पृथ्वी पर मंगल ग्रह की यात्रा...

बॉन, जर्मनी| राम यादव| Last Updated: बुधवार, 1 अक्टूबर 2014 (19:32 IST)
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एक अनोखी यात्रा जो 3 जून 2010 को मॉस्को में शुरू हुई थी। ठीक 520 दिन बाद मॉस्को में ही समाप्त भी हुई। चार देशों के छह मंगल-यात्री ग्रह पर तो कभी नहीं पहुँचे, पर 17 महीनों तक उन्हें वह सब झेलना पड़ा, जो मंगल ग्रह की किसी सच्ची यात्रा के समय उन्हें सचमुच झेलना पड़ता।

किसी भावी मंगल-यात्रा का पृथ्वी पर यह एक रेकॉर्ड-तोड़ अनुकरण (सिम्युलेशन) अभियान था। पाँच मॉड्यूलों वाले एक बनावटी 'अंतरिक्षयान' में रूस के दो और इटली, फ्रांस तथा चीन का एक-एक 'मंगल ग्रह यात्री' 520 दिनों तक स्वेच्छा से बंद रहा। न धूप। न ताज़ी हवा। न ताजा़ पानी। बाहरी दीन-दुनिया से अलग- थलग। देश-दुनिया से बेख़बर। ऐसे में स्वाभाविक ही था कि इस एकांतवास से छुटकारा पाने की खुशी में हर चेहरे पर उस समय मुस्कान बिखर गयी, जब शुक्रवार 4 नवंबर को, मॉस्को के समय के अनुसार, दिन में ठीक दो बजे (भारत में दिन के साढ़े चार बजे) उनके कथित का दरवाज़ा खुला।
खुली हवा में पहली साँसः खुली हवा में पहली साँस लेने के तुरंत बाद सबसे पहले वे डॉक्टरों, अपने परिजनों और घनिष्ठ मित्रों से मिले। टीम के इतालवी सदस्य दीयेगो उर्बीना ने कहा, ''आप सब को फिर से देख कर बहुत अच्छा लग रहा है। 'मार्स500' मिशन के द्वारा हमने धरती पर अंतरिक्ष की अब तक की सबसे लंबी यात्रा पूरी की है, तकि मनुष्यजाति बहुत दूर के, फिर भी हमारी पहुँच के भीतर के एक ग्रह पर एक नये सवेरे का स्वागत कर सके। ...मैं उन सब का सदा आभारी रहूँगा, जो दूर से ही सही, इस कष्टदायक अंतरिक्षयात्रा में हमेशा मेरे पास रहे।''
उर्बीना ने कुछ दिन पहले अपनी डायरी में लिखा था, ''कभी-कभी तनावपूर्ण, नीरस दिन हमें अपने जीवन के सबसे एकाकीपूर्ण दिन लगे।'' मंगल ग्रह पर जाने की तैयारी के इससे पहले के ऐसे ही प्रयोगों में, जो इतने लंबे नहीं थे, उन में भाग लेने वाले मानसिक तनाव और एकाकीपन के कारण कभी-कभी अपना आपा इस तरह खो बैठे कि एक-दूसरे से मारपीट भी कर बैठे।

