शिवांगी सक्सेना
भारत में डायबिटीज का इलाज मरीज के स्वास्थ्य और जेब दोनों को प्रभावित करता है। अब यह देश की अर्थव्यवस्था पर गहराता बोझ भी बनता जा रहा है। नेचर मेडिसिन जर्नल में प्रकाशित एक नए वैश्विक अध्ययन के अनुसार आने वाले दशकों में डायबिटीज दुनिया भर में भारी आर्थिक नुकसान का कारण बनेगा। भारत उन देशों में शामिल है जिसपर इसका असर सबसे ज्यादा होने वाला है।
अध्ययन में 204 देशों के आंकड़ों का विश्लेषण किया गया है। साल 2020 से 2050 के बीच दुनिया भर में डायबिटीज से होने वाला कुल खर्च लगभग 10.2 लाख करोड़ डॉलर आंका गया है। यह वैश्विक जीडीपी के करीब 0.2 फीसदी के बराबर है। अगर परिवारों द्वारा मरीजों की देखभाल को भी इसमें जोड़ा जाए, तो ये आर्थिक लागत बढ़कर लगभग 78.8 लाख करोड़ डॉलर तक पहुंच जाती है।
अमेरिका, भारत और चीन पर सबसे ज्यादा बोझ
डायबिटीज से ग्रस्त व्यक्ति को समय से पहले मृत्यु का खतरा रहता है। यह बीमारी हृदय, आंख, गुर्दा, त्वचा और नसों को प्रभावित करती है। मरीज की इम्युनिटी कमजोर हो जाती है। बदलती जीवनशैली इसकी प्रमुख वजह है। इसके अलावा मोटापा, अस्वस्थ खान-पान और वायु प्रदूषण जैसे पर्यावरणीय कारणों की वजह से भी डायबिटीज के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं। साल 2021 में दुनिया में लगभग 53.7 करोड़ लोग डायबिटीज से प्रभावित थे। इनमे से तीन-चौथाई से अधिक मरीज निम्न और मध्यम आय वाले देशों में रहते हैं।
अध्ययन में यह भी बताया गया है कि डायबिटीज से जूझ रहे 45 प्रतिशत लोगों को अपनी बीमारी का पता तक नहीं होता। इनमें से लगभग 90 प्रतिशत लोग इन ही देशों में हैं। साल 2020 से 2050 के बीच अमेरिका में डायबिटीज पर होने वाला खर्च लगभग 2.5 लाख करोड़ डॉलर बताया गया है। वहीं भारत को लगभग 1.6 लाख करोड़ डॉलर और चीन को एक लाख करोड़ डॉलर की चपत लग सकती है।
अगर परिवार के सदस्यों द्वारा मरीज को दी जा रही मुफ्त देखभाल के आर्थिक प्रभाव का आकलन किया जाए, तो यह नुकसान और बढ़ जाता है। इस हिसाब से अमेरिका को 16.5 लाख करोड़ डॉलर, भारत को 11.4 लाख करोड़ डॉलर और चीन को 11 लाख करोड़ डॉलर का आर्थिक बोझ झेलना होगा। शोधकर्ताओं ने डायबिटीज के इस भारी आर्थिक बोझ के पीछे वजह ये बताई है कि भारत और चीन में प्रभावित लोगों की सबसे बड़ी आबादी रहती है। जबकि अमेरिका में डायबिटीज का इलाज बहुत महंगा है।
भारत की स्वास्थ्य व्यवस्था में समस्याएं
भारत में 60 प्रतिशत मौतें डायबिटीज जैसी गैर-संक्रामक बीमारियों से होती हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन डब्ल्यूएचओ के अनुसार भारत में करीब 62 फीसदी मरीजों को डायबिटीज का इलाज नहीं मिल पाता। सरकार ने 2010 में कैंसर, डायबिटीज, हृदय रोग व स्ट्रोक की रोकथाम और नियंत्रण के लिए राष्ट्रीय कार्यक्रम NPCDCS शुरू किया था। बाद में इसका नाम बदलकर गैर-संक्रामक रोगों की रोकथाम और नियंत्रण के लिए राष्ट्रीय कार्यक्रम एनपीएनसीडी रख दिया गया। इस कार्यक्रम के तहत भारत के कई जिलों और स्वास्थ्य केंद्रों पर मुफ्त डायबिटीज स्क्रीनिंग और इलाज की सुविधा उपलब्ध कराई जाती है।
लेकिन असल में इस कार्यक्रम का असर वैसा नहीं रहा जैसा उम्मीद की गई थी। भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद आईसीएमआर और डब्ल्यूएचओ द्वारा किए गए एक सर्वेक्षण से पता चलता है कि 40 प्रतिशत से अधिक सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र और 39 प्रतिशत उप‑केंद्रों पर उच्च रक्तचाप और डायबिटीज के इलाज की पर्याप्त व्यवस्था नहीं है। HbA1c (हिमोग्लोबिन A1c) एक तरह का ब्लड टेस्ट है जो यह बताता है कि किसी व्यक्ति का पिछले दो-तीन महीनों में औसत ब्लड शुगर लेवल कितना रहा। यह टेस्ट अब भी केवल जिला और शहरी स्तर पर अस्पतालों में उपलब्ध है।
इंसुलिन इंजेक्शन और कुछ अन्य दवाइयां केवल बड़े सरकारी और निजी अस्पतालों में मिलती हैं। एक अन्य अध्ययन में यह भी सामने आया है कि अस्पताल या स्वास्थ्य केंद्रों में मरीजों के क्लीनिकल रिकॉर्ड्स नहीं रखे जाते। मरीजों को खुद अपने टेस्ट, दवा और रिपोर्ट्स का रिकॉर्ड संभालना पड़ता है।
