Hanuman jayanti 2026: हनुमान पूजा सामग्री, विधि, शुभ मुहूर्त, आरती, मंत्र, प्रसाद, चालीसा, कथा और लाभ
Hanuman Jayanti 2026 के पावन अवसर पर जानें हनुमान पूजा की पूरी सामग्री, सही पूजा विधि, शुभ मुहूर्त, आरती, शक्तिशाली मंत्र, प्रसाद, हनुमान चालीसा और कथा। साथ ही जानें इस दिन विधि-विधान से पूजा करने पर मिलने वाले विशेष धार्मिक लाभ और भगवान हनुमान की कृपा प्राप्त करने के उपाय।
1. हनुमान पूजा सामग्री
चंदन, सिंदूर, अक्षत, चमेली का तेल, लाल फूलों की माला, धूप दीप, अगरबत्ती, लाल वस्त्र, हनुमान जी की मूर्ति या तस्वीर, हनुमान चालीसा पुस्तक, हनुमान आरती पुस्तक, पंचफल, पंचामृत, जनेऊ, तुलसी, पान का बीड़ा, ध्वज, लाल लंगोट, लौंग, पंजरी, बेसन या मोतीचूर के लड्डू, रोठ, गुड़, चना, इमरती या जलेबी, हलुआ आदि।
02 अप्रैल 2026, गुरुवार हनुमान पूजा का शुभ मुहूर्त:-
पूर्णिमा तिथि प्रारम्भ- 01 अप्रैल 2026 को सुबह 07:06 बजे से।
पूर्णिमा तिथि समाप्त- 02 अप्रैल 2026 को सुबह 07:41 बजे तक।
उदयातिथि के अनुसार 02 अप्रैल को हनुमान जयंती मनाएंगे।
अभिजीत मुहूर्त: सुबह 12:00 से दोपहर 12:50 के बीच।
अमृत काल: सुबह 11:18 से दोपहर 12:59 के बीच।
गोधूलि मुहूर्त: शाम 06:38 से 07:01 के बीच।
सन्ध्या पूजा मुहूर्त: शाम 06:49 से रात्रि 07:48 के बीच।
निशीथ काल मुहूर्त: मध्यरात्रि 12:01 से 12:47 के बीच।
हनुमान मंत्र:
1-ॐ हं हनुमते नम:।
2-ॐ हं हनुमते रुद्रात्मकायं हुं फट्।
3-ॐ नमो भगवते आंजनेयाय महाबलाय स्वाहा।
4-ॐ नमो भगवते हनुमते नम:।
स्तुति मंत्र:
1- मनोजवं मारुततुल्यवेगं, जितेन्द्रियं बुद्धिमतां वरिष्ठ। वातात्मजं वानरयूथमुख्यं, श्रीरामदूतं शरणं प्रपद्ये॥
2- अतुलितबलधामं हेमशैलाभदेहं दनुजवनकृशानुं ज्ञानिनामग्रगण्यम्।
सकलगुणनिधानं वानराणामधीशं रघुपतिप्रियभक्तं वातजातं नमामि॥
2. हनुमान पूजा विधि
हनुमान पूजा का क्रम:
- शुद्धिकरण
- आचमन
- शिखा बंधन
- प्राणायाम
- न्यास
- पृथ्वी पूजा
- पंचदेव पूजा
- आवाहन
- आसन
- स्नान
- गंध, पुष्प, माला, धूप, दीप अर्पण
- नैवेद्य एवं प्रसाद अर्पण
- पुन: आचमन
- अक्षत, कुमकुम और चंदन अर्पण
- अंत में आरती और प्रसाद वितरण
पूजा विधि:
- सूर्योदय पूर्व उठकर स्नान आदि से निवृत्त होकर लाल वस्त्र पहनें।
- पूजा स्थल को पवित्र करें और पूजा सामग्री को एक थाल में पूजा स्थल पर रखें।
- पूजा स्थल पर एक लकड़ी का पड़ा पाट लगाएं और उसके उपर लाल या सफेद वस्त्र बिछाएं।
- पूजा स्थल के उत्तर दिशा में पंचदेवों की स्थापना और कलश स्थापना करें।
- इसके बाद मध्य में हनुमानजी की तस्वीर या मूर्ति को पाट पर विराजमान करें।