बड़ा सवाल
क्या वैश्विक तापमानवृद्धि पर सबसे पहले विजय पाना, चंद्रमा या मंगल ग्रह पर विजय पाने की अपेक्षा, हमारी सर्वोच्च प्राथमिकता नहीं होनी चाहिये?
मँहगा अभियान : इटली के दीयेगो उर्बीना और फ्रांस के रोमौं चार्ल्स इस अनुकरण अभियान के लिए यूरोपीय अंतरिक्ष अधिकरण ESA द्वारा चुने गये थे। दोनो रूसी सदस्यों का चुनाव रूसी अंतरिक्ष अधिकरण रोसकोस्मोस ने किया था। ESA और रोसकोस्मोस के करोड़डॉलर मँहगे इस साझे अभियान के साथ, प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से, 40 देशों के क़रीब 6 हज़ार लोग जुड़े हुए थे। बर्लिन के सबसे बड़े अस्पताल 'शारिते' सहित चिकित्सा विज्ञान के चार जर्मन संस्थानों और जर्मन अंतरिक्ष अधिकरण DLR की छह विशेषज्ञ टीमों का भी उसकी सफलता में योगदान रहा है, जो अभी समाप्त नहीं हुआ है।
धरती पर रहते हुए मंगल ग्रह की यात्रा से लौटे सभी छह यात्रियों का काम भी अभी पूरा नहीं हुआ है। अगले दिनों में उनकी सघन डॉक्टरी और मनोवैज्ञानिक जाँचें होंगी। दिसंबर में उनके अनुभवों और अनुभूतियों की लंबी पूछतांछ होगी। उन्हें कई परीक्षणों और प्रयोगों से गुज़रना होगा। उद्देश्य होगा, ऐसी सभी चीज़ें मालूम करना, जो किसी भावी, सच्ची मंगल ग्रह यात्रा के समय प्रासंगिक हो सकती हैं।
मंगल ग्रह यात्रा की हूबहू नकलः '500' मंगल ग्रह पर मनुष्य को भेजने के किसी भावी अभियान वाली परिस्थितियों और चुनौतियों की हूबहू नकल का अब तक का सबसे लंबा और पूर्णकालिक प्रयास था। मंगल ग्रह पृथ्वी से इतना दूर है कि वहाँ पहुँचने और वहाँ से लौटने के लिए कोई उड़ान सिर्फ़ तभी हो सकती है, जब सूर्य की परिक्रमा करते हुए मंगल ग्रह और पृथ्वी एक-दूसरे के आमने-सामने व एक-दूसरे के सबसे निकट हों। इस कारण वहाँ पहुँचने, दोनो ग्रहों के दुबारा निकटतम आने तक वहाँ ठहरने और तब वहाँ से पृथ्वी पर लौटने में ठीक 520 दिन लगेंगे।
इसी को ध्यान में रखते हुए 'मार्स 500' अभियान कुल 520 दिन चला। एक सच्ची यात्रा में 3 जून 2010 को चला मंगलयान, 240 दिन बाद, एक फ़रवरी 2011 को वहाँ पहुँचता। ठीक इसी दिन इटली के दीयेगो उर्बीना और रूस के अलेक्सांदर स्मोल्येव्स्की विशेष अंतरिक्ष सूट पहन कर उस मॉड्यूल में गये, जो मंगल ग्रह की नकल था। पहली बार उन्हें 'मंगल ग्रह की खुली ज़मीन पर' केवल एक घंटा 12 मिनट बिताना था। 'मंगल ग्रह के खुले आकाश के नीचे' उन्हें कुल तीन बार विचरण करना था।
महीने भर बाद वापसीः वहाँ एक महीना बिताने के बाद 2 मार्च 2011 को पृथ्वी की दिशा में वापसी शुरू हुई। वापसी के दौरान 18अप्रैल को ऐसा नाटक रचा गया, मानो यान का पृथ्वी पर के उड़ान नियंत्रण केंद्र के साथ संपर्क अचानक टूट गया है। अब 'मार्स 500' के मंगल ग्रह यात्रियों को सारे निर्णय अपने विवेक से खुद करने थे। वास्तव में भले ही वे पृथ्वी पर ही थे, पर इस प्रयोग के दौरान नियंत्रण केंद्र के साथ उनका संपर्क जान-बूझकर भंग कर दिया गया था। उन्हें सचमुच पता नहीं था कि यह सब एक अभ्यास है। 1999 में ऐसे ही एक प्रयोग के समय उस समय की यात्री टीम के दो सदस्यों के बीच हाथापाई हो गयी थी। इस बार ऐसा कुछ भी नहीं हुआ। संपर्क एक सप्ताह तक टूटा रहा। लेकिन, गुप्त वीडियो कैमरों द्वारा नज़र रखी जाती रही। कोई अप्रिय घटना नहीं हुयी।



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