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Written By WD Sports Desk
Last Modified: सोमवार, 9 मार्च 2026 (16:40 IST)

निजी उपलब्धियां नहीं ट्रॉफी जीतो, सफेद गेंद के सफलतम भारतीय कोच बने गौतम गंभीर

Gautam Gambhir
गौतम गंभीर इस एक बात को कहते हुए कभी नहीं थकते। असल में वह इसे हर मौके पर उन लोगों के लिए दोहराते हैं जिन्होंने इस पर ध्यान नहीं दिया है और वह यह है कि मुख्य कोच के तौर पर उनके कार्यकाल में निजी उपलब्धियों का जश्न नहीं मनाया जाएगा।गौतम गंभीर पहले ऐसे भारतीय कोच हो गए हैं जिनकी कोचिंग में भारत ने 2 आईसीसी खिताब अपने नाम किए। पहले चैंपियन्स ट्रॉफी 2025 और अब टी-20 विश्वकप 2026।
इस सिद्धांत की सबसे नवीनतम झलक तब दिखी जब भारत ने रविवार को यहां फाइनल में बेजोड़ प्रदर्शन करते हुए न्यूजीलैंड को 96 रन से हराकर अपना तीसरा टी20 विश्व कप खिताब जीता।  आईसीसी के वैश्विक फाइनल में दो बार अपनी टीम के लिए शीर्ष स्कोरर रहे गंभीर ने जोर देते हुए कहा, ‘‘मुझे लगता है कि सूर्या (भारत के टी20 कप्तान सूर्यकुमार यादव) के साथ मेरा सामान्य सा फलसफा हमेशा से यही रहा है कि उपलब्धियां मायने नहीं रखती। ट्रॉफी मायने रखती हैं। भारतीय क्रिकेट में बहुत लंबे समय से हम उपलब्धियों के बारे में बात करते आ रहे हैं। और मुझे उम्मीद है कि जब तक मैं हूं हम उपलब्धियों के बारे में बात नहीं करेंगे।’’

इसके बाद भारतीय जनता पार्टी के पूर्व सांसद ने क्रिकेट मीडिया से ‘उपलब्धियों’ नहीं बल्कि ‘ट्रॉफी’ का जश्न बनाने की अपील की।  उन्होंने दोहराया, ‘‘उपलब्धियों का जश्न मनाना बंद करो, ट्रॉफी का जश्न मनाओ। यह महत्वपूर्ण है क्योंकि टीम खेल का बड़ा उद्देश्य ट्रॉफी जीतना है, ना कि व्यक्तिगत रन बनाना। यह मेरे लिए कभी मायने नहीं रखता था और ना ही कभी रखेगा।’’गंभीर ने कहा, ‘‘मैं बहुत खुशकिस्मत रहा हूं कि सूर्या और मेरी राय एक ही है, विशेषकर इस मामले में।’’

किसी का नाम नहीं लिया गया लेकिन यह समझना अधिक मुश्किल नहीं है कि वह किन ‘उपलब्धियां हासिल करने वालों’ की बात कर रहे थे।भारतीय क्रिकेट में यह एक खुला राज है कि गंभीर को हमेशा से लगता रहा है कि 2011 विश्व कप फाइनल में मैच का रुख बदलने वाली उनकी 97 रन की पारी या 2007 टी20 विश्व कप फाइनल में उनकी 75 रन की पारी को कमतर आंका गया।
दोनों ही मामलों में महेंद्र सिंह धोनी का मैच जिताने वाला छक्का (2011) और जोगिंदर शर्मा को आखिरी ओवर देने का उनका मास्टरस्ट्रोक (2007) भारतीय क्रिकेट की लोककथाओं का हिस्सा बन गया।गंभीर ने वेस्टइंडीज के खिलाफ लगभग क्वार्टर फाइनल जैसे सुपर आठ मैच, सेमीफाइनल और फाइनल में संजू सैमसन की पारियों का जिक्र करते हुए कहा कि टीम खेल कैसे खेला जाता है ये पारियां इसका सबसे अच्छा उदाहरण है।

गंभीर ने कहा, ‘‘आप पिछले तीन मैच में देख सकते हैं कि संजू ने क्या किया। नाबाद 97, 89, 88 (89)। सोचिए अगर आप किसी उपलब्धि के लिए खेल रहे होते तो शायद हम 250 रन तक नहीं पहुंच पाते इसलिए मुझे लगता है कि यह आप लोगों के लिए भी है।’’
 

गंभीर की कई सोच पर बहस हो सकती है लेकिन इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि पिछले दो वर्षा में भारत की जीत के लिए उनकी कम तारीफ हुई और नाकामियों के लिए लगभग हर बार उनकी बुराई हुई।
सोशल मीडिया पर आलोचनाओं ने भी उनकी राह मुश्किल की। लेकिन गंभीर को उन लोगों की राय की परवाह नहीं है जो बाहर से देख रहे हैं।

गंभीर ने कहा, ‘‘मेरी जवाबदेही किसी सोशल मीडिया के प्रति नहीं है। मेरी जवाबदेही अधिकतर उन 30 लोगों के प्रति है जो ड्रेसिंग रूम में बैठे हैं।’’उन्होंने कहा, ‘‘भले ही मैं एक कोच के तौर पर दो आईसीसी ट्रॉफी जीत चुका हूं लेकिन इससे कोई फर्क नहीं पड़ता क्योंकि भविष्य में मुझे लगता है कि मेरे कोचिंग कार्यकाल में वे 30 लोग मेरे लिए सबसे अधिक मायने रखते हैं, कोई और मायने नहीं रखता।’’
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