गलत जानकारी और समय पर न इलाज मिलना चुनौती
स्वास्थ्य विशेषज्ञों के मुताबिक डायबिटीज के इलाज में स्वास्थ्य प्रणाली और मरीज दोनों को चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। अखिल भारतीय मेडिकल एसोसिएशन के राष्ट्रीय सह-अध्यक्ष डॉ. दिव्यांश सिंह बताते हैं कि लोगों में डायबिटीज के बारे में जागरूकता अब भी कम है। उन्होंने डीडब्ल्यू से कहा, "मरीज अक्सर बीमारी को देर से पहचान पाते हैं। जब उन्हें कोई स्वास्थ्य समस्या होती है, तो वे इसे टालते रहते हैं।कई लोग आयुर्वेदिक इलाज कराते हैं। कुछ लोग व्हाट्सएप से मिली जानकारी पर भरोसा करने लगते हैं। मेरे पिता को भी डायबिटीज है। उन्होंने व्हाट्सएप पर पढ़ा कि लहसुन सूंघने से इसे ठीक किया जा सकता है। अगले ही दिन उनकी तबियत बिगड़ गई।"
डायबिटीज का सबसे अधिक दबाव गरीबों पर पड़ता है। उनके लिए सामुदायिक हेल्थ सेंटर ही पहला संपर्क बिंदु होते हैं। इस पर डॉ. दिव्यांश बताते है कि इन केंद्रों पर अभी भी उपकरण और दवाइयों की कमी रहती है। इसकी वजह से लोग इलाज कराने निजी क्लिनिक चले जाते हैं। वहां बैठे डॉक्टर खुद को नए शोध और जानकारी से अपडेट नहीं रखते।
डॉ. दिव्यांश सिंह ने बताया, "आर्थिक रूप से कमजोर मरीज अपने ब्लड शुगर लेवल की निगरानी नहीं कर पाते। कई उप-केंद्रों में ग्लूकोमीटर उपलब्ध नहीं है। ऐसे में जरूरत है कि तकनीक के माध्यम से कम कीमत वाले उपकरण बनाए जाएं। जिससे मरीज खुद अपने स्वास्थ्य की नियमित रूप से जांच कर सकेंगे।"
महिलाओं और कमजोर वर्ग पर बोझ
अर्थशास्त्री मिताली निकोरे ने डीडब्ल्यू से बातचीत में बताया कि डायबिटीज से संक्रमित व्यक्ति की काम करने की क्षमता कम होती है, जिसका असर श्रम उत्पादकता पर पड़ता है। जीडीपी में उनका आर्थिक योगदान प्रभावित होने लगता है। साथ ही परिवार का ज्यादातर समय और पैसा इलाज पर खर्च हो जाता है। उनका कहना है, "समाज में एक वे लोग हैं जो शहरी और संपन्न वर्ग से आते हैं। उनकी स्वास्थ्य सेवाओं और इलाज तक आसानी से पहुंच है। दूसरी ओर वे लोग हैं जो आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग से हैं। उनके पास इलाज कराने, दवाइयां और इंजेक्शन खरीदने के लिए पर्याप्त पैसे नहीं होते।" इसका असर उनकी इलाज करवाने की क्षमता पर होता है। कई बार आमदनी के अभाव में उनके इलाज में रुकावट भी आती है।
मिताली निकोरे कहती हैं, "कोई व्यक्ति दिहाड़ी पर काम करने वाला मजदूर है। वह भारी बोझ नहीं उठा सकता। उसकी रोग प्रतिरोधक क्षमता भी कम होती है। अगर उसे कोई चोट लग जाए, तो ठीक होने में समय लगता है। इससे उसकी रोजी रोटी और जीवन दोनों पर गहरा असर पड़ता है।" मिताली एक और अहम बात बताती हैं। परिवारों में केयरगिविंग का बोझ सीधे तौर पर घर की महिलाओं पर आता है। उन्हें या तो अपनी नौकरी छोड़नी पड़ती है या फिर घर और बाहर के काम दोनों को एक साथ संभालना पड़ता है। इससे महिलाओं की श्रम बल में भागीदारी कम हो जाती है।
आर्थिक नुक्सान को कम कैसे किया जाए?
भारत में स्वास्थ्य पर ज्यादातर खर्च बीमारी के गंभीर होने के बाद इलाज पर हो रहा है। इलाज के लिए विशेषज्ञ डॉक्टरों, मेडिकल उपकरण, इंजेक्शन और तरह-तरह की जांचों पर बहुत पैसा खर्च किया जाता है। डायबिटीज के इर्द-गिर्द एक पूरी अर्थव्यवस्था विकसित हो चुकी है। दवा कंपनियों को इससे लाभ होता है। लेकिन अगर यही पैसा बीमारी की रोकथाम पर खर्च किया जाए, तो स्थिति बेहतर हो सकती है।
मिताली निकोरे कहती हैं, "भारत को खान पान और खाद्य पदार्थों के नियमों पर गंभीरता से काम करने की जरूरत है। शक्कर-युक्त एरेटेड ड्रिंक्स के शुगर कंटेंट को नियंत्रित किया जाना चाहिए। आज बाजार में बहुत अधिक प्रोसेस्ड और जंक फूड उपलब्ध है।" पिछले सालों में भारत के पारंपरिक, पौष्टिक और प्राकृतिक भोजन की कीमतें लगातार बढ़ती गई हैं जबकि फास्ट फूड सस्ता है। मिताली निकोरे कहती हैं, "कई देशों में सिन फूड जिसमें शुगर की मात्रा बहुत अधिक होती है, उन पर टैक्स लगता है। फ्रांस, यूके और हंगरी जैसे देश ऐसा कदम उठा सकते हैं तो भारत को भी ऐसा करना चाहिए।"