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  4. Historical significance of the 10th of Muharram according to Sunni tradition

सुन्नी परंपरा में मुहर्रम की 10वीं तारीख का ऐतिहासिक महत्व

An image showing information related to Muharram, the first month of the Islamic calendar
10th Day of Muharram: इस्लामी कैलेंडर का पहला महीना मुहर्रम दुनिया भर के मुसलमानों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। यह केवल नए इस्लामी वर्ष की शुरुआत का प्रतीक नहीं है, बल्कि त्याग, बलिदान, सत्य और न्याय के लिए संघर्ष की अमर गाथा भी अपने भीतर समेटे हुए है। मुहर्रम की 10वीं तारीख, जिसे यौम-ए-अशुरा कहा जाता है, इतिहास की उस दर्दनाक लेकिन प्रेरणादायक घटना की याद दिलाती है जब कर्बला के मैदान में इमाम हुसैन और उनके साथियों ने अन्याय के सामने झुकने के बजाय शहादत को चुना।ALSO READ: Muharram 2026: मुहर्रम की 10वीं तारीख क्यों है खास? जानिए यौम-ए-आशूरा की पूरी कहानी
 
इस्लामिक इतिहास में मुहर्रम की 10वीं तारीख का महत्व कर्बला की घटना से भी पहले का है। सुन्नी मुस्लिम परंपराओं के अनुसार, इस दिन को कई अन्य ऐतिहासिक और पवित्र घटनाओं से भी जोड़ा जाता है:
 
इसी दिन अल्लाह ने हजरत मूसा (Moses) और बनी इसराइल के लोगों को मिस्र के क्रूर राजा फिरऔन (Pharaoh) के अत्याचारों से मुक्ति दिलाई थी और लाल सागर को दो भागों में चीरकर रास्ता दिया था।
 
माना जाता है कि इसी दिन हजरत नूह (Noah) की कश्ती (नाव) महाप्रलय के बाद जूदी पहाड़ पर टिकी थी। इस कारण, पैगंबर मोहम्मद साहब कर्बला की घटना से पहले भी इस दिन अल्लाह का शुक्र अदा करने के लिए रोजा (व्रत) रखा करते थे।ALSO READ: Muharram 2026: कब से शुरू हो रहा है मोहर्रम मास, जानें सही डेट
 

यौम-ए-आशूरा को कैसे मनाया/याद किया जाता है?

 
मुहर्रम के 10वें दिन दुनिया भर में लोग अपनी-अपनी परंपराओं के अनुसार इमाम हुसैन की शहादत को याद करते हैं:
 
मजलिस और मातम (Shia Tradition): शिया समुदाय के लोग काले कपड़े पहनकर 'मजलिस' यानी धार्मिक सभाएं आयोजित करते हैं, जहां कर्बला के शहीदों का दर्द बयां किया जाता है। लोग छाती पीटकर 'या हुसैन' का नारा लगाते हैं और शोक (मातम) मनाते हैं।
 
ताजिया जुलूस: भारत, पाकिस्तान और कई अन्य देशों में इमाम हुसैन के मकबरे के प्रतीकात्मक रूप 'ताजिया' बनाए जाते हैं और उन्हें जुलूस के रूप में निकालकर कर्बला यानी स्थानीय कब्रिस्तान में दफन किया जाता है।
 
रोजा और इबादत (Sunni Tradition): सुन्नी समुदाय के लोग मुहर्रम की 9वीं और 10वीं, या 10वीं और 11वीं तारीख को नफिल रोजा रखते हैं और मस्जिदों में विशेष इबादत करते हैं।
 
सबील और लंगर: इस दिन जगह-जगह लोगों को मुफ्त पानी, शरबत और खाना/ लंगर बांटा जाता है, जो कर्बला के प्यासे शहीदों की याद में होता है।
 
संक्षेप में कहें तो, मुहर्रम की 10वीं तारीख यानी यौम-ए-आशूरा हमें यह सिखाता है कि चाहे परिस्थितियां कितनी भी कठिन क्यों न हों, अन्याय के सामने कभी झुकना नहीं चाहिए और हमेशा सच्चाई का साथ देना चाहिए।
 
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