यह ऊर्जा संकट नहीं, बल्कि जीवाश्म ईंधन का संकट है। 2022 में रूस द्वारा यूक्रेन पर हमला करने के बाद से ईयू ने अपनी ऊर्जा सप्लाई के स्रोत बढ़ाए हैं। ऊर्जा का इस्तेमाल ज्यादा बेहतर तरीके से किया जा रहा है। नवीकरणीय ऊर्जा का उपयोग बढ़ाया है।"
 

संकट से उबरने की कैसी है तैयारी

साइप्रस के ऊर्जा मंत्री और यूरोपीय संघ के रोटेटिंग प्रेजिडेंट माइकल डेमियानोस को उम्मीद की है कि देश के दक्षिणी तट के पास मिले प्राकृतिक गैस भंडार से गैस की सप्लाई 2027 के आखिर या 2028 की शुरुआत तक यूरोपीय बाजार तक पहुंच सकती है। वह बताते हैं कि यूरोप प्रदूषण कम करना चाहता है और 2040 तक ग्रीनहाउस गैसों को 90 प्रतिशत घटाने का लक्ष्य रखे हुए है। इसके बावजूद आने वाले समय में प्राकृतिक गैस जैसे ईंधनों का इस्तेमाल पूरी तरह बंद नहीं होगा।
 
साथ ही यूरोप खाड़ी देशों से बात कर रहा है। अगर आगे चलकर ईरान के साथ शांति समझौता हो जाता है, तो यूरोप चाहता है कि उस क्षेत्र से तेल और गैस की सप्लाई फिर से पहले की तरह शुरू हो जाए।
 
पिछले महीने यूरोपीय संघ परिषद के अध्यक्ष एंटोनियो कोस्टा और यूरोपीय आयोग की अध्यक्ष उर्सुला फॉन डेयर लाएन ने कहा था कि यूरोपीय संघ खाड़ी देशों के साथ ऐसे नए प्रोजेक्ट्स पर काम करने के लिए तैयार है जिनके जरिए दुनिया के बाजारों तक ऊर्जा पहुंचाई जा सके और जो भू-राजनीतिक तनाव के कारण प्रभावित न हों।
लेखक के बारे में
DW
ये भी पढ़ें
ईरान युद्ध: कितनी असरदार है भारत की बहु-पक्षीय रणनीति?