- उनकी तस्वीर या मूर्ति पर जल छिड़कर कर पवित्र करें। साफ वस्त्र से उन्हें पोछ दें।
- उन्हें सुंदर वस्त्र पहनाएं।
- घी का दीप प्रज्वलित करें और अगरबत्ती जलाएं।
- इसके बाद उनका आवाहन करें।
- इसके बाद उन्हें माला पहनाएं।
- माला पहनाने के बाद उनके चरणों में फूल अर्पित करें।
- इसके बाद उनकी पूजा करें। यानी उन्हें सिंदूर, चंदन और चमेली का तेल लगाएं।
- साथ साथ ही पंचदेवों की पूजा भी करें।
- इसके बाद उनका मनपसंद नैवेद्य अर्पित करें। पंचामृत अर्पित करें।
- इसके बाद उनकी विधिवत आरती उतारें।
- हनुमान चालीसा और सुंदरकाण्ड का पाठ करें।
- अंत में अपने घर पर हनुमान जी की ध्वजा का आरोहण करें।
पूजा के सरल नियम:
नियमितता: जयंती, मंगलवार या शनिवार को विशेष पूजा करें।
शुद्धता: हनुमान जी की पूजा में शारीरिक और मानसिक पवित्रता (ब्रह्मचर्य का पालन) अनिवार्य है।
सात्विकता: मांस-मदिरा का सेवन पूरी तरह त्याग देना चाहिए।
चौला: वर्ष में कम से कम 2 बार उन्हें चौला अर्पित जरूर करें।
प्रसाद: उन्हें बूंदी के लड्डू, चना-गुड़ या सिंदूर चढ़ाना बहुत शुभ माना जाता है।
3. हनुमान आरती-Lyrics
।।हनुमान आरती।।
आरती कीजै हनुमान लला की। दुष्ट दलन रघुनाथ कला की।।
जाके बल से गिरिवर कांपे। रोग दोष जाके निकट न झांके।।
अंजनि पुत्र महाबलदायी। संतान के प्रभु सदा सहाई।
दे बीरा रघुनाथ पठाए। लंका जारी सिया सुध लाए।
लंका सो कोट समुद्र सी खाई। जात पवनसुत बार न लाई।
लंका जारी असुर संहारे। सियारामजी के काज संवारे।
लक्ष्मण मूर्छित पड़े सकारे। आणि संजीवन प्राण उबारे।
पैठी पताल तोरि जमकारे। अहिरावण की भुजा उखाड़े।
बाएं भुजा असुर दल मारे। दाहिने भुजा संतजन तारे।
सुर-नर-मुनि जन आरती उतारे। जै जै जै हनुमान उचारे।
कंचन थार कपूर लौ छाई। आरती करत अंजना माई।
लंकविध्वंस कीन्ह रघुराई। तुलसीदास प्रभु कीरति गाई।
जो हनुमानजी की आरती गावै। बसी बैकुंठ परमपद पावै।
आरती कीजै हनुमान लला की। दुष्ट दलन रघुनाथ कला की।
(समाप्त)
4. हनुमान चालीसा
।।दोहा।।
श्रीगुरु चरन सरोज रज, निज मनु मुकुरु सुधारि।
बरनऊं रघुबर बिमल जसु, जो दायकु फल चारि।।
बुद्धिहीन तनु जानिके, सुमिरौं पवन-कुमार।
बल बुद्धि बिद्या देहु मोहिं, हरहु कलेस बिकार।।
।।चौपाई।।
जय हनुमान ज्ञान गुन सागर।
जय कपीस तिहुं लोक उजागर।।
रामदूत अतुलित बल धामा।
अंजनि-पुत्र पवनसुत नामा।।
महाबीर बिक्रम बजरंगी।
कुमति निवार सुमति के संगी।।
कंचन बरन बिराज सुबेसा।
कानन कुंडल कुंचित केसा।।
हाथ बज्र औ ध्वजा बिराजै।
कांधे मूंज जनेऊ साजै।
संकर सुवन केसरीनंदन।
तेज प्रताप महा जग बन्दन।।
