कूटनीति की बदलती लय और ताल में जगह खोजता भारत

पुनः संशोधित बुधवार, 23 मई 2018 (11:21 IST)
बदलती दुनिया में भारत कूटनीतिक मोर्चे पर भी बड़ी चुनौतियों का सामना कर रहा है। रूस और चीन के साथ अमेरिका के जटिल संबंधों के बीच तीनों के साथ संबंधों में संतुलन बनाने की कोशिश सोची में मोदी पुतिन वार्ता में भी दिखी।

अनिश्चितताएं नई चुनौतियां लाती हैं लेकिन साथ ही नए मौके भी। भारत मौजूदा अनिश्चित अंतरराष्ट्रीय माहौल को इसी तरह देखता है और उससे अधिक से अधिक लाभ उठाना चाहता है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार की विदेशनैतिक पहलकदमियां किसी नर्तक के दक्षता से पेश किए जटिल तालों की तरह है जो अलग अलग कलात्मक रुचि वाले दर्शकों को लुभाने को निकला हो।


भारतीय कूटनीति का एक नया तत्व आसपड़ोस के देशों के अलावा दुनिया में उभरती हकीकतों के व्यापक परिपेक्ष्य में विश्व नेताओं के साथ द्विपक्षीय रिश्तों को फाइन ट्यून करने के लिए अनौपचारिक शिखर वार्ता है, जिसने हाल के समय में महत्व अख्तियार कर लिया है। पिछले महीने मोदी की चीनी नेता शी जिनपिंग के साथ वुहान में मुलाकात हुई थी और अब उन्होंने सोमवार को सोची में रूसी राष्ट्रपति व्लादीमिर पुतिन से मुलाकात की है।

रूस पिछली सदी का सोवियत संघ नहीं है जिसके समर्थन का भारत भरोसा कर सकता था। फिर भी दोनों देश पुराना जोश बनाए रखते हुए नई अंतररराष्ट्रीय परिस्थितियों में ढलने की कोशिश कर रहे हैं। भारत हथियारों की खरीद पर निर्भरता घटाने के लिए रूस से दूर होने की प्रक्रिया में है जबकि रूस पाकिस्तान के साथ रिश्ते कायम करने की धीमी लेकिन सधी हुई कोशिश कर रहा है। इसका एक संकेत पाकिस्तान को सैनिक ट्रांसपोर्ट बेचने की तैयारी है। पूरा सैनिक संबंध इससे बस एक कदम दूर है। इसीलिए इसे नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए कि मोदी ने भारत रूस संबंधों को "विशेष और विशेषाधिकार प्राप्त सामरिक सहयोग" बताया।

हालांकि अनौपचारिक शिखर वार्ता के नतीजे अभी सामने नहीं आए हैं, यह कहा जा सकता है कि मोदी और पुतिन ने रूस और रूसी कंपनियों के साथ कारोबार करने वाली कंपनियों पर ट्रंप प्रशासन द्वारा लगाए गए प्रतिबंधों के संभावित असर पर चर्चा की है। सरकारी बयान में कहा गया है कि उन्होंने द्विपक्षीय और अंतरराष्ट्रीय संबंधों के पूरे आयाम पर चर्चा की। ईरान परमाणु डील से अमेरिका का हटना भी भारत और रूस दोनों के लिए चिंता का कारण है, जैसे कि उत्तर कोरिया से सीधे बात करने की अमेरिका पहल।

अमेरिकी राष्ट्रपति चुनावों में रूस की संदिग्ध भूमिका की वजह से ट्रंप प्रशासन रूस के साथ खास अच्छी स्थिति में नहीं है। यूरोप अमेरिका का कट्टर सहयोगी है और वह पुतिन के इरादों पर हमेशा संदेह करता रहा है। भारत भी राष्ट्रपति बिल क्लिंटन के 2000 के भारत दौरे के बाद से सामरिक तौर पर अमेरिका के करीब आ रहा है, उसके पास कूटनीतिक कलाबाजी की बहुत जगह नहीं है। भारत को रूस-अमेरिका-चीन मैट्रिक्स के मद्देनजर भी अपने संबंधों को चुस्त करने की जरूरत है। खासकर इसलिए भी कि राष्ट्रपति ट्रंप ने साफ कर दिया है कि वे चीन को विश्व का नया आर्थिक और सैनिक महाशक्ति बनते देखने को तैयार नहीं हैं।

पाकिस्तान के साथ चीन के निकट संबंधों, पाक प्रशासित कश्मीर में उसकी भूमिका और सीमा पर गोलीबारी के बावजूद दोनों देशों ने अपने व्यापारिक संबंधों को बिगड़ने न देने की कोशिश की है। रूस ने शंघाई सहयोग संगठन में भारत को सदस्यता पाने में मदद दी थी। भारत इन संबंधों को अपने विदेशनैतिक लक्ष्यों के लिए इस्तेमाल करना चाहता है। मोदी ने पूर्व राष्ट्रपति अटल बिहारी वाजपेयी के हवाले से कहा कि भारत चाहता है कि रूस एक महत्वपूर्ण और आत्मविश्वासी देश बने जिसकी बहुध्रुवीय दुनिया में अहम भूमिका हो। ये अमेरिका और चीन दोनों को ही परोक्ष इशारा था कि एक महाशक्ति वाली दुनिया खत्म हो गई और शीतयुद्ध के बाद की दुनिया बहुध्रुवीय दुनिया है।

भारत अभी भी रक्षा और कारोबार के मामले में कमजोर है। उसे रूस से 12 अरब डॉलर का सैनिक साजोसामान खरीदना है। पिछले पांच सालों में उसके रक्षा आयात का 62 प्रतिशत रूस से आया है। ये संबंध दोनों ही देशों के हित में है और ट्रंप प्रशासन के तहत अमेरिकी नीतियों के उतार चढ़ाव को देखते हुए स्थिरता बनाए रखने के प्रयासों में तेजी आई है। मोदी के एक दिन के सोची दौरे ने रूस भारत संबंधों में उम्मीदें बढ़ा दी हैं।
रिपोर्ट कुलदीप कुमार




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