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Shrut Panchami 2026: श्रुत पंचमी पर्व क्या है, जैन धर्म में क्यों मनाते हैं?
Shruta Panchami:श्रुत पंचमी जैन धर्म के सबसे महत्वपूर्ण और पवित्र ऐतिहासिक पर्वों में से एक है। जैन धर्म में श्रुत पंचमी का विशेष धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व है। यह पर्व जैन आगमों, शास्त्रों और ज्ञान परंपरा के प्रति श्रद्धा व्यक्त करने के लिए मनाया जाता है। हर वर्ष ज्येष्ठ शुक्ल पंचमी के दिन मनाई जाने वाली श्रुत पंचमी को ज्ञान, अध्ययन और धर्मग्रंथों की पूजा का महापर्व माना जाता है। इस दिन जैन समाज के लोग शास्त्रों की आराधना करते हैं और ज्ञान के महत्व को स्मरण करते हैं।ALSO READ: Lord Shantinath jayanti: जैन धर्म के 16वें तीर्थंकर भगवान शांतिनाथ की जयंती
जैन पंचांग के अनुसार श्रुत पंचमी ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को मनाई जाती है। वर्ष 2026 में श्रुत पंचमी का पर्व 19 जून 2026, शुक्रवार को मनाया जाएगा।
आइए यहां जानते हैं यह व्रत क्या है और जैन धर्म में इसका इतना बड़ा महत्व क्यों है?
1. श्रुत पंचमी क्यों मनाते हैं, जानें का ऐतिहासिक महत्व
'श्रुत' का अर्थ होता है 'सुना हुआ ज्ञान'। भगवान महावीर के मोक्ष जाने के बाद कई सौ सालों तक जैन धर्म का सर्वोच्च ज्ञान लिपिबद्ध (लिखा हुआ) नहीं था। आचार्य और मुनि इस ज्ञान को सुनकर, याद रखकर (मौखिक रूप से) एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पहुंचाते थे।
लेकिन समय के साथ, मुनियों की याद रखने की क्षमता अथवा स्मरण शक्ति कम होने लगी। तब दिगंबर जैन परंपरा के महान संत आचार्य धरसेन को यह चिंता सताने लगी कि अगर इस ज्ञान को लिखा नहीं गया, तो यह हमेशा के लिए लुप्त हो जाएगा।
ग्रंथ की रचना: आचार्य धरसेन की प्रेरणा से उनके दो योग्य शिष्यों- आचार्य पुष्पदंत और आचार्य भूतबलि ने ज्येष्ठ शुक्ल पंचमी के दिन जैन धर्म के सबसे पहले और महान ग्रंथ 'षट्खंडागम' (Shatkhandagama) की रचना पूरी की थी।
पहला लिखित शास्त्र: इसी दिन जैन धर्म का मौखिक ज्ञान पहली बार ताड़पत्रों पर पवित्र प्राकृत भाषा में लिखकर लिपिबद्ध किया गया था। इस प्रकार, इस दिन जैन संस्कृति को उसका पहला लिखित शास्त्र मिला था।
जब यह ग्रंथ पूरा हुआ, तो देवों और मुनियों ने मिलकर ज्येष्ठ शुक्ल पंचमी के दिन इस पवित्र ग्रंथ की महापूजा की, जुलूस निकाला और उत्सव मनाया। तभी से हर साल इस दिन को 'श्रुत पंचमी' के रूप में मनाया जाने लगा।
2. श्रुत पंचमी व्रत कैसे मनाते हैं और पूजा विधि
इस दिन जैन मंदिरों में बहुत ही भक्तिभाव से 'श्रुत' यानी शास्त्रों की पूजा की जाती है। इसकी मुख्य परंपराएं निम्नलिखित हैं:
शास्त्रों की सफाई और वेष्टन बदलना: मंदिरों में मौजूद प्राचीन हस्तलिखित शास्त्रों और जिनवाणी (ग्रंथों) को साफ किया जाता है। उन पर लगी धूल हटाई जाती है और उन्हें नए सुंदर रेशमी कपड़ों (वेष्टन) में लपेटा जाता है।
जिनवाणी माता की पूजा: मंदिर जी में सभी शास्त्रों को एक ऊंचे आसन पर विराजमान करके अष्टद्रव्य (जल, चंदन, अक्षत, फूल, दीप, धूप, फल, अर्घ्य) से 'श्रुत देवी' (सरस्वती माता) और जिनवाणी की विशेष पूजा की जाती है।
शास्त्रों का जुलूस (शोभायात्रा): कई शहरों में इस दिन सबसे पवित्र ग्रंथ या जिनवाणी को सिर पर या रथ पर विराजमान करके पूरे नगर में मंगल गाजे-बाजे के साथ शोभायात्रा निकाली जाती है।
उपवास और स्वाध्याय: इस दिन बहुत से श्रावक व्रत या उपवास रखते हैं। इस दिन सांसारिक कार्यों से दूर रहकर 'स्वाध्याय' यानी शास्त्रों को पढ़ना और समझना सबसे उत्तम कार्य माना जाता है।
3. इस पर्व का संदेश
श्रुत पंचमी केवल एक पूजा का दिन नहीं है, बल्कि यह हमें याद दिलाता है कि हमारे संतों ने कितनी कठिनाई से ज्ञान को संजोकर हम तक पहुंचाया है। यह पर्व जैन समाज को संदेश देता है कि:
हमें शास्त्रों का आदर करना चाहिए (उन्हें कभी जमीन पर या गंदे हाथों से नहीं छूना चाहिए)।
ज्ञान को केवल तिजोरी या अलमारी में बंद नहीं रखना चाहिए, बल्कि रोज उसे पढ़कर अपने जीवन में उतारना चाहिए।
लघु मंत्र: इस दिन ज्ञान की वृद्धि और बुद्धि की शुद्धि के लिए इस मंत्र का जाप किया जाता है:
"ॐ ह्रीं णमो सुअणाणस्स" (अर्थ: श्रुत ज्ञान/पवित्र ज्ञान को मेरा नमस्कार हो)।
जैन धर्म में श्रुत देवी को ज्ञान, विद्या और शास्त्रों की अधिष्ठात्री देवी माना जाता है। इन्हें जैन आगमों की संरक्षिका भी कहा जाता है। धार्मिक मान्यता है कि श्रुत देवी की आराधना करने से ज्ञान में वृद्धि होती है और आध्यात्मिक उन्नति का मार्ग प्रशस्त होता है।
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