विद्यावान गुनी अति चातुर।
राम काज करिबे को आतुर।।
प्रभु चरित्र सुनिबे को रसिया।
राम लखन सीता मन बसिया।।
सूक्ष्म रूप धरि सियहिं दिखावा।
बिकट रूप धरि लंक जरावा।।
भीम रूप धरि असुर संहारे।
रामचंद्र के काज संवारे।।
लाय सजीवन लखन जियाये।
श्रीरघुबीर हरषि उर लाये।।
रघुपति कीन्ही बहुत बड़ाई।
तुम मम प्रिय भरतहि सम भाई।।
सहस बदन तुम्हरो जस गावैं।
अस कहि श्रीपति कंठ लगावैं।।
सनकादिक ब्रह्मादि मुनीसा।
नारद सारद सहित अहीसा।।
जम कुबेर दिगपाल जहां ते।
कबि कोबिद कहि सके कहां ते।।
तुम उपकार सुग्रीवहिं कीन्हा।
राम मिलाय राज पद दीन्हा।।
तुम्हरो मंत्र बिभीषन माना।
लंकेस्वर भए सब जग जाना।।
जुग सहस्र जोजन पर भानू।
लील्यो ताहि मधुर फल जानू।।
प्रभु मुद्रिका मेलि मुख माहीं।
जलधि लांघि गये अचरज नाहीं।।
दुर्गम काज जगत के जेते।
सुगम अनुग्रह तुम्हरे तेते।।
राम दुआरे तुम रखवारे।
होत न आज्ञा बिनु पैसारे।।
सब सुख लहै तुम्हारी सरना।
तुम रक्षक काहू को डर ना।।
आपन तेज सम्हारो आपै।
तीनों लोक हांक तें कांपै।।
भूत पिसाच निकट नहिं आवै।
महाबीर जब नाम सुनावै।।
नासै रोग हरै सब पीरा।
जपत निरंतर हनुमत बीरा।।
संकट तें हनुमान छुड़ावै।
मन क्रम बचन ध्यान जो लावै।।
सब पर राम तपस्वी राजा।
तिन के काज सकल तुम साजा।
और मनोरथ जो कोई लावै।
सोइ अमित जीवन फल पावै।।
चारों जुग परताप तुम्हारा।
है परसिद्ध जगत उजियारा।।
साधु-संत के तुम रखवारे।
असुर निकंदन राम दुलारे।।
अष्ट सिद्धि नौ निधि के दाता।
अस बर दीन जानकी माता।।
राम रसायन तुम्हरे पासा।
सदा रहो रघुपति के दासा।।
तुम्हरे भजन राम को पावै।
जनम-जनम के दुख बिसरावै।।
अन्तकाल रघुबर पुर जाई।
जहां जन्म हरि-भक्त कहाई।।
और देवता चित्त न धरई।
हनुमत सेइ सर्ब सुख करई।।
संकट कटै मिटै सब पीरा।
जो सुमिरै हनुमत बलबीरा।।
जै जै जै हनुमान गोसाईं।
कृपा करहु गुरुदेव की नाईं।।
जो सत बार पाठ कर कोई।
छूटहि बंदि महा सुख होई।।
जो यह पढ़ै हनुमान चालीसा।
होय सिद्धि साखी गौरीसा।।
तुलसीदास सदा हरि चेरा।
कीजै नाथ हृदय मंह डेरा।।
।।दोहा।।
पवन तनय संकट हरन, मंगल मूरति रूप।
राम लखन सीता सहित, हृदय बसहु सुर भूप।।
(समाप्त)
5. हनुमान कथा
जन्म और अवतार
हनुमान जी का जन्म चैत्र शुक्ल पूर्णिमा को माता अंजना और पिता वानरराज केसरी के यहाँ हुआ था। वे भगवान शिव के 11वें रुद्र अवतार माने जाते हैं, जो शिव जी द्वारा माता अंजना को दिए गए वरदान का स्वरूप थे।
पवन देव की भूमिका
हनुमान जी के जन्म में पवन देव का भी महत्वपूर्ण योगदान था। राजा दशरथ के पुत्रेष्टि यज्ञ की प्रसाद रूपी खीर का एक भाग एक पक्षी (कौआ) ले उड़ा और उसे तपस्यारत माता अंजना के हाथों में गिरा दिया। इसे शिव का प्रसाद समझकर ग्रहण करने से हनुमान जी का जन्म हुआ।
बाल्यकाल और 'हनुमान' नाम
बचपन में सूर्य को फल समझकर हनुमान जी उसे निगलने के लिए आकाश में उड़ गए। जब इंद्र ने उन्हें रोकने के लिए वज्र से प्रहार किया, तो उनकी ठोड़ी (हनु) पर चोट लगी, जिससे उनका नाम 'हनुमान' पड़ा।
वरदानों की प्राप्ति
इंद्र के प्रहार से क्रोधित होकर पवन देव ने सृष्टि का वायु संचार रोक दिया। तब देवताओं ने बालक हनुमान को शांत करने के लिए उन्हें अद्वितीय वरदान दिए:-
ब्रह्मा जी: लंबी आयु।
इंद्र: वज्र से अभय होने का वर।
सूर्य: समस्त शास्त्रों का ज्ञान और तेज।
अन्य देव: वरुण, यम, कुबेर और शिव: अस्त्र-शस्त्रों से सुरक्षा और अजेय होने का आशीर्वाद।
रामदूत: इन्हीं दिव्य शक्तियों के कारण हनुमान जी ने आगे चलकर प्रभु श्री राम की सेवा में अद्भुत और पराक्रमी कार्य किए और रामदूत कहलाए।
6. हनुमान पूजा लाभ
1. भूत पिशाच, राक्षस, जिन्न, भय और नकारात्मक ऊर्जा से मुक्ति
2. मानसिक शांति और तनाव में तुरंत राहत
3. पितृ, राहु, केतु, मंगल और शनि दोष से मुक्ति
4. शारीरिक और मानसिक रोग से मुक्ति
5. अचानक से आने वाले संकटों से मुक्ति
6. हर तरह के बंधनों से मुक्ति
7. कठिन कार्यों में सफलता
8. भक्ति, बुद्धि, बल और विवेक की प्राप्ति
9. नियमित भक्ति, पूजा और चालीसा पाठ से जीवन में हर तरह की उन्नति
10. अष्टसिद्धी नवनिधी के दाता
10. अष्टसिद्धी नवनिधी के दाता
7. हनुमान जी पर पूछे जाने वाले प्रश्न-FAQs
1. हनुमान जी का जन्म कब और कहाँ हुआ था?
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, हनुमान जी का जन्म चैत्र मास की पूर्णिमा को हुआ था, जिसे हम 'हनुमान जयंती' के रूप में मनाते हैं। उनके जन्मस्थान के बारे में अलग-अलग मत हैं, लेकिन मुख्य रूप से अंजनेय पर्वत (हम्पी, कर्नाटक) या झारखंड के गुमला जिले को उनका जन्मस्थल माना जाता है।
2. हनुमान जी के माता-पिता कौन थे?
माता: अंजना (जो एक अप्सरा थीं और श्रापवश वानर रूप में जन्मी थीं)।
पिता: केसरी (कपिकुल के राजा)।
आध्यात्मिक पिता: उन्हें पवनपुत्र भी कहा जाता है क्योंकि वायु देव के माध्यम से ही भगवान शिव का अंश माता अंजना के गर्भ तक पहुँचा था।
3. क्या हनुमान जी वास्तव में अमर हैं?
हाँ, हिंदू शास्त्रों के अनुसार हनुमान जी अष्टचिरंजीवियों (आठ अमर जीव) में से एक हैं। उन्हें माता सीता से वरदान मिला था कि वे कलयुग के अंत तक पृथ्वी पर रहकर भक्तों की रक्षा करेंगे और भगवान राम के नाम का प्रचार करेंगे।
4. हनुमान जी को 'बजरंगबली' क्यों कहा जाता है?
यह नाम दो शब्दों से बना है: 'वज्र' और 'अंग'। जिसका अर्थ है जिनका शरीर 'वज्र' के समान कठोर और शक्तिशाली हो। अपभ्रंश होकर यह 'बजरंग' बन गया। 'बली' का अर्थ अत्यंत बलशाली होता है।
5. हनुमान जी पर सिंदूर क्यों चढ़ाया जाता है?
एक बार हनुमान जी ने माता सीता को अपनी मांग में सिंदूर लगाते देखा। पूछने पर माता ने बताया कि इससे श्री राम की आयु बढ़ती है और वे प्रसन्न होते हैं। अपने प्रभु के प्रति अगाध प्रेम के कारण हनुमान जी ने अपने पूरे शरीर पर ही सिंदूर लगा लिया। तभी से उन्हें सिंदूर चढ़ाने की परंपरा है।
6. हनुमान जी के गुरु कौन थे?
हनुमान जी के मुख्य गुरु सूर्य देव थे। उन्होंने सूर्य के रथ के साथ चलते हुए चारों वेदों और समस्त विद्याओं का ज्ञान प्राप्त किया था।
7. हनुमान जी की भक्ति को 'दास्य भाव' क्यों कहते हैं?
हनुमान जी ने स्वयं को पूरी तरह से श्री राम के चरणों में समर्पित कर दिया था। वे स्वयं को राम जी का सेवक मानते थे। उनकी भक्ति में अहंकार का लेश मात्र भी नहीं था, इसीलिए उनकी भक्ति को 'दास्य भक्ति' का सर्वोच्च उदाहरण माना जाता है।
8. पंचमुखी हनुमान का रहस्य क्या है?
पाताल लोक में अहिरावण का वध करने के लिए हनुमान जी ने पंचमुखी रूप धारण किया था। उन पाँच मुखों की दिशाएँ और महत्व इस प्रकार हैं:
पूर्व (हनुमान): शत्रुओं पर विजय के लिए।
दक्षिण (नरसिंह): भय और बाधाओं को दूर करने के लिए।
पश्चिम (गरुड़): विष और बुरी आत्माओं से रक्षा के लिए।
उत्तर (वराह): धन और समृद्धि के लिए।
ऊर्ध्व/आकाश (हयग्रीव): ज्ञान और बुद्धि के लिए।
9. हनुमानजी के कितने भाई बहन थे?
पौराणिक ग्रंथों, विशेष रूप से 'ब्रह्मांडपुराण' के अनुसार, हनुमान जी के 5 सगे भाई थे। वानर राज केसरी और माता अंजना के कुल 6 पुत्र थे, जिनमें हनुमान जी सबसे बड़े थे। हनुमान जी के भाइयों के नाम निम्नलिखित हैं: मतिमान, श्रुतिमान, केतुमान, गतिमान और धृतिमान। हनुमान जी के इन भाइयों का वर्णन मुख्य रूप से वानर वंशावली और ब्रह्मांडपुराण के 'अनुषंग पाद' में मिलता है।
कुछ महत्वपूर्ण तथ्य:
पारिवारिक स्थिति: पुराणों के अनुसार, हनुमान जी के ये पांचों भाई विवाहित थे और उनके अपने परिवार व संतानें थीं। हनुमान जी ने अपना पूरा जीवन ब्रह्मचर्य का पालन करते हुए प्रभु श्री राम की सेवा में समर्पित कर दिया था।
पांडु पुत्र भीम: आध्यात्मिक रूप से भीम को भी हनुमान जी का भाई माना जाता है, क्योंकि वे दोनों ही पवन देव के पुत्र (पवनपुत्र) थे। महाभारत काल में जब भीम और हनुमान जी की भेंट हुई थी, तब हनुमान जी ने उन्हें अपना भाई कहकर ही संबोधित किया था।
बहन: रामायण या मुख्य पुराणों में हनुमान जी की किसी सगी बहन का स्पष्ट उल्लेख नहीं मिलता है। वे अपने माता-पिता की ज्येष्ठ संतान और भाइयों में सबसे बड़े थे।

